अभिषेक कुमार

इधर खास तौर से चीनी मोबाइल कंपनियों के हैंडसेट और एप्स को लेकर सोशल मीडिया पर बाकायदा एक अभियान चल रहा है। इसकी एक तात्कालिक वजह पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सेना में हुई झड़प है। इसके बाद से ही लोगों में चीन को लेकर काफी गुस्सा है और लोग चीनी उत्पादों के बॉयकॉट की अपील कर रहे हैं। चिंता की एक बड़ी वजह यह है कि कहीं ये स्मार्टफोन हमारे देश की जासूसी करने में मददगार तो साबित नहीं हो रहे हैं।
हाल ही में सुरक्षा एजेंसियों ने सरकार को एक लिस्ट भेजी थी, जिसमें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग एप जूम, टिकटॉक, यूसी ब्राउजर, एक्सएंडर, शेयरइट और क्लीन मास्टर आदि को देश की सूचनाओं और सुरक्षा के लिए खतरनाक बताया गया। इंटेलिजेंस ब्यूरो इससे पहले भी (2018 में) ऐसी आशंकाएं जता चुका है कि चीन के 40 से ज्यादा एप्लिकेशन हमारे स्मार्टफोनों को हैक कर सकते हैं। इस आशंका के मद्देनजर उस दौरान सुरक्षा बलों को सलाह दी गई थी कि वे वीचैट, यूसी ब्राउजर, यूसी न्यूज, ट्रूकॉलर और शेयरइट आदि एप्स को अपने स्मार्टफोनों से हटा दें। आईबी ने कहा था कि ये एप्लिकेशन असल में चीन की तरफ से विकसित किए गए जासूसी के एप हैं और इनकी मदद से जो भी सूचना, फोटो, फिल्म एक-दूसरे से साझा की जाती है, उसकी जानकारी चीन के सर्वरों तक पहुंच जाती है। इन आशंकाओं के बीच एप्लिकेशन शेयरइट ने जासूसी की बात से इनकार किया था और कहा था कि वे अपनी विश्वसनीयता को साबित करने के लिए सरकार व मीडिया के साथ बातचीत को तैयार है।
अगस्त, 2018 में केंद्र सरकार ने स्मार्टफोन बनाने वाली चीन समेत कई अन्य देशों की 21 कंपनियों को इस बारे में नोटिस जारी किया था। संदेह है कि ओपो, वीवो, शाओमी और जियोनी के अलावा एपल, सैमसंग और भारतीय कंपनी माइक्रोमैक्स के स्मार्टफोन्स के जरिए चीनी खुफिया एजेंसियां भारतीय ग्राहकों की पर्सनल जानकारियां चुराती रही हैं। सरकार ने ओपो, वीवो, शाओमी और जियोनी जैसी चाइनीज कंपनियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। यह नोटिस सरकार की तरफ से इलेक्ट्रॉनिक्स और इन्फर्मेशन टेक्नोलॉजी मंत्रालय ने इन सभी कंपनियों को भेजा था।
चीनी एप्लिकेशंस और स्मार्टफोनों को जासूसी के लिए संदेह के घेरे में लेने के पीछे बड़ा सवाल यह है कि सरकार ऐसे कदम क्या सिर्फ इसलिए उठाती है क्योंकि चीन से कभी डोकलाम, तो कभी गलवान घाटी में सीमा को लेकर विवाद उठते रहते हैं। वर्ष 2018 में संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने लोकसभा में बताया था कि देश की एक खुफिया एजेंसी की तरफ से सरकार को वीचैट (वीफोन एप) को प्रतिबंधित करने की अपील मिली थी। इस अपील का मुख्य कारण यह है कि यह ऐप अपने उपभोक्ताओं को वीओआईपी प्लेटफार्म के जरिए कॉलिंग लाइन आइडेंटिफिकेशन (सीएलआई) को चकमा देने की सुविधा प्रदान करता है। सीएलआई को छिपाने से कॉलर की पहचान उजागर नहीं हो पाती है। ऐसे में फर्जी कॉल्स करने में वीचैट का इस्तेमाल किया जा सकता है। खास बात यह है कि इस एप्लिकेशन के जरिए होने वाली कोई भी कॉल विदेश में स्थित सर्वर से होकर आती है, इसलिए कॉलिंग नंबर की पहचान या उसके स्थान का पता लगाना मुश्किल होता है।
सिर्फ चीनी स्मार्टफोन या एप्लिकेशंस से ही लोगों की जासूसी नहीं हो रही है। जानकारी चुराकर उसे बेचने के आरोप फेसबुक पर भी लग चुके हैं। असल में, फेसबुक या गूगल को यह पता रहता है कि कोई व्यक्ति किसी समय में ऑनलाइन क्या गतिविधियां करता रहा है। इसके आधार पर इन्हें व्यक्ति की ऑफलाइन गतिविधियों का भी पता चलता रहता है। इन गतिविधियों में एक व्यक्ति के एक स्थान तक आने-जाने, समय, खरीदारी आदि के ट्रेंड की जानकारियां होती हैं। फेसबुक तो यह कहता भी है कि वह अपने यूजर्स के बारे में विभिन्न स्रोतों से जानकारी जुटाता है, लेकिन वह यह नहीं बताता कि यूजर्स के बारे में किन स्रोतों से क्या जानकारियां ली गईं।
भारतीय टेलीग्राफ एक्ट 1885 के मुताबिक ऐसी जासूसी का कृत्य दंडनीय हो सकता है, पर समस्या यह है कि इसे साबित करना दिनोदिन कठिन होता जा रहा है। देश में करोड़ों मोबाइल फोनधारक हैं और ज्यादातर के पास अब स्मार्टफोन हैं। इन पर कौन-कौन से एप्लिकेशन डाउनलोड कर रहे हैं, इसकी जानकारी लेना भी आसान नहीं है क्योंकि कई तो सीधे विदेश स्थित सर्वरों से सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं। ऐसे दो ही रास्ते हैं—एक, या तो चीनी एप निर्माताओं और फेसबुक, गूगल से लेकर हर प्रमुख इंटरनेट कंपनी से कहा जाए कि वह भारत में ही अपना सर्वर स्थापित करे। चीन ने अपने देश में ऐसा ही किया है। दूसरा रास्ता है कि देश में टिकटॉक, शेयरइट आदि चीनी एप्स और फेसबुक-गूगल आदि उपयोगी चीजों के विकल्प पैदा किए जाएं। खुद चीन ने इन सभी के बेजोड़ विकल्प बनाकर विदेशी ऑनलाइन दासता व जासूसी की आशंकाओं को धता बताया है। सबक यही है कि हमारे देश में भी गूगल, व्हाट्सएप, वीचैट और फेसबुक-इंस्टाग्राम के देसी विकल्प पैदा किए जाएं। सरकार को चाहिए कि वह विदेशी मोबाइल कंपनियों और उनके एप्स पर पाबंदी के साथ देसी हैंडसेट उद्योग को बढ़ावा दे।

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