हरिन्दर सिंह गोगना
मुझे आज भी स्मरण है स्कूल में मेरा पहला दिन। मां रोजाना सिलाई सेंटर सिलाई सिखाने जाती थीं। उस दिन वह मुझे अपने साथ साइकिल के पीछे बिठाकर घर से निकलीं। मुझसे यह बात गोपनीय रखी कि आज वह मुझे स्कूल छोड़ने जा रही हैं। मुझे तो लगा मैं भी आज मां के साथ उनके काम पर जा रहा हूं। लेकिन यह क्या तब मेरे होश उड़ गये जब मां ने स्कूल के बाहर खड़ी एक महिला के हाथ में मेरा हाथ थमाया और यह कह कर वहां से चल पड़ी कि मैं अभी आई। मैं घबराया और महिला से अपना हाथ छुड़वा कर तेजी से मां के पीछे भागा। मां ने पलट कर देखा तो रुकने की बजाय साइकिल और तेज़ कर लिया। थोड़ा भागने पर मैं हांफते और रोते हुए सहमा-सा सड़क के किनारे खड़ा हो गया और अब तक ओझल हो चुकी मां की तरफ निहारता रहा, जो दूर से छुप कर मुझ पर नज़र गड़ाये थी। थोड़ा इंतजार करने के बाद मैंने पलट कर स्कूल की तरफ देखा तो मन और घबराया। फिर मां की राह ताकने लगा, मानो अभी आयेगी और मुझे साथ ले जायेगी। मगर नहीं मां तो नहीं आयी स्कूल वाली महिला मेरी तरफ ज़रूर आ रही थी। अब मैं जाऊं तो किधर जाऊं? उस महिला ने बड़े ही प्यार से मुझे बहलाते हुए दो टॉफियां दीं और गोद में उठाकर स्कूल ले गई। एक झूले में बिठाकर झूलाने लगी। लेकिन मुझे तो मां की कमी खल रही थी। मैं अब भी सुबक रहा था। कुछ समय बीता तो खेलते हुए नन्हे-मुन्ने सहपाठियों से मैं भी हिल-मिल गया और कुछ देर के लिए मां का ख्याल मन से जाता रहा। स्कूल की महिला कर्मचारी बार-बार मेरे पास आकर अपनत्व का अहसास करवाती और मां के शीघ्र आने का आश्वासन देकर चली जाती, जिससे मैं सामान्य होने लगा। कब दिन बीता पता ही न चला। मां आई और मुझे प्यार, शाबाशी देते हुए मेरा धैर्य बढ़ाया और नई कॉपियां, पेंसिल और बस्ता भी दिया, जिसे पाकर मैं थोड़ा खुश हुआ और मैंने धीरे से मां के कान में कहा, ‘मां, मैं अब स्कूल आऊंगा…।’

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