कहानी

चित्रेश

चित्रांकन : संदीप जोशी

मन में अजीब-सी हिचक और ऊहापोह थी। मैं गुरु बाबा के आश्रम की तरफ साइकिल घसीटता बढ़ तो रहा था, किन्तु अनमना सा! घर से तीन-चार सौ मीटर चकरोड, फिर पांच किलोमीटर ‘प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना’ से बनी चिकनी समतल राह… आगे दो किलोमीटर ऊबड़-खाबड़ खड़ंजा… यह पूरा रास्ता मैंने गहरे मानसिक द्वंद्व के बीच तय किया। अब मैं नदी की तरफ धूल भरी पगडंडी पर चल रहा था।
रेत तो करीब आधा किलोमीटर पहले ही आ गयी थी, अब चढ़ाई भी शुरू हो गयी। मैं साइकिल से उतर गया। सिर उठाकर आसमान की तरफ देखा, मध्य अक्तूबर की साफ-सुथरी दोपहरी ढलने वाली थी। रेतीली राह के बीच से साइकिल धकेलता मैं नदी के टीले पर चढ़ आया, यहां नदी के उस पार गुरु बाबा के आश्रम वाले मन्दिर के हवन कुंड से उठती मिठास भरी साैंधी गमक छिटकी थी।
मैंने ऊंचाई पर खड़े-खड़े एक सरसरी निगाह पीछे छूटी झाड़-झंखाड़ों से भरी पगडंडी पर डाली। दो-तीन लोग इस तरफ आते दिखे। दीनू अभी काफी पीछे होगा। उसकी साइकिल के कैरियर और फ्रेम के बीच चढ़ावा के सामान की बोरियां हैं, लिहाजा साइकिल घसीटता पैदल आ रहा है।
दादी ने जैसा बताया था, टीले पर पचास कदम आगे खूब बड़ा बरगद का पेड़ खड़ा था। मैं रास्ते के बगल आम के एक पेड़ से साइकिल टिकाकर बरगद की तरफ बढ़ने लगा। तभी नदी के किनारे से आवाज आई ‘ए लरिका बाबू…’
मैंने देखा, नीचे सवारियों से भरी नाव खुलने वाली थी। घटवार मुझे भी इसी खेवा में पार होने के लिए बुला रहा था। इधर किशोरवय के बच्चों को सम्मानपूर्वक सम्बोधित करने के लिए ‘लरिका बाबू’ कहने का रिवाज है। मैंने हाथ के इशारे से उसको मना किया और बरगद की दिशा में बढ़ने लगा… दादी ने सच कहा था, आधी दूरी तय करते-करते भव्य मन्दिर का लम्बा-चौड़ा परिसर और वहां की गहमा-गहमी दिखने लगी थी। बरगद की मिट्टी के बाहर ऊपर की तरफ उभरी जड़ पर खड़े होने पर परिसर से लगी बाग का बड़ा हिस्सा, कोठारी महाराज की गद्दी और गोदाम निगाह के सामने आ गया…
बाग में चार-पांच लग्जरी गाड़ियां खड़ी थीं। एक महिन्द्रा पिकअप जैसी गाड़ी गोदाम के सामने से आगे बढ़ गयी। सम्भवतः यह किसी यजमान का आश्रम के लिए चढ़ावा लेकर आ रही होगी। इसी समय एक नई-सी मार्शल मन्दिर के सामने रुकी। दो भारी-भरकम व्यक्ति आगे से उतर कर मन्दिर के परिसर में चले गये। करीब पांच मिनट बाद उनमें से एक, दो स्वयंसेवकों के साथ लौटा और गाड़ी के पिछले व बीच के हिस्से से सामान निकलवाकर कोठारी की गद्दी के सामने रखवाने लगा। तीन बड़े पीपे तो घी के ही थे। बाकी ठसाठस भरी बोरियां… छह या सात रही होंगी। निश्चय ही इसमें मैदा, चावल और शक्कर होगा। मेरे मन में आया, यह गुरु बाबा को दक्षिणा भी पांच-सात हजार से कम क्या देंगे? इसके साथ ही मेरी जेब में दादी के दिये दक्षिणा के दो सौ इक्यावन रुपये चुभन-सी पैदा करने लगे।
