अभिषेक कुमार
माना जाता है कि इस ब्रह्मांड की सभी मंदाकिनियों (गैलेक्सी) के केंद्र में ब्लैक होल हैं। ये असल में वे तारे हैं जो मरने यानी खत्म होने की प्रक्रिया में है। अरबों साल बाद हमारा अपना सूर्य भी अपनी सारी ऊर्जा झोंककर पहले तो श्वेत वामन (व्हाइट ड्वार्फ) तारे में तब्दील होगा और उसके बाद ब्लैक होल में बदल जाएगा। तब यह सौरमंडल के सारे ग्रहों को अपनी ओर खींचेगा और उन्हें हड़प कर लेगा। खगोलीय सिद्धांतों के मुताबिक ब्लैक होल अंतरिक्ष की वे जगहें हैं जहां भौतिकी के नियम काम नहीं करते। इनका गुरुत्वाकर्षण बहुत ज्यादा और ताकतवर होता है। इस खिंचाव आसपास की कोई चीज बच नहीं सकती। महान साइंटिस्ट आइंस्टाइन के शब्दों में ब्लैक होल का शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण उसके आसपास के स्पेस को उसमें लपेट देता है और उसे कर्व जैसा आकार दे देता है। असल में जब कोई विशाल तारा अपने अंत की ओर पहुंचता है तो वह अपने ही भीतर सिमटने लगता है। धीरे-धीरे वह ब्लैक होल में तब्दील होकर सब कुछ अपने में समेटने लगता है। ब्लैक होल पर अपनी खोज में स्टीफन हॉकिंग ने कहा था कि हॉकिंग रेडिएशन के कारण एक स्थिति ऐसी भी आती है, जब ब्लैक होल पूरी तरह द्रव्यमान से मुक्त होकर ब्रह्मांड से गायब हो जाता है। इस मोड़ पर क्या होता है, हमारा विज्ञान अभी इस रहस्य को बूझ नहीं पाया है। कोई नहीं जानता कि ब्लैक होल जब गायब होते हैं तो क्या वे किसी दूसरे ब्रह्मांड में पहुंच जाते हैं या बिल्कुल नई दुनिया हमारे सामने होती है। सोचने वाली बात है कि हमारे सूरज से 650 करोड़ ज्यादा द्रव्यमान वाले और पृथ्वी से साढ़े पांच करोड़ प्रकाश वर्ष दूर स्थित जिस ब्लैक होल की तस्वीर वैज्ञानिकों ने इधर साझा की है, आखिर इतना बड़ा पिंड अचानक गायब होकर कहां जा सकता है। हो सकता है कि मरने के बाद ये विशालकाय बुझे हुए तारे यानी ब्लैक होल कहीं जाते न हो, बल्कि कथित तौर पर दृश्य अंतरिक्ष में सिर्फ दिखना बंद हो जाते हों। हालांकि ब्लैक होल तो अभी ही दिखाई नहीं देते पर उनका अंदाजा लग सकता है, जैसा कि हाल में एम-87 मंदाकिनी के ब्लैक होल की तस्वीर के संबंध में हुआ है।
इवेंट होराइजन क्या है
खगोल विज्ञानी बताते हैं कि सूर्य से कई गुना द्रव्यमान वाले बड़े तारों का अंत उनमें हुए प्रचंड विस्फोट यानी सुपरनोवा से शुरू होता है। इस विस्फोट से तारों का ढेर सारा पदार्थ ब्रह्मांड में चारों ओर फैल जाता है। इसके बाद तारे के केंद्र में एक अति-सघन छोटा सा पिंड बचता है। तारा यदि हमारे सूरज के आकार जितना हुआ, तो विस्फोट के बाद वह श्वेत वामन तारा बन जाता है, जबकि हमारे सूर्य के कई गुना ज्यादा बड़े तारे नष्ट होने की इस प्रक्रिया में न्यूट्रॉन तारे में बदल जाते हैं। ऐसे तारों के पदार्थ की अति सघनता का इंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि इनके एक चम्मच पदार्थ का वजन कई टन हो सकता है। कुछ तारे जो इनसे भी बड़े होते हैं, उनमें सुपरनोवा विस्फोट के बाद भी बचे सघन पिंड का गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़ना जारी रहता है। बहरहाल, अपनी मृत्यु की ओर बढ़ते इन सभी तारों में सुपरनोवा विस्फोट के बाद इतनी अधिक गुरुत्वाकर्षण शक्ति आ जाती है कि वे बह्मांड में अपने निकट मौजूद सभी चीजों को अपनी ओर खींचते हैं, यहां तक कि वे प्रकाश भी सोखने लगते हैं। तारों की यही अवस्था ब्लैक होल कहलाती है। ब्लैक होल बन रहे तारों में एक अवस्था ऐसी आती है जब उनसे प्रकाश के कणों का बाहर निकलना बंद हो जाता है। ऐसा उनके प्रचंड गुरुत्वाकर्षण की वजह से होता है। लेकिन इससे ठीक पहले की अवस्था में उन तारों को महसूस किया जा सकता है। तारों की यह अवस्था इवेंट होराइजन कहलाती है। कह सकते हैं कि इवेंट होराइजन लगातार संकुचित होते और मरते तारे के अंतिम दर्शन की एक अवस्था है। जब कोई ब्लैक होकर भीतर की ओर सिकुड़ते हुए सब कुछ अपने में समेटने लगता है तो उसके बाहरी किनारे पर क्वांटम प्रभाव के कारण गर्म कण टूट-टूटकर ब्रह्मांड में फैलने लगते हैं। उस दौर में बाहरी हिस्सा इवेंट होराइजन कहलाता है, जहां से भीतर जाने पर टाइम (समय) और स्पेस (काल) अपना अर्थ खो देते हैं और तब भौतिक विज्ञान का कोई नियम वहां काम नहीं करता है। एक तरह से किसी तारे का ब्लैक होल में बदलना एक प्रकार से जीवन को लेकर उसके वैराग्य यानी मोह-बंधन छूटने का पल कहला सकता है। ऐसे में न सिर्फ उस तारे के मोह-बंध टूट जाते हैं, बल्कि वह अपने इर्दगिर्द के ग्रह-नक्षत्रों और प्रकाश की किरणों तक को विलुप्त करते हुए अंतरिक्ष की उन गहराइयों में खो जाता है जहां से हो सकता है कि उसके किसी नए सफर की शुरुआत होती हो।

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