स्वामीभक्ति की परीक्षा
एक बादशाह को अपने लिए एक निजी ख़िदमतगार की जरूरत थी। दरबार में ढेरों दास-दासियां थीं, मगर सब चापलूसी से भरे थे। बादशाह का उनसे रोज वास्ता पड़ता था, अतः वह कोई नया और मनमाफ़िक ख़िदमतगार चाहता था। उसने वज़ीर से कहकर मुनादी करवा दी और निश्चित समय पर इस पद के लिए युवा उम्मीदवारों की भीड़ लग गई। बादशाह ने एक-एक को बुलाकर परीक्षा शुरू की। पहले उम्मीदवार से कहा—सामने रखा फूलदान उठा लाओ। वह ले आया तो हुक्म हुआ, अब इसे फेंक दो। उसने आज्ञा पर अमल करते हुए फूलदान वहीं फेंक दिया। बादशाह ने पूछा—फूलदान क्यों तोड़ा? युवक बोला—हुज़ूर, आपने ही आज्ञा दी थी, सो पालन तो करना ही था। ऐसे ही बादशाह ने अन्य युवकों से भी कई बर्तन तुड़वा डाले, सबने इसे बादशाह की आज्ञा का पालन बताया। अब अंतिम युवक आया और बादशाह ने उससे भी फूलदान तोड़ने का कारण पूछा तो वह बोला—हुज़ूर, मुझसे ग़लती हो गई। माफ़ी चाहता हूं। बादशाह ने उसे तुरंत रख लिया। वज़ीर ने कारण पूछा—इन सबमें यही अकेला शख्स था, जिसने मालिक की गलती भी स्वयं पर ले ली। स्वामीभक्त सेवक से यही अपेक्षा की जाती है।
प्रस्तुति : मुकेश कुमार जैन

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