इस बीच दो बोलेरो और एक चमचमाती सफारी भी मन्दिर के सामने आ लगी थी। इन गाड़ियों से भी सामान उतारने का सिलसिला शुरू हुआ। मेरा मन बैठने लगा। अभी सामने दादी होतीं तो मैं कहता— ‘देखो दादी, यह है भक्ति और आस्था का तूफान! लोग चमचमाती गाड़ियों पर चढ़ावा लादकर भागे चले आ रहे हैं…।’
‘गोमती मैया की जय…’ जयकारा के समवेत स्वर से मेरी विचार शृंखला भंग हो गयी। मैंने देखा, नाव बीच धारा में पहुंच गयी थी और रिवाज के अनुसार घटवार के साथ लोग जैकारा लगाए थे।
मैं बरगद की जड़ पर बैठ गया और मन्दिर की तरफ देखने लगा। थोड़ी देर में नाव अगले घाट पर पहुंच गई। सवारियां अपनी राह लग गईं और घटवार नाव बांधकर ऊपर मन्दिर के पीछे बस्ती कर तरफ निकल गया। कुछ समय बीता होगा, टीले पर चढ़कर तीन मजदूर जैसे लोग मेरे पास आ रुके। एक ने लाल अंगोछा चेहरे पर फेरते हुए पूछा—‘कितना समय हुआ खेवा लगे?’
‘यही कोई बीस-पच्चीस मिनट हुआ होगा। घटवार बस्ती की तरफ गया है।’ मैंने बताया।
‘हूं…’ दूसरे ने सोचते हुए कहना शुरू किया—‘अब वह करीब घंटा भर घर का काम निपटाएगा। जैसे ही घाट पर बारह-पन्द्रह लोगों को देखेगा, नाव खोलने आ जाएगा…।’
उन तीनों ने बीड़ियां सुलगा ली थीं और आराम से बैठकर निजी बातों में व्यस्त हो गए थे। मेरा ध्यान पुनः मन्दिर परिसर में जा टिका था। अभी-अभी एक आयशर ट्रक आया था और उससे उतरकर सात-आठ लोग कोठारी महाराज की गद्दी के सामने जमा थे। मुझे लगा, यह मेरे गांव जैसे किसी खूब आबाद गांव का सामूहिक चढ़ावा होगा, दो दिन बाद मेरे यहां से भी दो ट्रैक्टर आने हैं। हफ्ते भर पहले मैं वैसे ही लम्मरदार के टोले की तरफ जा निकला था। वहां कुछ लोगों का जमावड़ा देखकर रुक गया। लम्मरदार यानी दीपनारायण सिंह कह रहे थे—‘आप सब पूरे गांव में खबर फैला दें। मेरा और राजशेखर का ट्रैक्टर बाबा जी के आश्रम का चढ़ावा लेकर जायेगा जो गद्दी तक माथा टेकने जाना चाहते हैं, वे भी चलें। बाकी सबके सामान की लिस्ट होगी। सैकड़ों गांव से चढ़ावा जाता है, हमारे गांव की किरकिरी नहीं होनी चाहिए। इसलिए सब दिल खोलकर…’
मैं सभा से सीधे घर आ गया था। इन दिनों दादी गुरु बाबा के आश्रम के तिसाला चढ़ावा को लेकर परेशान थीं। दो रोज पहले कह रही थीं—‘इस बार तुम दीनू को लेकर आसरम का चढ़ावा पहुंचा आओ। पिछली बार तुम्हारे बाबू के न रहने की वजह से कुछ नहीं जा पाया था…।’
