कहां है ब्लैक होल
मुकुल व्यास
खगोल वैज्ञानिकों की अंतरराष्ट्रीय टीम ने ब्लैक होल की मौजूदगी का पहला प्रत्यक्ष दृश्य प्रमाण प्रस्तुत किया किया है। यह ब्लैक होल पृथ्वी से करीब 5.5 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर मेसियर 87 नामक आकाशगंगा के मध्य में स्थित है।अभी तक हम ब्लैक होल की जो तस्वीरें देख रहे थे वे सिर्फ काल्पनिक थीं। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि वैज्ञानिकों की इस महत्वपूर्ण सफलता में प्रख्यात भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस का भी योगदान है। खगोल वैज्ञानिकों ने ब्लैक होल का प्रमाण जुटाने के लिए आठ रेडियो टेलीस्कोपों के विश्वव्यापी नेटवर्क का सहारा लिया। यह नेटवर्क एंटार्कटिका से लेकर स्पेन और चिली तक विभिन्न स्थानों तक फैला हुआ है। ये टेलीस्कोप एक दूसरे के साथ लयबद्ध हो कर इवेंट होराइजन टेलीस्कोप (इएचटी) के रूप में काम करते हैं। ये टेलीस्कोप जिन फ्रीक्वेंसीज पर काम करते हैं उन्हें सर्वप्रथम जगदीश चंद्र बोस ने कलकत्ता में करीब 120 वर्ष पहले उत्पन्न किया था। भारत इएचटी नेटवर्क का हिस्सा नहीं है लेकिन रेडियो टेलीस्कोपों ने जिन सैकड़ों गीगाहर्ट्ज की फ्रीक्वेंसीज पर काम किया उन्हें सबसे पहले बोस ने कलकत्ता में 1985 में किए गए प्रयोगों के दौरान जेनरेट किया था। पुणे स्थित इंटर-यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स के निदेशक सोमक रायचौधरी ने कहा कि इएचटी नेटवर्क के टेलीस्कोप तकनीकी दृष्टि से बहुत उन्नत अवश्य हैं लेकिन वे उसी मूल टेक्नोलॉजी का प्रयोग कर रहे हैं जिन्हें जगदीश चंद्र बोस ने प्रदर्शित किया था। अमेरिका स्थित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में इएचटी प्रोजेक्ट के निदशक शेफर्ड डेल्मान ने कहा कि हम मानवता के सम्मुख पहली बार किसी ब्लैक होल की तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हैं। यह खगोल विज्ञान में महत्वपूर्ण मील का पत्थर है तथा 200 से अधिक खगोल वैज्ञानिकों की टीम के लिए बहुत बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि ब्लैक होल ब्रह्मांड के सबसे रहस्यपूर्ण ऑब्जेक्ट्स हैं। हमने वह चीज देख ली है जो हम सोचते थे कि देखी नहीं जा सकती।
पोवेही है ब्लैकहोल का नाम
ब्लैक होल की वास्तविक छवि उसका फोटो नहीं है बल्कि एक ऐसी छवि है जिसे इएचटी ने टेलीस्कोपों से प्राप्त डेटा से उत्पन्न किया है। इस ब्लैक होल का नाम ‘पोवेही’ रखा गया है। यह हवाई भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है “अनंत सृजन का सुशोभित श्याम स्रोत”। ब्लैक होल के लिए हवाई नाम चुना जाना उचित ही है क्योंकि इस प्रोजेक्ट में हवाई स्थित दो टेलीस्कोप भी शामिल थे। वैज्ञानिकों के पर्यवेक्षणों में एक छल्ले जैसा आकार नजर आया जिसके मध्य में काला हिस्सा था जो कि मेसियर 87 ब्लैक होल की छाया थी। इसे ‘सुपरमैसिव ‘ ब्लैक होल कहा जाता है क्योंकि इसका द्रव्यमान सूरज के द्रव्यमान से 6.5 अरब गुणा अधिक है।
सब कुछ हजम
ध्यान रहे कि ब्लैकहोल ब्रह्मांड के विशाल द्रव्यमान वाले रहस्यपूर्ण ऑब्जेक्ट हैं जहां गुरुत्वाकर्षण इतना प्रबल होता है कि वहां से कुछ भी बाहर नहीं जा सकता। वहां से न तो चट्टानें और न ही गैसें बाहर निकल सकती हैं। और प्रकाश भी बाहर नहीं आ सकता। इसी वजह से ये अदृश्य होते हैं। ये ब्लैक होल जब अपने आसपास के पदार्थ को निगलते हैं तो उनका आकार बढ़ जाता है।
वैज्ञानिकों का मत
आइंस्टीन सापेक्षता के सिद्धांत ने सबसे पहले अनुमान लगाया था कि जब एक एक विशाल तारा मरता है तो वह अपने पीछे एक घना मध्य भाग छोड़ देता है। यदि यह मध्य भाग सूरज से तीन गुणा अधिक बड़ा है तो आइंस्टीन की इक्वेशन के मुताबिक गुरुत्वाकर्षण का बल ब्लैक होल उत्पन्न करेगा। लेकिन वैज्ञानिक अभी तक ब्लैक होल का फोटो खीँचने या उसका प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण करने में नाकाम रहे थे। वे अभी तक परोक्ष प्रमाणों पर निर्भर थे जो आसपास के ऑब्जेक्ट्स से मिल रहे संकेतों या उनके आचरण के रूप में मिल रहे थे। उदाहरण के तौर पर एक ब्लैक होल अपने पास फटकने वाले तारे को हजम कर जाता है। इस प्रक्रिया में तारा गर्म हो कर एक्स-रे संकेत उत्पन्न करते हैं। ये संकेत टेलीस्कोप द्वारा ग्रहण कर लिए जाते हैं। कभी-कभी ब्लैक होल चार्ज्ड कणों की बौछारें छोड़ते हैं जिन्हें हमारे उपकरण डिटेक्ट कर सकते हैं। वैज्ञानिक कभी-कभी ऑब्जेक्ट्स की हलचल का अध्ययन करते हैं। यदि ये ऑब्जेक्ट्स अजीब ढंग से खिंचते हुए दिखते हैं तो इसका कारण कोई ब्लैक होल भी हो सकता है।
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