कमजोर विपक्ष से सबल न होगा जनतंत्र
राजस्थान में गहलोत सरकार अथवा कांग्रेस पार्टी का भविष्य क्या होगा, इसकी चिंता तो कांग्रेस कर लेगी, पर एक चिंता जो देश के नागरिक को करनी है, उसका रिश्ता उस जनतंत्र से है, जिस पर हम भारतवासी गर्व कर सकते हैं, गर्व करते हैं। हमारा जनतांत्रिक-व्यवस्था का 73 साल का अनुभव यह तो बताता है कि इस दौरान भारत विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र बना रहा है, पर सबसे बड़े और सबसे महान में अंतर होता है। महानता अर्जित करनी पड़ती है, और दुर्भाग्य से, इस दिशा में हम अभी वहां नहीं पहुंचे हैं, जहां हमें होना चाहिए था।
किसी भी जनतंत्र की सफलता और महानता की सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि वहां विपक्ष कितना मज़बूत है। सरकार का मज़बूत होना, निस्संदेह, एक अच्छी स्थिति होती है, पर विपक्ष का कमजोर होना भी जनतंत्र की दृष्टि से एक चिंता की बात है। इस व्यवस्था में विपक्ष का दायित्व होता है कि वह सरकार के कहे-किये पर नज़र रखे, जहां कुछ ग़लत होता दिखे वहां पूरी दृढ़ता के साथ सवाल उठाए। यह शासक का दायित्व है कि वह जनता के प्रति उत्तरदायी हो, और जनतंत्र में यह दायित्व प्रतिपक्ष का होता है कि वह शासक को जनता के प्रति उत्तरदायी होने के लिए आगाह करता रहे। हमारे प्रधानमंत्री स्वयं को चौकीदार कहते हैं, पर वास्तव में चौकीदार की भूमिका जनतंत्र में प्रतिपक्ष को ही निभानी होती है। इस दृष्टि से देखें तो देश की जनता के हितों के प्रति प्रतिपक्ष की भूमिका शासक की भूमिका से कम महत्वपूर्ण नहीं होती।
शासन या व्यवस्था पर निगाह रखने का काम यूं तो न्यायालय भी करता है, पर इस संदर्भ में आदर्श स्थिति यह है कि जनता द्वारा चुना हुआ विपक्ष सत्तारूढ़ पक्ष को निरंकुश होने से रोकने में समर्थ हो। यह तभी हो सकता है जब दोनों पक्षों में एक संतुलन हो। न सत्तारूढ़ पक्ष इतना अधिक ताकतवर हो जाये कि वह विपक्ष को कुछ समझे ही नहीं और न ही विपक्ष से यह उम्मीद की जाती है की वह विरोध के लिए विरोध करता रहे। एक सकारात्मक विपक्ष जो सरकार की अनुचित कार्रवाई का डटकर विरोध कर सके, पर साथ ही जो उचित हो रहा है, उसे सराहे भी, वह संतुलन ला सकता है जो जनतंत्र को महानता देने में मददगार हो सकता है। इसका सीधा-सा मतलब यह है कि जनता सिर्फ सत्तारूढ़ पक्ष का चुनाव नहीं करती, विपक्ष को भी चुनती है। दोनों की निश्चित भूमिका है, दोनों की अपनी-अपनी मर्यादा है, और दोनों के दायित्व भी स्पष्ट हैं।
लेकिन, दोनों पक्षों से मर्यादित आचरण की यह अपेक्षा तभी पूरी हो सकती है, जब विधायिका में संख्या की दृष्टि से एक उचित संतुलन हो। इस दृष्टि से हमारा जनतंत्र थोड़ा कमजोर पड़ता है। इसके कुछ ऐतिहासिक कारण भी रहे हैं। जब हमें आज़ादी मिली तो कांग्रेस पार्टी ही सबसे पुराना और सबसे बड़ा दल थी। चुनाव में कांग्रेस को भारी समर्थन मिलना स्वभाविक था। यही हुआ, और एक अर्से तक ऐसा ही होता रहा। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस का, शुरुआती दौर में, कुल मिलाकर एकछत्र शासन रहा। शासन की दृष्टि से तो यह स्थिति बुरी नहीं थी, पर इसमें निरंकुशता के बढ़ने का खतरा भी था। जनतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करने वाले नेहरू ने इस खतरे को भांपा था। इसलिए, एक बार उन्होंने कांग्रेसी सांसदों से कहा था कि संसद में हमारा विपक्ष कमज़ोर है, इसलिए यह दायित्व भी कांग्रेसी सदस्यों पर ही है कि वह विपक्ष की भूमिका भी निभायें, सरकार के काम पर नजर रखें।
