जन्म संबंधी रोगों की जड़ें तलाशने की कोशिश
मनुष्य को होने वाली बीमारियों के कारणों को गहराई से समझने और उनका उपचार खोजने के लिए वैज्ञानिक मानव भ्रूण के तरह-तरह के मॉडल विकसित कर रहे हैं। उन्होंने मानव विकास के प्रारंभिक चरण के अध्ययन के लिए मानव भ्रूण की स्टेम कोशिकाओं से एक गैस्ट्रुलॉएड मॉडल तैयार किया है। यह मॉडल 18-21 दिन के भ्रूण के महत्वपूर्ण तत्वों का प्रतिनिधित्व करता है। इस मॉडल को ‘गैस्ट्रुलॉएड’ भी कहा जाता है। ब्रिटेन की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और हॉलैंड के ह्यूब्रेख्त इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित इस मॉडल से मानव विकास के नक्शे या ब्लूप्रिंट से जुड़ी प्रक्रियाओं को आसानी के साथ देखा जा सकता है, जिनका सीधा पर्यवेक्षण अभी तक संभव नहीं था। इन प्रक्रियाओं को समझ कर मनुष्य में जन्म संबंधी गड़बड़ियों और बीमारियों के मूल कारणों का पता लगाया जा सकता है। इनके आधार पर गर्भवती महिलाओं के लिए टेस्ट विकसित किए जा सकते हैं।
किसी जीव के विकास का ब्लूप्रिंट एक खास प्रक्रिया से उभरता है। इस प्रक्रिया को ‘गैस्ट्रुलेशन’ कहा जाता है। गैस्ट्रुलेशन के दौरान भ्रूण में कोशिकाओं की तीन विशिष्ट परतें बनती हैं जो आगे चलकर शरीर की मुख्य प्रणालियों को जन्म देती हैं। इनमें से एक परत, एक्टोडर्म कहलाती है, जिससे स्नायु तंत्र बनता है। दूसरी परत को मिसोडर्म कहते हैं, जिससे मसल बनते हैं। एंडोडर्म तीसरी परत होती है, जिससे आंतें बनती हैं। गैस्ट्रुलेशन को अक्सर मानव विकास की ‘ब्लैक बॉक्स’ अवधि भी कहा जाता है। कानूनी बंदिशों के कारण प्रयोगशाला में मानव भ्रूण को 14 दिन से अधिक अवधि तक विकसित करने की अनुमति नहीं है।
गैस्ट्रुलेशन 14 दिन बाद शुरू होता है। जन्म संबंधी कई विकार इस अवधि में उत्पन्न होते हैं। ये विकार एल्कोहल, दवाओं, रसायनों और इंफेक्शनों से संबंधित हैं। गैस्ट्रुलेशन की अवधि को बेहतर ढंग से समझ कर बांझपन और मिसकैरिज जैसी समस्याओं तथा आनुवंशिक गड़बड़ियों पर नई रोशनी डाली जा सकती है। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के आनुवंशिक विभाग के प्रोफेसर एलफांसो मार्टिनेज एरियास ने इस अध्ययन का नेतृत्व किया है। उनका कहना है कि हमारा मॉडल मानव ब्लूप्रिंट के एक हिस्से को दर्शाता है। नेचर पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में रिसर्चरों ने मानव भ्रूण की स्टेम कोशिकाओं से कोशिकाओं की त्रिआयामी संरचना तैयार करने की विधि बताई है। रिसर्चरों ने इन भ्रूण मॉडलों में 72 घंटे बाद अभिव्यक्त हुए जीनों को देखा। इससे उन्हें उस घटना के स्पष्ट संकेत मिले, जहां से मसल, हड्डियों और कार्टिलेज की कोशिकाओं के निर्माण का सिलसिला आरंभ होता है।
अभी तक वैज्ञानिक गैस्ट्रुलेशन की प्रक्रिया के अध्ययन के लिए चूहों और जेब्राफिश के मॉडल पर निर्भर थे लेकिन इन मॉडलों के आधार पर यह तय करना मुश्किल था कि मानव भ्रूण में कोशिकाएं कब विशिष्ट रूपों में विकसित होती हैं। दूसरी बात यह है कि जानवरों के मॉडल कुछ दवाओं पर अलग-अलग ढंग से रेस्पांस देते हैं। मसलन, मॉर्निंग सिकनेस के लिए एक दवा चूहों पर परीक्षण के बाद क्लिनिकल ट्रायल में पास हो गई थी लेकिन मनुष्यों पर इसके प्रयोग के बाद जन्म संबंधी गड़बड़ियां देखी गईं। रिसर्चरों ने कहा कि इन्हीं कारणों की वजह से मानव विकास के बेहतर मॉडल विकसित करना आवश्यक है।
