जंगल के रोमांच की साझेदारी
पुस्तक समीक्षा
ज्ञानेन्द्र रावत
राजस्थान की सीमा पर अरावली की पहाड़ियों के पूर्व में स्थित सवाई माधोपुर जिलांर्तगत रणथंभौर बाघ अभयारण्य देश में बाघ परियोजना का पर्याय है। अरावली और विन्ध्य पर्वत शृंखलाओं के बीच अवस्थित यह इलाका लहरदार सूखे पतझड़ी जंगलों और उष्णकटिबंधीय झाड़ी वाले पेड़ों और हमेशा बहने वाली जल धाराएं, तालाबों और झीलों से घिरा हुआ है। वन्य जीवों, जल जीवों और जंतुवर्गीय श्रेणी की सैकड़ों प्रजातियों के लिए सर्वोत्तम होते हैं।
वनाच्छादित क्षेत्र का स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र के शीर्ष पर रहे बाघ के साथ-साथ छोटे वन्यजीवों और वनस्पतियों पर भी निर्भर होता है। बाघ इस तंत्र का महत्वपूर्ण अंग है। इसकी परिस्थिति, प्रकृति, व्यवहार और बाघ के आचरण के बारे में सिलसिलेवार ढंग से अनछुए तथ्यों को उजागर करने का अभूतपूर्व काम किया है अपनी पुस्तक ‘बाघ के साथ मेरी मुठभेड़’ में प्रख्यात वन्यजीव विशेषज्ञ, वन्यजीवों के बीच जीवन के 37 वसंत गुजारने वाले वन संरक्षक दौलत सिंह शक्तावत ने।
शक्तावत ने खुलासा किया है कि आमतौर पर बाघ एकांत प्रिय होता है। लेकिन उनका सामाजिक जीवन भी होता है। वह अपने बच्चों को न केवल शिकार करना, उसके तरीके सिखाता है, शिकार के मांस को साझा करने के बारे में बताता है बल्कि बच्चों के शरारत करने पर डांटता भी है। यदि फिर भी बच्चा नहीं मानता तो वह अपनी गर्जना से उसे डराता भी है। वह किस तरह अपने शावकों का पालन-पोषण करता है, पालक की भूमिका का निर्वहन करता है, उनको भोजन उपलब्ध कराता है और जंगल में जीवित रहने का सबक सिखाता है। उनके अनुसार एक स्वस्थ बाघ जो जंगल में स्वतंत्र रूप से स्वच्छंद विचरण करता हो, उसका वहां एक बहुत बड़े भू-भाग पर कब्जा हो, को अब प्राणी उद्यान में एक सीमित क्षेत्र में पिंजरे में बंद प्राणी की तरह कैद देखना वास्तव में बहुत ही दुखद है। प्राणी उद्यान में कभी-कभी यह बेहद जरूरी भी हो जाता है। इसके अतिरिक्त पुस्तक में उन्होंने इनसानों पर हमला करने वाले रहस्यमयी तेंदुए की कहानी सहित रणथंभौर में वन एवं वन्यजीवों की रक्षा में अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले ज्ञात-अज्ञात नायकों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है।
प्रस्तुत पुस्तक में 20 अगस्त, 2010 को हुई ‘बाघ के साथ मेरी मुठभेड़’ के उन रोमांचकारी और अविस्मरणीय अनुभवों को हमारे सबके साथ साझा करने का प्रयास किया है, जिसने उस मुठभेड़ के बाद उनके मृतप्राय होने जैसे अनुभवों ने सांसारिक चीजों के क्षणिक होने का अहसास कराया था। सच तो यह है कि एक आक्रामक बाघ के साथ मुठभेड़, बिल्कुल मृत्यु के द्वार से लौटने जैसा अनुभव है। उनके अनुसार ढाई साल जीवन से संघर्ष के दौरान दैवीय कृपा से नया जीवन पाने के बाद अपने गुरु पद्मश्री कैलाश सांखला और फतेह सिंह राठौड़ की सीख ‘कि जंगल में दिखाई पड़ने वाली हर चीज को बारीकी से देखो और फिर डायरी में दर्ज कर लो’ के अनुसार अपने इस महत्वपूर्ण वन्यजीवन के सेवाकाल के अनुभवों के सहेजे दस्तावेजों को एकत्रित करने का काम किया। इसीलिए पुस्तक महत्वपूर्ण है और यह बताती है कि उन्होंने वन्य जीवन खासकर बाघ के बारे में जो समझ विकसित करने का कार्य किया है, कम से कम उसे जानने-समझने की हमें बेहद जरूरत है।
पुस्तक : बाघ के साथ मेरी मुठभेड़ लेखक : दौलत सिंह शक्तावत अनुवादक : अक्षय कुमार सिंह चौहान प्रकाशक : नियोगी बुक्स, नई दिल्ली पृष्ठ : 144 मूल्य : रु. 595.
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