मैं दादी को खोजता, पिछवाड़े हाते की तरफ निकल गया। वहां दादी तुलसी चौरा लीप रही थीं। मैंने जल्दी-जल्दी सारी बात बताकर कहा ‘दादी, क्या जरूरत है हमारे जाने की? हमारा चढ़ावा और दक्षिणा वैसे ही पहुंच जायेगा…।’
‘नहीं…’ दादी ने मेरे उत्साह पर पानी फेर दिया—‘किसी का पिछलग्गू होना गलत है। भीड़ में सिर्फ अगुआ की पहचान बनती है और किसी की नहीं। भले ही तुम्हारी उम्र कम है, लेकिन मर्द हो, तुम्हें सब कहीं जाना चाहिए। लोग जानेंगे कि तुम इस गांव के फलाने सिंह के नाती हो, तो ऐसा नहीं कि इज्जत के लाले पड़ेंगे…।’
दादी को मैं कैसे समझाता कि फलाने यानी कर्मराज सिंह की कभी तूती बोलती रही होगी, मगर अब… खासकर बाबूजी की मृत्यु के बाद हम किस खेत की मूली रह गए हैं, इसका कोई हिसाब नहीं! अभी डेढ़ साल गुजरा होगा, गुरु बाबा हमारे यहां आये थे। मुझे नहीं लगता कि उनकी बड़ी-बड़ी चमकती आंखों से हमारी फटेहाली छिप पाई होगी… उस दिन अजीब शर्मनाक स्थिति बन गई थी। तीन दिन से मिट्टी का तेल समाप्त था और कई घरों में मांगने पर भी उस रोज नहीं मिला। बैठक में बाबा जी का आसन लगा था, वहां उजाला कैसे होता…?
दादी की अक्ल की दाद देनी पड़ेगी। उन्होंने गाय के घी के दीपक बनाये और बैठक के हर ताखे में रख दिया। मुझे पक्की हिदायत थी कि जैसे ही कोई दीपक धीमा पड़ने लगे, उसकी रूई की बत्ती आगे कर दूं। मैंने इसका बखूबी पालन किया। करीब नौ बजे तक तो गांव के लोग बाबा से मिलने ही आते रहे। बाबा जी स्वपाकी हैं। बैठक में ही चौका लगाकर उन्होंने अपना भोजन तैयार कर लिया था। साढ़े दस बजे के बाद वे सोने के लिए तख्त पर लेटे। इस बीच दीपक नहीं बुझने पाये, पूरे समय बैठक में उजाला बना रहा। मगर एक आशंका भरी धुकधुकी बराबर लगी रही—अगर कहीं हवा का तेज झोंका आ गया तो…? एक तरह से राम-राम करते इज्जत बची थी…।
अब आज… दादी में गजब की उमंग थी। उन्होंने पच्चीस किलो मैदा, पांच किलो घी, दस-दस किलो आलू और महीन चावल, सात किलो शक्कर वगैरह की व्यवस्था के साथ पता नहीं कैसे दक्षिणा के पैसे का जुगाड़ बना लिया था। दीनू को सारा सामान बंधवाकर उन्होंने मुझे चेताया था—‘यह सब कोठारी महाराज की गद्दी पर जमा करना, वह रुक्का देंगे, तू उसी रुक्का के साथ दक्षिणा रखकर गुरु बाबा के चरण छू लेना।’
मैंने अनमने भाव से हामी भर ली। मेरे पास और कोई रास्ता भी नहीं था। अभी कल ही मैंने मां को समझाने का प्रयास किया था—‘अम्मा! गांव वालों के साथ अपना चढ़ावा भेजने का फायदा यह होगा कि हम बेइज्जती से बच जायेंगे। बेइज्जती का मतलब ऐसा कुछ नहीं कि कोई गाली दे दे, दुत्कारे या हाथ उठाये। हल्की नजर से देखा जाना भी अपमान होता है। आज के चमक-दमक वाले जमाने में हमारे जैसे साइकिल पर गठरी ढोने वालों की क्या वकत होगी?’
