सहीराम

अमेरिका और यूरोप में इन दिनों मूर्तियां टूट रही हैं। हमारे यहां मूर्तियां टूटती हैं तो दंगे होते हैं। वहां दंगों के बाद मूर्तियां टूट रही हैं। जी नहीं, लेनिन और मार्क्स की मूर्तियां नहीं टूट रही हैं। यह बताना इसलिए जरूरी है कि इनके टूटने की खबर से कई लोगों का मन बल्लियों उछलने लगता है। खैर, उनके यहां इन दिनों मूर्तियां टूट रही हैं और हमारे पार्टियां टूट रही हैं। कोरोना काल की दुनिया की उपलब्धि यह है कि लोग नस्लवाद के खिलाफ सड़कों पर उतरे। अमेरिका में तो ऐसे उतरे कि ट्रंप साहब को व्हाइट हाउस के बंकर में जाकर छुपना पड़ा। कभी हिटलर भी जाकर बंकर में ही छुपा था, लेकिन वहां से निकल नहीं पाया। ट्रंप साहब को दुनिया एक कठवैद्य, नीम-हकीम और झोलाछाप डाॅक्टर के रूप में याद करेगी, जो कोरोना का इलाज कीटनाशकों से करना चाहते थे और अमेरिकी उन्हें इस रूप में याद रखेंगे कि कोरोना काल में वे जनता के पक्ष में नहीं, कोरोना के पक्ष में खड़े थे। खैर, बात ट्रंप की नहीं हो रही, मूर्तियों की हो रही है। अगर ट्रंप साहब हमारे यहां होते तो जरूर उनकी भी मूर्ति बन जाती। मंदिर बन जाते। उनकी जीत के लिए पिछली बार यज्ञ, हवन तो हुए ही थे, हो सकता है इस बार फिर हो जाएं।
अमेरिका और यूरोप में इन दिनों मूर्तियां टूट रही हैं—कोलंबस की मूर्तियां टूट रही हैं। कोलबंस के बारे में हम यह सोचकर चाहे कितने ही खुश हो लें कि वह भारत को खोजने निकला था। अच्छा हुआ नहीं खोज पाया, वरना हमारी हालत भी आज वही होती जो अमेरिका के मूल बाशिंदों की है। वहां उन गोरों की मूर्तियां टूट रही हैं, जो अश्वेतों को गुलाम बनाते थे, गुलामों की मंडियों में जाकर उन्हें बेचते थे। उनका व्यापार करते थे। वहां उन गोरे नेताओं की मूर्तियां भी टूट रही हैं, जिन्होंने मूल बाशिंदों को दबाकर, कुचल कर गोराशाही कामय की। अमेरिका में जार्ज फ्लाॅयड की हत्या के बाद उठे नस्लवाद विरोधी आंदोलन का शिकार अब यह मूर्तियां बन रही हैं। हमारे यहां जातिवाद, जो कि नस्लवाद का ही एक रूप है, के खिलाफ आंदोलन नहीं चलता, आरक्षण के खिलाफ चलता है, जिसमें ज्यादा से ज्यादा यह होता है कि या तो अंबेडकर की मूर्ति निशाने पर होती है। अंबेडकर के बाद अगर सबसे ज्यादा किसी की मूर्तियां क्षतिग्रस्त होती हैं तो गांधीजी की। हम उनका मूर्तिभंजन करते हैं जो जनता के पक्ष में खड़े थे। वहां उनका मूर्ति भंजन हो रहा है जो जनविरोधी थे। वैसे भी हमारे यहां मूर्तियां स्थापित की जाती हैं, तोड़ी नहीं जाती। मध्यकाल में कभी तोड़ी गयी होंगी तो उसके बदले अब भव्य मूर्तियों और मंदिरों का निर्माण तो हो ही रहा है। उन्हें मूर्तियां तोड़ने दो, हमें बनाने दो।

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