स्पष्ट नीति दूर करेगी भ्रम व तनाव
वैश्विक कोरोना महामारी ने केवल स्वास्थ्य और कारोबार को ही बुरी तरह प्रभावित नहीं किया, बल्कि देश के करोड़ों विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर भी चिंता पैदा कर दी। मार्च में लागू लॉकडाउन के बाद से ही शिक्षण संस्थाएं बंद हैं। ऐसे में परीक्षाओं का संकट गहरा गया है। अभिभावक व छात्रों को चिंता है कि कहीं यह अकादमिक वर्ष यूं ही जाया न चला जाये। विडंबना यह है कि देश का शैक्षिक ढांचा विविधता और अंतर्विरोधों से भरा है। तमाम केंद्र, राज्य सरकारें, केंद्रीय नियामक संस्थाएं और देश के तमाम बोर्ड अपनी डफली अपना राग गा रहे हैं। निस्संदेह सरकारें और संस्थाएं छात्रों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। मगर उनके फैसलों में एकरूपता व दूरदृष्टि का अभाव नजर आता है। छात्रों से जुड़े निर्णय टुकड़ों-टुकड़ों में आते हैं और केंद्र व राज्यों के फैसलों में साम्य नजर नहीं आता। यही वजह है कि अभिभावकों व छात्रों में भ्रम की स्थिति बनी रहती है। देश के कई राज्य परीक्षाएं कराने तथा कुछ राज्य छात्रों को पिछले परिणाम के आधार पर अगली कक्षा में प्रोन्नत करने की बात करते रहे हैं। अब अकादमिक कैलेंडर में व्यवधान के बीच यूजीसी के निर्देश आये हैं कि विभिन्न विश्वविद्यालयों में सितंबर के अंत तक ऑफलाइन, ऑनलाइन या मिश्रित मोड़ में अंतिम वर्ष के छात्रों की परीक्षा आयोजित की जायेगी। इन निर्देशों ने कई तरह के सवालों को जन्म दिया है। मसलन ऐसे में जब देश में कोरोना संकट का प्रसार चरम पर है और संक्रमण के मामले में देश दुनिया में तीसरे नंबर पर आ गया है, तो इस बात की क्या गारंटी है कि सितंबर तक परीक्षाएं कराने के लिए अनुकूल माहौल बन पायेगा? कोरोना संकट के चलते छात्र परेशान हैं और अभिभावक उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं, तो क्या सितंबर में परीक्षाएं एक सामान्य प्रक्रिया रह पायेगी?
समय की मांग है कि छात्रों के सर्वोत्तम हित में दूरगामी दृष्टिकोण रखते हुए सामंजस्य के साथ कदम आगे बढ़ाए जायें। महानगरों में विश्वविद्यालय बंद होने के बाद देश के दूर-दराज में रहने वाले छात्र अपने गांव-घर लौट चुके हैं। जहां पुस्तकें व अन्य सहायक सामग्री की उपलब्धता सहज नहीं है। सभी छात्रों को कंप्यूटर व स्मार्ट फोन उपलब्ध नहीं या फिर इंटरनेट की सुविधा पर्याप्त नहीं है। ऐसे में ऑनलाइन पढ़ाई का औचित्य पूरा हो पायेगा? उन्हें नहीं पता कि क्या अध्ययन करना है, कैसे करना है। ऐसे में निश्चित रूप से ये छात्र साधन-संपन्न  इलाकों के छात्रों से पिछड़ जायेंगे। ऐसे में नये-नये नियम कानून इस असामान्य स्थिति में भ्रम व तनाव ही पैदा करते हैं। स्थिति को जटिल बनने से रोका जाना चाहिए। इस बात के प्रयास होने चाहिए कि पढ़ाई को कैसे सुचारु ढंग से चलाया जाये और परीक्षाएं कैसे विघ्न-बाधाओं के बिना संपन्न की जाएं। निस्संदेह महामारी अपनी किस्म की बड़ी चुनौती है और इसके लिए देश तैयार नहीं था। ऐसे में ऑनलाइन पढ़ाई का विकल्प तो चुना जा रहा है, लेकिन यह कॉलेज व विश्वविद्यालय परिसरों में होने वाली पढ़ाई का विकल्प नहीं हो सकता। अध्यापन के अलावा शिक्षण संस्थाओं का परिवेश और पाठ्य सहगामी क्रियाओं से छात्रों के व्यक्तित्व के विकास को संपूर्णता मिलती है जो घर बैठे होने वाली पढ़ाई से संभव नहीं है। बहरहाल, देशकाल परिस्थितियों के अनुरूप ही ढलना होगा। ऐसे में चुनौतियों के मुकाबले के लिए शिक्षा नीति-निर्धारकों व क्रियान्वयन करने वाली संस्थाओं को इस दिशा में गहन मंथन करना होगा। नीतियों की अस्पष्टता भ्रम व तनाव बढ़ाने वाली होगी। छात्रों का मनोबल बढ़ाना भी जरूरी है। इस दिशा में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने महामारी के चलते वर्ष 2020-21 के शैक्षिक सत्र हेतु नौवीं से लेकर बारहवीं तक के पाठ्यक्रम में तीस फीसदी की कटौती की है। ऐसे वक्त में जब देश के स्कूल-कॉलेज बंद हैं और कक्षा की पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा है तो इस कदम का स्वागत ही होना चाहिए।

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