‘बेटा, दादी के मन की मौज है, वे किसी की नहीं सुनेंगी।’ मां ने कहा—‘पका आम हुई हैं, कब टपक पड़े, कोई ठिकाना नहीं! जैसा कहती हैं, कर डालो, नहीं तो बाद में सोचने को हो जायेगा। तुम्हारी बात गलत नहीं है, लेकिन जैसे सब कहीं तौहीन हो रही है, एक जगह और सही!’
मैं भारी मन से सुबह निकला था…। इस बीच उधर वाले घाट पर काफी सवारियां आ गई थीं। इस तरफ भी बारह-तेरह लोग एकत्र हो गये थे। इधर एक व्यक्ति के पास मोबाइल था। वह अपने साथियों को मोबाइल बजाकर गाना सुना रहा था। अभी ‘शीला की जवानी’ का गाना शुरू था। ज्यादातर लोगों का ध्यान उधर ही था। मैं दीनू की खोज खबर लेने रास्ते के सामने वाले टीले पर आ गया। थका-सा दीनू भी साइकिल घसीटता हुआ दिखाई पड़ा। मैं नीचे चला गया और दीनू की साइकिल ठेलवाकर टीले पर चढ़वाया, फिर हम नदी के किनारे आ गये।
बीस-पच्चीस मिनट बाद नाव किनारे आ लगी। आने वाली सवारियां अपनी राह चली गईं। हम नाव पर चढ़ गए। अपनी साइकिल मैंने घटवार की इस तरफ की मड़ई में ताला मार के छोड़ दिया था। घटवार ने नाव खोलकर खेते हुए दीनू की साइकिल की गठरियों पर निगाह जमाकर पूछा ‘बाबू, ई आसरम का चढ़ावा है का?’
‘ओर नहीं तो का!’ मेरी जगह दीनू ने जवाब दिया।
‘बूंद-बूंद से सागर भरता है। बाकी गुरु महाराज का ऐसा परताप है कि जजमान गाड़ी-मोटर में लाद के चढ़ावा ला रहे हैं। इस बार के भंडारे में सवा लाख भगत प्रसाद पायेंगे…’ घटवार गुरु बाबा के गुणगान में क्या-क्या कहता गया, इस पर मैंने ध्यान नहीं दिया। हां, यह बात पूरी शिद्दत से मुझे कचोटने लगी कि हम एक बड़ी जगह जा रहे हैं, अपने छोटेपन के साथ! जब चढ़ावा घटवार की निगाह में हल्का है तो कोठार क्या सोचेगा? गुुरु बाबा की निगाह में हमारी क्या कीमत होगी?
नाव धीमी गति से आगे बढ़ रही थी। मेरे मन में ऊहापोह मची थी। जबकि सवारियों के बीच गुरु बाबा के गुणगान की होड़ लगी थी। यहां तक कि दीनू भी चर्चा में शामिल हो गया था। अभी-अभी उसने बीड़ी सुलगाई थी और एक टान लगा के मुंह से धुआं उगलते हुए तुक्का जड़ा था—‘अब इन्हीं सब महापुरुषों का पुन्न-परताप है, जो इस घनघोर कलजुग में धरती माता टिकी हैं, नहीं तो कब की गच्च से रसातल में समा गयी होतीं…’
नाव के ज्यादातर लोग उससे सहमत थे। किनारे की तरफ बैठा मोबाइल वाला और उसके साथी खिल्ली उड़ाने के अंदाज में एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराये थे। मैं चुपचाप सब देख और सुन रहा था। मुझे लगा, मुस्कुराने वाले ऐसे शख्स हैं, जो गुरुओं-बाबाओं और आश्रमों के सारे क्रिया-कलापांे को व्यावसायिक वृत्ति और जन-सामान्य के बीच अपना दबदबा बनाए रखने के हथकंडे के रूप में देखते हैं। मेरे ही गांव में इस प्रवृत्ति के काफी लोग होंगे।
