प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन जुलाई को लद्दाख का दौरा कर चीन द्वारा देश की सुरक्षा को पैदा की गई गंभीर चुनौती से वीरता से निपटने के लिए भारतीय सेना और अर्धसैनिक बलों का धन्यवाद किया है। उनकी यह यात्रा जनता में व्याप्त गुस्से और प्रतिकर्म की मांग के आलोक में हुई क्योंकि चीन ने गलवान घाटी और पैंगोंग त्सो झील के कुछ हिस्से को कब्जा लिया है। जल और थल में अपने इलाके का विस्तार करने की महत्वाकांक्षा पाले चीन के विश्वासघात का परोक्ष संदर्भ देते हुए मोदी ने कहा : ‘जब भी किसी के सिर पर विस्तारवादी जीत हासिल करने का जुनून सवार हो जाता है तो यह प्रवृत्ति विश्व शांति के लिए खतरा बन जाती है।’
वर्ष 1979 में वियतनाम पर की गई चीन की विफल चढ़ाई के अलावा उसे सिक्किम (1975), अरुणाचल प्रदेश के सुमदोरोंग क्षेत्र में (1986) और फिर डोकलाम (2017) में कुटिल घुसपैठ की कोशिश में मुंह की खानी पड़ी है। इन प्रसंगों ने दिखा दिया कि चीन की सेना अजेय नहीं है। अब ताजा गलवान घाटी घटनाक्रम में उसे कितना जानी नुकसान हुआ है, यह बताने से वह कतरा रहा है। जहां भारत ने बताया है कि इस द्वंद्व में हमारे 20 जवान शहीद हुए हैं, वहीं भरोसे योग्य पश्चिमी पत्रकारों ने रहस्योद्घाटन किया है कि गलवान में हुई आमने-सामने की मुठभेड़ में कम-से-कम 43 चीनी सैनिक मारे गए हैं। उम्मीद की जाए कि चीन को अब यह बात समझ में आ गई होगी, और याद भी रहेगी कि किस तरह झड़प में भारतीय सेना के संख्या में काफी कम किंतु जांबाज बिहारी और सिख जवानों ने मजबूत, निर्णायक और प्रभावशाली ढंग से अपना करारा जवाब उस स्थिति में भी दिया है, जब उनके निहत्थे साथियों पर चीनी फौजियों ने धोखे से हमला कर दिया था।

