तेल के खेल में हलकान लोग
रविवार को लगातार सोलहवें दिन तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़ाए। कीमत निर्धारण का यह तेल का खेल आम भारतीय की समझ से परे है। अजीब स्थिति है जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ें तो भी ठीकरा लोगों के सिर पर फोड़ा जाता है। जब कच्चे तेल की कीमतें बिल्कुल तल से लगी हों तो भी तेल के दामों में निरंतर बढ़ोतरी जारी है। सरकारों का यह फैसला न तार्किक है और न हीं संवेदनशील। कोरोना संकट के चलते आर्थिक मार झेल रही बड़ी आबादी की आय में गिरावट हुई है। बाजार की व्यवस्थाएं सामान्य नहीं हो पायी हैं। कोरोना काल में यह वृद्धि कोढ़ में खाज जैसी ही है। किसी भी तरह से यह सरकारों का संवेदनशील व्यवहार नहीं कहा जा सकता। यह ठीक है कि कच्चे तेल के शोधन, डीलरों के कमीशन आदि खर्च भी तेल के दाम में जुड़ते हैं, मगर दक्षिण एशिया के किसी भी देश में तेल का बोझ यूं जनता के सिर पर नहीं डाला जाता। जनता उम्मीद लगाये बैठी है कि दुनिया में कच्चे तेल के दामों में आई अप्रत्याशित कमी का लाभ उन्हें मिलेगा, जबकि उलटे तेल के दाम बढ़ते ही जा रहे हैं। नि:संदेह केंद्र और राज्य सरकारें किसी हद तक रेवेन्यू के लिए पेट्रोलियम पदार्थों के टैक्सों पर निर्भर हैं, मगर जरूरी है कि तेल के दाम को न्यायसंगत बनाया जाये, जिसके खिलाफ विपक्ष ने भी सरकार से विरोध जताया था।
फिलहाल, सरकारों के हालात भी खस्ता हैं लॉकडाउन की वजह से पेट्रोल-डीजल की खपत में भारी कमी आई, जिससे रेवेन्यू भी तेजी से घटा है। आर्थिक गतिविधियां ठप पड़ने से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कर न आने से सरकारों के खजाने खाली हो गये। सरकारें पेट्रोल-डीजल पर टैक्स बढ़ाकर घाटा पूरा करने की जुगत में हैं। वहीं सरकार भी नहीं चाहती कि दुर्लभ विदेशी मुद्रा से आयातित तेल के अधिक उपयोग को बढ़ावा मिले। मान्यता है कि ज्यादा खपत देश-पर्यावरण के हित में नहीं है। लेकिन तेल के दामों में वृद्धि से फिलहाल महंगाई का भी खतरा है। सरकार की दुविधा है कि आर्थिक संसाधन जुटाये या महंगाई को देखे। कुल मिलाकर दोधारी तलवार पर चलने जैसा है। अजीब बात है कि एक ओर सरकार जनता के हाथ में पैसे देकर अर्थव्यवस्था में तरलता बढ़ाना चाहती है, वहीं दूसरी ओर तेल के दाम भी बढ़ा रही है। मगर क्या केंद्र की एक्साइज ड्यूटी व राज्यों की ओर से लगने वाले वैट को तर्कसंगत नहीं बनाया जा सकता? सवाल यह भी कि पेट्रोलियम पदार्थों पर पचास फीसदी से ज्यादा टैक्स क्यों लगाया जा रहा है? नि:संदेह जब तेल पर बेहिसाब टैक्स लगेगा तो कीमतें तो आसमान की ओर चढ़ेंगी। तेल पर सत्तर फीसदी टैक्स लगना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। वहीं डीजल के दामों में वृद्धि से महंगाई बढ़ने का खतरा लगातार बढ़ जाता है, जिससे उपभोक्ताओं की जेब पर मार दोहरी पड़ेगी।

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