नाव मझधार में पहुंची तो घटवार के साथ सबने ‘गोमती मैया’ का जयकारा लगाया। इसके बाद मैं इस आकलन में व्यस्त हो गया कि आखिर हर तीसरे साल कितना चढ़ावा आ जाता होगा, जिससे गुरु बाबा आगे दो साल तक रामलीला, प्रवचन, दुर्गापूजा और चालीस विद्यार्थियों वाले निःशुल्क संस्कृत पाठशाला का संचालन करते हैं? इस गुणा-भाग के बीच मुझे नहीं लग रहा था कि इसमें लूटने-खाने जैसी कोई बात है… तभी एक धक्के के साथ नाव घाट पर लग गई थी…।
मैं दीनू की साइकिल ठेलवाता हुआ कोठारी महाराज की चौकी के सामने आया। पीले से चेहरे वाला चन्दनधारी कोठार मोबाइल पर बड़े गम्भीर अन्दाज में किसी से काफी अदब के साथ वार्ता में मशगूल था। करीब पांच मिनट बाद बात समाप्त हुई तो उसने एक सरसरी निगाह साइकिल पर लदी बोरियों पर डाली, फिर एकदम शांत भाव से सामने से गुजरते स्वयंसेवक को आवाज दिया—‘ये सुनना जरा, यह चढ़ावा रखवा लो।’
दीनू गोदाम की तरफ चला गया। कोठारी ने यंत्रवत‍् मेरा नाम, पिता और बाबा का नाम, गांव, सामानों की मात्रा वगैरह लिखकर रुक्का बनाया और मुझे पकड़ा दिया। कोठारी के सपाट व्यवहार से मेरा हौसला कुछ बढ़ गया। मैंने रुक्के के साथ दक्षिणा के पैसे लपेट दिए, फिर पूछते हुए मन्दिर के बगल वाले हॉल में आया। यहीं गुरु बाबा का दरबार लगा था। हाल में दाएं-बाएं पच्चीस-तीस लोग बैठे थे। इनका लिबास, चेन, अंगूठियां, चेहरे का अभिजात्य भरा दर्प, सब कुछ इनके विशिष्ट होने की गवाही दे रहा था। हाल के बीच से बाबा जी की गद्दी तक एक हरी पट्टी बिछी थी। मैं कुछ हिचकता-सा बाबाजी के आसन के पास पहुंचा, प्रणाम की मुद्रा में हाथ उठाया और गुरु बाबा के पैरों के पास रुक्का रखकर तख्त के सामने मत्था टेक दिया… और जब उठा तो हाथ में रुक्का लिए गुरुजी को अपनी तरफ देखते पाया…। पहले जो सोचा था, उसके हिसाब से अब मुझे पुनः प्रणाम करके बाहर हो लेना था। किन्तु अप्रत्याशित रूप से उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर वहीं गद्दी के पास बैठा लिया और घर-परिवार की हाल-खबर लेने लगे…।
सम्भवतः इससे यहां बैठे यजमानों की आंखों में जिज्ञासा का भाव पैदा हुआ होगा, जिसे भांपकर बाबा जी ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए मेरा परिचय दिया। मेरे बाबा जी और गांव के विषय में बताते हुए कहा, ‘यह लड़का हमारे उस यजमान का नाती है, जहां मेरे पहुंचने पर आज भी घी के दीपक जलाये जाते हैं।’
…और इसके साथ ही जो एक झिझक और हीनताबोध का अंधेरा मेरे अन्दर समाया था, एकदम झकाझक उजाले में बदल गया।

The post मूल्यांकन appeared first on दैनिक ट्रिब्यून.



from दैनिक ट्रिब्यून https://ift.tt/2NeoZhY
via Latest News in Hindi

0 Comments