जी. पार्थसारथी

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सीमा-विस्तारवाद से इनसानियत को सबसे बड़ा खतरा है तो उनका अपरोक्ष इशारा चीन द्वारा अपने लगभग सभी पड़ोसी मुल्कों के साथ असंगत सीमा संबंधी दावे करने पर था। वह जापान, ताइवान, वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस और यहां तक कि रूस के व्लाडिवोस्टक बंदरगाह जो कि 1860 से ही रूस का हिस्सा रहा है, पर भी अपना दावा जता रहा है। पश्चिमी प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में अपनी थलीय और जलीय सीमाओं को विस्तार देने के चीनी कृत्यों को अब पड़ोसी देशों के मुखर विरोध का सामना करना पड़ रहा है। सीमा विवाद पर जो कोई भी मुल्क उसकी बात नहीं मानता, मसलन वियतनाम, ब्रुनेई, फिलीपींस और इंडोनेशिया, उनका मनोबल तोड़ने के लिए वह उन्हें अपनी नौसैन्य शक्ति का भोंडा प्रदर्शन कर डराना चाहता है। दरअसल, चीन के ऐसे व्यवहार का मुख्य उद्देश्य दक्षिण चीन सागर की भू-गर्भीय संपदा है, जहां अनुमान के अनुसार वह 11 अरब बैरल तेल और 190 ट्रिलियन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गैस पर एकाधिकार जमाना चाहता है। चीन ने अपनी निरंतर ताकतवर होती नौसेना का इस्तेमाल कर पड़ोसी देशों की समुद्री सीमा का काफी बड़ा हिस्सा हड़प लिया है, प्रभावितों में आसियान संगठन के सदस्य देश वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया के नाम उल्लेखनीय हैं।
प्रधानमंत्री मोदी की लद्दाख यात्रा के तीन दिन बाद भारतीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ सीमा संबंधी विषयों पर विस्तार से वार्ता की है। भारतीय प्रवक्ता ने वक्तव्य दिया है कि डोभाल और वांग यी ने न सिर्फ गलवान घाटी इलाके की वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव घटाने की प्रक्रिया पूरी करने पर सहमति दी है बल्कि बाकी की पूरी भारत-चीन सीमा पर भविष्य में तनातनी पैदा न हो, इस पर भी राजी हुए हैं। इस समझौते से लद्दाख में बने मौजूदा तल्ख गतिरोध घटाने में कमी हो पाएगी। क्या पता इससे चीन द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा की बार-बार उल्लंघना का अंत भी हो जाए, जिसके पीछे वह कोई कारण या ठोस प्रमाण नहीं देता है। हालांकि, पैगोंग त्सो इलाके से चीनी सैनिकों के पूरी तरह पीछे हट जाने के लिए आगे भी समझौता वार्ताएं जारी रखनी पड़ेंगी। भारत अपने इन यत्नों को चीनी घुसपैठ पर केंद्रित सक्रिय अंतर्राष्ट्रीय राजनयिक अभियानों के जरिए पुष्ट कर सकता है।
इसी बीच आसियान संगठन के 10 सदस्य देशों ने मांग की है कि दक्षिण चीन सागर में सीमा संबंधी और अन्य विवादों को संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में बनी सागरीय संहिता के मुताबिक हल किया जाए। इन आसियान नेताओं का यह भी कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संहिता में जो कानूनी प्रावधान दिए गए हैं, तमाम महासागरीय और सागरीय गतिविधियां उसी के अनुरूप चलाई जानी चाहिए। हालांकि, चीन आज तक ‘फूट डालो-राज करो’ की नीति बरतकर अपने खिलाफ आए प्रस्तावों को सर्वसम्मति का साथ न देने वाले देशों का फायदा उठाकर निष्फल करने में सफल रहा है। नीदरलैंड के शहर हेग स्थित अंतर्राष्ट्रीय सागरीय विवाद निपटारा न्यायाधिकरण ने 12 जुलाई, 2016 को फिलीपींस की सीमा में पड़ते इलाके पर चीन के सभी दावों को खारिज करते हुए एकदम स्पष्ट फैसला फिलीपींस के हक में दिया था। चीन ने उक्त फैसले को मानने से साफ इनकार कर दिया है।
अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने 25 जून को चीन पर करारा हमला बोलते हुए कहा कि भारत, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया और अन्य देशों को चीन से दरपेश खतरों के मद्देनजर अमेरिका हिंद-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में और ज्यादा नौसेना तैनात करने जा रहा है। पोम्पियो ने संकेत दिया कि भारत जैसे शांतिप्रिय मुल्क को चीन से होने वाले खतरे के मुद्दे पर उन्होंने यूरोपियन यूनियन के सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों से भी मंत्रणा की है। उन्होंने इस प्रसंग को वियतनाम, इंडोनेशिया और मलेशिया को चीन से मिलने वाली धमकियों से जोड़ा है। ताइवान, जापान, फिलीपींस, वियतनाम, इंडोनेशिया, ब्रुनेई और मलेशिया के साथ समुद्री सीमा विवादों पर चीन की मनमानी अंतर्राष्ट्रीय कानून को धता बताने का सबूत हैं। पोम्पियो के बयान के तुरंत बाद अमेरिका ने हिंद-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में अपने परमाणु शक्तिचालित नौसैन्य बेड़ों को तैनात कर दिया है। भारत को भी चाहिए कि वह हाल ही में बने ‘चौकड़ी’ नामक गठजोड़ के साथ नौसैन्य सहयोग को बढ़ाए। इस गुटबंदी में अमेरिका, जापान, भारत एवं ऑस्ट्रेलिया हैं। ‘चौकड़ी’ का निर्माण हिंद-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में चीन की सीमा संबंधी चुनौतियों का सामना आपस में समन्वय बनाकर करने हेतु किया गया है।
अब एशिया से, चीन की विस्तारवादी ‘वन बेल्ट-वन रोड’ नामक योजना के खिलाफ आवाज उठी है। लेकिन अपनी विशाल अर्थव्यवस्था, रिवायती और परमाणु अस्त्र भंडार के दम पर चीन का वैश्विक प्रभाव कायम रहेगा। वह भारत का अपने पड़ोसी मुल्कों जैसे कि बांग्लादेश और नेपाल पर बना प्रभाव भी घटाने में लगा हुआ है। इसलिए जहां चीनी माल पर प्रतिबंध लगाना महत्वपूर्ण है वहीं चीन पर दबाव के लिए हम अन्य क्षेत्रीय एवं वैश्विक शक्तियों के साथ मिलकर काम करें। उसके साथ सैन्य, राजनयिक और अन्य वार्ताओं का दौर जारी रखा जाना चाहिए। इस दौरान लद्दाख और समूची सीमा पर जहां कहीं भी हमें सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ता रहा है, उनसे निपटने का माकूल उपाय हाथों-हाथ करते रहना होगा।

लेखक पूर्व राजनयिक हैं।

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