एक इंकलाबी शायर की विदाई
चंद्र त्रिखा
सात जून को कोरोना का टेस्ट नेगेटिव आया तो बोले थे, ‘हरा दिया न ससुरे को, बड़ी दहशत फैला रखी थी।’ लौट आए, नोएडा स्थित अपने आवास पर। मगर चांदनी चार दिन चली और 12 जून की बाद दोपहर सांसों की डोरी टूट गई। तीन सप्ताह गाड़ी और खिंच जाती तो 94 वर्ष के हो जाते।’
अपने वक्त में ‘इंकलाबी शायर’ के रूप में जाने गए इस महान अदीब का जन्म 7 जुलाई, 1926 को दिल्ली की गली कश्मीरियां में हुआ था। उम्र के इस मोड़ पर भी दिल्ली के कमोबेश हर मुशायरे में शिरकत करते थे। कहते थे दिल्ली में मुशायरा हो और ‘दिल्ली वाला’ ही गायब हो तो क्या खाक महफिल जमेगी। गुलज़ार साहब हालांकि गालिब और मीर को अक्सर उद्धृत करते थे, मगर जब बात ‘शायरी’ के ‘स्कूल’ की आती तो बड़े गर्व से स्वयं को दाग-देहलवी की परंपरा से जोड़ते थे। बताते थे, ‘मेरे पिता मोहतरम त्रिभुवन नाथ ज़ुत्शी भी लिखते थे, तखल्लुस था ‘ज़ार देहलवी’’ और वह उस्ताद ज़ौक के शागिर्द थे।
एक समय था, जब दिल्ली में शायरी की महफिलों का रिवाज़, मुशायरों से भी ज़्यादा था। ये महफिलें अक्सर सर्दियों की शामों में होती थी। सिर्फ चुनींदा लोग ही बुलाए जाते। बत्तियां गुल हो जातीं और नीम अंधेरे में एक बड़ी सी शम्मां रोशन कर दी जाती। ज़्यादातर मौकों पर शम्मां-रोशन करने की रस्म गुलज़ार साहब से ही कराई जाती। सफेद अचकन, सफेद ही चूड़ीदार पायजामा, सिर पर नेहरू-टोपी और गले में मोतियों की माला पहने रखते। माला में दो लॉकेट भी होते। एक लॉकेट में कृष्ण की छोटी-सी मूर्ति और दूसरे में कुरान की एक आयत होती। बार-बार दोहराते, उर्दू सिर्फ एक ज़ुबान नहीं है। इसकी अपनी एक तहज़ीब भी है।
बगावती तेवर शुरुआती दौर में ही अपना रंग दिखाने लगे थे। सिर्फ नौ वर्ष की उम्र में ही अपना अंदाज़ बता दिया था :-
‘चमन जो कौम का, सूखा पड़ा है एक मुद्दत से/
उसे अपने लहू से सींच कर गुलशन बना दूंगा/’
स्वाधीनता संग्राम में उनके निरंतर जूझते रहने के कारण ही उन्हें इंकलाबी शायर कहा जाने लगा था। गांधी, नेहरू के साथ भी मंच साझा कर चुके थे। बड़े शायरों की फेहरिस्त तो लम्बी है जिनके साथ मुशायरों में शिरकत कर चुके थे। उनसे मुलाकात का एक मौका वर्ष 1974-75 में मिला था। तब भी लगा था, यह शख्स सनक की हद तक उर्दू का सबसे बड़ा प्रहरी भी है और सबसे मुखर तरफदार भी है। उस दिन उन्होंने फैज़ अहमद फैज़ साहब को भी घर पर दावत दी थी। फैज़ साहब ने आशंका व्यक्त की थी कि ‘उर्दू का भविष्य भारत में अंधेरा-सा दिखाई देता है।’
गुलज़ार साहब को यद्यपि उर्दू अदब की पहचान व उर्दू की तहज़ीब अपने पिता प्रोफेसर त्रिभुवन नाथ ज़ुत्शी ‘ज़ार देहलवी’ से ही मिल गई थी, मगर अपनी शायरी में वह अपना उस्ताद, ‘सायल देहलवी’ को ही मानते थे। उन्होंने खुद ही इस बात की तस्दीक कर दी थी :-
‘सायल’ की ज़बां, ज़र की बोली मेरी/
सायल ने सिखाए हैं अबद के उसलूब,
कैफी से तलामज़ का शरफ रखता हूं/
उर्दू के सिवा कुछ नहीं मुझको मतलूब/
यहां कैफी से उनकी मुराद पंडित ब्रज मोहन दत्तात्रेय ‘कैफी’ (1866-1955) से थी, न कि क़ैफी आज़मी साहब से। उर्दू की भाषायी गरिमा के बारे में जितना संजीदा रुख उनका था, उतना शायद अब की वर्तमान पीढ़ी में किसी उर्दू दां का भी होगा। उनका तेवर देखें :-
तारीखे वतन, हुस्न, वफ़ा है उर्दू/
हर ज़र्रे पे भारत के िफदा है उर्दू/
आज़ादी की तहरीक पे डालो तो नज़र/
खुल जाएगा ये राज़ कि क्या है उर्दू/
गुलज़ार साहब को सबसे बड़ी तकलीफ व शिकायत साम्प्रदायिक सोच से थी। अक्सर उन्हें बेहद स्वाभिमानी व जि़द्दी किस्म का इनसान माना जाता था। अड़ जाते तो बस अड़ जाते। उर्दू में, ‘साइंस की दुनिया’ नामक पत्रिका शुरू करने के लिए वह पंडित नेहरू से भी उलझ पड़े थे और आखिर वह पत्रिका निकलवाकर ही दम लिया।
कुछ लोग उन्हें उर्दू अदब के मामले में ‘दिल्ली का दादा’ भी कह देते थे। उनके बिना दिल्ली में कोई भी उर्दू मुशायरा सम्पन्न नहीं हो सकता था। उनकी ग़ज़लों की रवानगी को अक्सर उस्ताद शायर अपने शागिर्दों के सामने रखा करते थे। उनकी शायरी का एक नमूना देखें :-
उस सितमगर की मेहरबानी से/ दिल उलझता है, जि़ंदगानी से
खाक से कितनी सूरतें उभरीं/ धुल गए नक्श कितने पानी से
हम से पूछो तो ज़ुल्म बेहतर है/ इन हसीनों की मेहरबानी से
और भी क्या कयामत आएगी/ पूछना है तेरी जवानी से
दिल सुलगता है, अश्क बहते हैं/ आग बुझती नहीं है पानी से।
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