शक्ति वर्मा

पौराणिक चरित्रों पर उपन्यास और कहानी लिखने की परंपरा हिंदी साहित्य में बहुत पुरानी है। डॉ. विनय ने उस परम्परा को न सिर्फ आगे बढ़ाया है बल्कि उसे समृद्ध भी किया है। उन्होंने महाभारत के कई चरित्रों को अपनी लेखनी के माध्यम से सृजित किया है। महाभारत का चरित्र अर्जुन वह किरदार है, जिसके पराक्रम के सहारे पांडवों ने जीत हासिल की। महाभारत के रणक्षेत्र में पांडवों की तरफ से विरोधियों के हथियारों का सबसे अधिक सामना अर्जुन ने ही किया। संभवतः इसीलिए डॉ. विनय ने इस उपन्यास का नाम सीधे अर्जुन न रखकर गाण्डीवधारी अर्जुन रखा।
उपन्यास की शुरुआत ‘जनम’ अध्याय से होती है। इसमें बताया जाता है कि महाराजा पाण्डु ने किंदम मुनि कुमार के द्वारा शाप दिए जाने के कारण राज्य त्याग कर वानप्रस्थ जीवन ग्रहण किया था। ताकि वे ब्रह्मा जी के दर्शन कर कुंती और माद्री के पुत्रवती होने का वरदान हासिल करें ताकि पितृऋण से उऋण हो सकें। फिर पाण्डु की इच्छा के अनुरूप कुंती पूर्व में प्राप्त गुरुमंत्र के माध्यम से देवताओं का आह्वान करती हैं और इस प्रकार पांचों पांडवों का जन्म होता है।
कुंती अर्जुन के लिए देवराज इन्द्र का आह्वान करती है और फिर देवराज की कृपा से जो पुत्र प्राप्त हुआ वही अर्जुन कहलाया। और फिर हम पाते हैं कि अर्जुन ने महाभारत की लड़ाई में अपने शौर्य और पराक्रम से करीब-करीब अकेले ही विजय की गाथा लिख डाली। हां, इसमें भीम, अभिमन्यु जैसे योद्धाओं का भी थोड़ा बहुत योगदान रहा। हां, यह जरूर है कि अगर वासुदेव श्रीकृष्ण नहीं होते तो हो सकता है कि अर्जुन के पराक्रम का वैसा असर नहीं दिखता।
इसके बाद के अध्यायों—बालक अर्जुन की शिक्षा-दीक्षा, द्रोपदी स्वयंवर, अर्जुन का वनवास, अर्जुन की दिग्विजय, अर्जुन की तपस्या और दिव्यास्त्रों की प्राप्ति समेत 19 अध्यायों में महाभारत के इस महापराक्रमी की वीरता का वर्णन किया गया है। वैसे देखें तो अर्जुन को उनकी योग्यता के अनुरूप इतिहास में स्थान नहीं मिला है। गंगापुत्र भीष्म, युधिष्ठिर, श्रीकृष्ण, द्रोणाचार्य जैसे पात्रों जितनी प्रसिद्धि नहीं मिली। जबकि जब भी पांडवों पर संकट आता है तब अर्जुन को मोर्चे पर लगा दिया जाता है।
संभवतः इसीलिए पूरे उपम्यास में लेखक अर्जुन के दूसरे पक्ष पर बात नहीं करता, उनको केवल शूरवीर के तौर पर चित्रित कर अतिविशिष्ट महत्व प्रदान करता है। यद्यपि लेखक ने पौराणिक कथा में कोई परिवर्तन नहीं किया है, तथापि सभी पात्र और संपूर्ण कथानक, प्रेरणा और शक्ति के स्रोत तथा प्रासंगिक प्रतीत होते हैं और यही इसकी विशिष्टता है।
उपन्यास की भूमिका में डॉ. विनय लिखते हैं कि ‘हमने इन अमर पात्रों को औपन्यासिक शैली में चित्रित करने का प्रयास किया है। यह उपन्यास नहीं है, न जीवन चरित्र… कहीं कुछ दोनों का संगम बन पड़ा है। हमने पूरा प्रयास किया है कि उनका महाभारतीय चरित्र यथावत बना रह सके और उनमें से मानवीय सहजता की अभिव्यक्ति भी हो सके।’ लेखक की इस स्वीकारोक्ति के बाद उपन्यास को सिर्फ एक कहानी के तौर पर पढ़ा जाना चाहिए दूसरे किसी साहित्यिक कसौटी पर कसना सही नहीं है।
पुस्तक : गाण्डीवधारी अर्जुन लेखक : डॉ. विनय प्रकाशक : डायमंड पाकेट बुक्स, नई दिल्ली पृष्ठ : 160 मूल्य : रु. 150.

The post अर्जुन की शौर्यगाथा का सरलीकरण appeared first on दैनिक ट्रिब्यून.



from दैनिक ट्रिब्यून https://ift.tt/3eljkmp
via Latest News in Hindi

0 Comments