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की प्रोफेसर जॉयस हार्पर ने कहा कि गैस्ट्रुलेशन हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण चरण है। लेकिन अभी तक हम मनुष्यों में इसका अध्ययन नहीं कर पाए हैं। इस नए मॉडल से हम मानव के विकास के प्रारंभिक चरण को ज्यादा बेहतर ढंग से समझ पाएंगे और यह भी जान पाएंगे कि गड़बड़ी कहां हो रही है। मानव भ्रूण के मॉडल को लेकर सभी देशों में रिसर्च नहीं हो पाएगी। इस क्षेत्र में कार्य करने वाले रिसर्चर 14 दिन के नियम का पालन करते हैं। 14 दिन से ऊपर मानव भ्रूण पर रिसर्च करना नैतिक दृष्टि से वर्जित है। लेकिन ब्रिटेन और जापान में इस तरह के मॉडलों पर रिसर्च करने की अनुमति है क्योंकि ये भ्रूण मॉडल आगे विकसित नहीं हो सकते। इसकी वजह यह है कि इन मॉडलों में मस्तिष्क कोशिकाएं नहीं होतीं। आवश्यक टिशुओं के अभाव में इनको गर्भाशय में प्रत्यारोपित नहीं किया जा सकता। अमेरिका में इस तरह के मॉडल तैयार करने या उन्हें नष्ट करने पर रोक है।
इस बीच, अमेरिकी रिसर्चरों ने एक ऐसा भ्रूण बनाया है, जिसमें चूहे की कोशिकाओं के साथ मानव कोशिकाएं भी हैं। इस संकर भ्रूण में चार प्रतिशत मानव कोशिकाएं हैं। इससे पहले विकसित किए गए संकर भ्रूणों में मानव कोशिकाओं का अंश इस अनुपात में नहीं था। इस मिश्रित भ्रूण का विकास अमेरिका में बफैलो स्थित स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क और रोसवेल पार्क कैंसर सेंटर ने किया है। इस प्रयोग में मानव रक्त कोशिकाओं और नेत्र कोशिकाओं को सम्मिलित किया गया। रिसर्चरों ने यह साबित किया कि चूहे के भ्रूण में मानव कोशिकाओं को सामान्य मानव भ्रूण की तुलना में ज्यादा तेज गति से विकसित किया जा सकता है। कोविड-19 सहित विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है क्योंकि इससे रिसर्च कार्यों के लिए कोशिकाओं, टिशुओं और अंगों को तेजी से उगाया जा सकता है। रिसर्चरों ने चूहे के भ्रूण में मानव कोशिकाएं इंजेक्ट कीं और उसे दो हफ्ते तक विकसित होने के लिए छोड़ दिया। दो हफ्ते बाद भ्रूण का विश्लेषण करने पर उन्हें चूहे के मस्तिष्क, लीवर, हृदय, आंखों, रक्त और बोन मैरो में मानव कोशिकाएं दिखीं। रिसर्चरों ने मिश्रित भ्रूण को और आगे विकसित नहीं होने दिया। हालांकि, पिछले मामलों में कुछ वैज्ञानिकों ने जीवों को भ्रूणावस्था से भी आगे विकसित होने दिया था। वर्ष 1984 में वैज्ञानिकों ने संकर भेड़-बकरी का विकास किया था। यह जीव वयस्क अवधि तक ही जीवित रह पाया। अभी हाल में चीन में बंदर और सूअर के दो संकर जीव विकसित किए गए थे जो जन्म लेने के बाद कुछ ही हफ्ते जीवित रह पाए थे।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
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