कृष्णलता यादव
कहा जाता है, बचपन वह जो खुलकर खेले। इसी कड़ी में जोड़ा जा सकता है – बच्चा वह जो खुलकर बोले। यह तभी संभव है जब उसे बोलने के भरपूर अवसर दिए जाएँ। उसकी कही हुई बात को सुना जाए, समझा जाए। उसे बार-बार यह न सुनना पड़े – ‘तुम चुप रहो, अभी बच्चे हो।’ इस प्रकार की नकारात्मक टिप्पणियाँ उसे या तो विद्रोही बना देंगी या दब्बू।
प्रायः देखने में आता है कि जिस बच्चे को अपनी बात कहने का मौका नहीं मिलता वह दूसरों की बात नहीं सुनता। धीरे-धीरे वह एकांतप्रिय हो जाता है। चुप्पी से दोस्ती कर हर घटना को मूकदर्शक बनकर देखता रहता है। स्थिति यह आ जाती है कि अपनी बात मनवाने के लिए वह सिफारिशों का सहारा लेता है और व्यवहारकुशलता से वंचित रह जाता है। दूसरों से तालमेल बैठाने में कठिनाई महसूस करता है। ऐसा बच्चा अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए चीजों की उठापटक करता है, चिल्लाता है ताकि औरों की बात भी न सुनी जा सके। कभी-कभी अपशब्दों का भी प्रयोग करता है। यह स्थिति चिंताजनक है।
तस्वीर का दूसरा पहलू है उस बालक का जिसको अपनी बात कहने की पूरी छूट है। ऐसा बालक औरों की सुनता है, अपनी सुनाता है। राय लेता है, देता है। बात मानता है, मनवाता है और व्यवहारकुशल बन जाता है। गम्भीर से गम्भीर बात को भी ठीक ढ़ंग से पेश करना सीख लेता है। धीरे-धीरे वह महफिल का ‘नायक’ बन जाता है। बड़ी आसानी से समूह का नेतृत्व कर लेता है क्योंकि अपनी बात करने की कला से वह समय और स्थिति से तालमेल बिठा सकता है। तालमेल बिठाना ही उसके व्यक्तित्व का अंग बन जाता है। चूंकि वह हिचकिचाहट से दूर होता है इसलिए आत्मविश्वास से भरपूर होता है। औरों का चहेता बनने में उसे देर नहीं लगती। शिक्षा संस्था छोड़ने के बाद भी बहुत समय तक उसका नाम शिक्षकों की ज़ुबान पर रहता है।
एक बात ध्यान देने योग्य है कि बच्चे पर इतना अंकुश ज़रूर हो कि वह ज़रूरत से ज्यादा न बोले। केवल विरोध के लिए दूसरों की बात न काटे। उन्हीं बातों तक सीमित रहे जो उसके आयु-वर्ग से मेल खाती हों। हर बात में दखल देने वाले बच्चे, सिरदर्द बन जाते हैं। यह भी ध्यान रखा जाए कि उसके शब्द सभ्यता की सीमा को न लांघें। ‘मन आया’ कहते जाना बोलना नहीं होता। बड़बोले की बातों को लोग ज्यादा देर तक नहीं सुनते। अतः यदि आप चाहते हैं कि आपका बच्चा व्यवहारकुशल बने तो उसे बोलने का अवसर दीजिए मगर जहाँ कहीं सीमा के अतिक्रमण की आशंका हो वहाँ लगाम लगाना आपका नैतिक दायित्व है। अभिभावक के नाते यह बताना भी आपका कर्तव्य है कि बोलने से पहले तोलना नैतिकता की माँग है। इस माँग की हर समय , हर स्थान पर कद्र होनी चाहिए।

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