लक्ष्मीकांता चावला

उत्तर प्रदेश का चित्रकूट वह क्षेत्र, जहां भगवान श्रीराम सीता जी एवं लक्ष्मण सहित चौदह वर्ष के वनवास काल में लंबे समय तक रहे। उसी चित्रकूट के कर्वी क्षेत्र से हिंदुस्तान की बेटियों की करुण कहानी के समाचार मिले हैं। कर्वी में रोटी के बदले नाबालिग बेटियों के शारीरिक शोषण का जो दृश्य टीवी चैनल ने दिखाया, वह रौंगटे खड़े कर देने वाला है। इसके बाद भी अगर जिले का प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी यह कहे कि जांच करवाई जाएगी, इसका सीधा अर्थ है कि पहले उन्हें कुछ पता नहीं था।
सवाल यह पैदा होता है कि प्रशासन-शासन को ऐसी अमानवीय घटनाओं की जानकारी पहले क्यों नहीं। भारत देश के लिए इस तरह की महिलाओं की शोषण की घटनाएं शोभा नहीं देतीं। अपने देश की स्थिति बड़ी अजब-गजब है। जब तक विकास यादव ने पुलिस पर हमला करके आठ पुलिस कर्मियों को शहीद और कुछ को घायल नहीं कर दिया तब तक उत्तर प्रदेश सरकार भी शायद विकास यादव को नहीं जानती थी। अब तो देश की जनता को अलग से विकास यादव का परिचय देने की कोई आवश्यकता नहीं।
2001 में पुलिस स्टेशन के अंदर एक राजनीतिक कार्यकर्ता ही नहीं, मंत्री का कत्ल करने वाला और उसके बाद एक नहीं, अनेक हत्याएं, हत्या का प्रयास तथा अन्य घृणित अपराध करने वाला व्यक्ति नेता बना रहा, करोड़ों की संपत्ति का स्वामी भी बन गया। उसके एक संकेत पर हथियारों सहित गुंडे पहुंचें, गोलियां बरसाएं और विकास यादव वहां से बचकर निकल जाए, यह इस देश की कहानी है। एक दल नहीं, दलों की दलदल में ये अपराधी फंसा रहा और नेता उस पर मेहरबान रहे, क्योंकि यह चुनावों में निश्चित ही उनकी मदद करता रहा होगा।
केवल उत्तर प्रदेश की बात नहीं, पूरे देश में ही धनबल और बाहुबल से आज चुनाव जीते हैं। इसी का परिणाम है कि आज पंचायतों से लेकर संसद तक बहुत बड़ी संख्या में वे लोग पहुंच गए, जिनके डर से लोग मुंह नहीं खोलते और तंत्र उन्हीं के हवाले हो गया। फिर सत्ता के शिखरों पर पहुंच गए। इसी का परिणाम यह है कि धनपति अपराधी चुनावी रण में उतरे और उनमें से बहुत से माननीय बन गए। उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी सरकारी जानकारी के अनुसार 143 विधायक दागी हैं और देश की संसद में 159 हैं। कोई पार्टी ऐसी नहीं, जिसने दागियों को चुनावी रण में नहीं उतारा और संसद या विधानसभा में नहीं भेजा।
आखिर क्या कारण था कि जब विकास पर घेरा डालने के लिए पुलिस जाती है तो उसके पास दर्जनों सशस्त्र बाहुबली पहुंच जाते हैं। अब तो यह सिद्ध हो गया कि पुलिस में ही उसके इतने शुभचिंतक थे, जो अपनी यूनिफॉर्म से ज्यादा दुबे के प्रति वफादार थे। क्यों चौबेपुर थाने के दो पुलिस अधिकारियों को जेल में भेजना पड़ा। दाे सौ से ज्यादा पुलिस कर्मी संदेह के घेरे में आ गए और आईपीएस अफसरों पर भी संदेह की सूई घूमी।
दुबे तो एनकाउंटर का शिकार हो गया। दुबे के पेट में बहुत से रहस्य थे जो कभी बाहर नहीं आ सकेंगे। इसलिए इस एनकाउंटर पर भी प्रश्न उठ रहे हैं। वर्ष 2001 से हत्याएं करने वाला, अवैध निर्माण करने करवाने वाला, बाहुबल से लोगों को दबाकर रखने वाला, चुनावी वैतरणी पार करवाने वाला कोई साधारण व्यक्ति नहीं हो सकता। आज विरोधी पार्टियां कुछ भी बोलें, लेकिन पिछले तीस वर्षों में हर पार्टी की सरकार आई।
केवल उत्तर प्रदेश में नहीं, देश के दूसरे प्रांतों में भी ऐसा ही हो रहा है। अभी भी समय है देश के प्रधानमंत्री जैसे भी संभव हो, लोकतंत्र को लोकतंत्र बनाए रखने के लिए उन बाहुबलियों और धनपतियों को उजागर कर दें जो जनता का खून निचोड़कर, लोगों पर झूठे मुकदमे बनवाकर स्वयं नेता भी बने रहे हैं और अपराधी भी। नेतागिरी के मुखौटे में अपराध करने वाले लोग असल में लोकतंत्र के दुश्मन हैं।
दरअसल, हर राजनीतिक दल के नेताओं से इनका संबंध भी रहता है और ये अपना फर्ज निभाते हैं और नेता इन पर कृपा बनाए रखकर बदले में इन्हें सुरक्षा देते हैं। अगर यही हालत रही तो कर्वी जैसे अन्य स्थानों पर शोषित होने वाली बेटियां न सुरक्षित होंगी और न ही बड़े-बड़े अपराध करके पूरे ठाठ के साथ रहने वाले इन अपराधियों पर नियंत्रण होगा। पिसेगी तो जनता ही। देखना है कि अब जनता को कोई बचाएगा या एक दिन जनता ही एक होकर इनके विरुद्ध खड़ी हो जाएगी। गरीब, अति गरीब तो डरता है। मध्य वर्ग रोटी की लड़ाई लड़ने में ही टूटता जा रहा है और उच्च वर्ग को कोई बदलाव लाने की आवश्यकता ही नहीं लगती क्योंकि उनका धनबल ही उनकी शक्ति है। देश की सरकार समय रहते यह देखे कि राजनीति के लबादे में छिपे ऐसे अन्य कितने विकास दुबे हैं, जो जनता के लिए डरावने और राजनेताओं के लिए सुहावने बने हैं।

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