यह स्थिति 1967 के चुनाव में बदली। तब डॉ़ राम मनोहर लोहिया ने जनतंत्र को बनाए रखने के लिए गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया था। यह बताया था कि भारी बहुमत के कारण सत्तारूढ़ पक्ष मनमानी करने लगता है, यह मनमानी खतरे का निशान होती है। देश की जनता ने इस बात को समझा। देश में गैर-कांग्रेसी सरकारों का एक दौर आया। फिर आपातकाल के बाद संसद में भी गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। भले ही वह सरकार ज़्यादा न टिक पायी हो, पर यह बात अवश्य रेखांकित हो गयी थी कि जनतंत्र की सफलता के लिए न केवल विपक्ष का मज़बूत होना ज़रूरी है, बल्कि सत्तारूढ़ पक्ष को निरंकुश होने का भी मौका नहीं दिया जाना चाहिए।
विधानसभाओं में, संसद में, सत्तारूढ़ पक्ष और विपक्ष में एक संतुलन की स्थिति जनतंत्र को मज़बूत बनाती है इन सत्तर-बहत्तर सालों में हमने स्पष्ट देखा है कि यह संतुलन सत्तारूढ़ पक्ष को अक्सर रास नहीं आता। उसकी हमेशा कोशिश रहती है कि वह इतना ताकतवर बन जाये कि जो चाहे कर सके। आपातकाल सत्तारूढ़ पक्ष की इसी प्रवृत्ति का परिणाम था।
सत्तारूढ़ पक्ष के लिए भले ही यह सुगम स्थिति हो कि वह मनमानी कर सके, पर जनतंत्र के हितों का तकाज़ा है कि स्थिति असंतुलन वाली न हो। इसी असंतुलन के चलते पहले कभी कांग्रेस को मनमानी करने का अवसर मिला था, और आज संयोग से, भाजपा के पास यह अवसर है। पिछले दो चुनावों में मिली भारी सफलता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का प्रमाण और परिणाम भले ही हो, जनतंत्र के लिए ऐसी भारी सफलता एक बोझ बन जाती है। ऐसा बोझ कभी भी खतरा साबित हो सकता है।
दुर्भाग्य से आज देश में विपक्ष ऐसी स्थिति में नहीं है कि वह निगरानी रखने की अपनी भूमिका को ईमानदारी से और सही तरीके से निभा सके। भाजपा ने चुनाव से पहले एक नारा दिया था—कांग्रेस-मुक्त भारत का नारा। सन् 2014 में जनता ने परिवर्तन के पक्ष में मत दिया था और 2019 के चुनाव में भी भाजपा को भारी सफलता मिली। स्थिति यह बनी कि लोकसभा में विपक्ष के किसी भी दल के पास इतनी ताकत नहीं थी कि वह अधिकृत विपक्ष होने का दावा कर सकता। उधर, भाजपा ने इस स्थिति का हरसंभव लाभ उठाने का अभियान-सा चला दिया। राज्यों में भी येन-केन-प्रकारेण सत्ता हथियाना उसकी नीतियों का हिस्सा बन गया। उत्तर-पूर्वी राज्य हों, गोवा हो, कर्नाटक या मध्य प्रदेश हो, गैर भाजपाई सरकारों को अस्थिर करना भाजपा को ज़रूरी लगने लगा। सत्ता में बैठे या सत्ता में आने वाले दल को यह नीति भले ही लाभप्रद लगती है, पर जनतांत्रिक मूल्यों-आदर्शों की दृष्टि से यह घाटे का सौदा ही है। आज राजस्थान में जो कुछ हो रहा है, वह अंततः विपक्ष को ही कमज़ोर बनायेगा। और कमज़ोर विपक्ष अंततः जनतंत्र को ही कमज़ोर बनाता है।
जनतंत्र मज़बूत बने, इसके लिए ज़रूरी है कि हमारे राजनीतिक दल, और हमारे राजनेता भी, जनतांत्रिक मूल्यों-मर्यादाओं का पालन करें। हमारे राजनेताओं को यह भी समझ लेना चाहिए कि इस देश का मतदाता बहुमत की व्यवस्था में तो विश्वास करता है, बहुमत की किसी भी प्रकार की तानाशाही में नहीं। साथ ही, कमज़ोर या पंगु विपक्ष भी उसे मान्य नहीं होगा, इसलिए विपक्ष को भी अपने पंख उड़ान के लायक बनाने होंगे। यही जनतंत्र की सफलता की शर्त है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
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