पुस्तक समीक्षा

मनमोहन सहगल

उपन्यास ‘मंगला से शयन तक’ सुश्री अचला नागर की हालिया रचना है, जिसमें ईश्वर की सत्ता को इधर-उधर खोजने की अपेक्षा मानवता में खोजने का संदेश दिया गया है। ‘मैं इनसानियत में बसता हूं, लोग मुझे मजहबों में ढूंढ़ते हैं’ के कथन के साक्ष्य में प्रस्तुत उपन्यास की कथा का विकास किया गया है। विडंबना यह है कि जहां मानवता निवास करती है, वहीं घृणा और अमानवीय कृत्य भी पनपते हैं। यही इस उपन्यास का संदेश है, ताकि जनमानस पतनोन्मुखी होने से बच सके।
यह आगरा नगर की गंगा-जमुनी तहजीब को उजागर करते हुए ऐसे मुसलमान परिवारों की कथा है जो हिंदुओं के साथ घी-खिचड़ी की तरह जीवन जीते और सगे-संबंधियों से भी अधिक प्यार और आदर-सत्कार से रहते हैं। यशपाल द्वारा तारा नामक लड़की को वेश्यालय की गंदगी से छुड़वाने-बचाने से लेकर लड़की के इस्लामिक परिवार में रहकर संगीत प्रशिक्षण तथा अपने सुमधुर अलापों के कारण विदेशों में भी संगीत का परचम लहराने की कथा आगे बढ़ती है। अजान और आरती, नमाज और देव-स्तुति परस्पर मिलकर की जाती है। इसमें ईसाई और सिख परिवार भी नहीं छूटते। एलबर्ट और करतार कथा में सहिष्णुता की पूर्ण भूमिका निभाते हैं। नन्हे मियां तथा श्रीराम के परिवार लोकतांत्रिक हैं, होली-दीवाली, ईद-रमजान मिलकर मनाते हैं। मौलाना हजरत मुआनी का उद्धरण देते हुए एक स्थान पर लेखिका ने उनके द्वारा जन्माष्टमी मनाने के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा ‘श्रीकृष्ण ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने अगर गोपियों के साथ रास रचाये तो गीता का संदेश भी दिया है। होली के रंग में दागदार वस्त्र पहन कर जब वह नमाज पढ़ते तो लोगों के एतराज करने पर भोले से बनकर उत्तर देते—इनमें मेरे हिंदू भाइयों की मुहब्बत छिपी है और मुहब्ब्त ही खुदा है।’
इतना ही नहीं, रमजान अली उर्फ नन्हे मियां रोज प्रात: पांच बजे तैयार होकर मंगला आरती के लिए हाथ में टार्च लेकर सड़क पर निकल आते। दो घर छोड़ पं. विष्णु शर्मा का घर था। दोनों मित्र साथ में मंदिर जाते और आरती में भाग लेते। ईश्वर और अल्लाह, मंदिर और मस्जिद, पूजा और इबादत में वे कोई फर्क न करते। नन्हे कहते सुबह से रात तक पांच नमाजें पढ़ी जाती हैं, ऐसे ही मंगला से शयन तक पांच आरती होती हैं। कुल मिलाकर मतलब तो ईश्वर-अल्लाह को याद करना ही है। इसके अतिरिक्त, नफरत और गर्हित सोच आज के दूषित वातावरण के कारण उसी घराने से फूटती दिखाई गई है।
भाव यह है कि लेखिका दो युगों और पीढ़ियों में मैत्री-प्यार और नफरत के बीच बढ़ती कटुता को इंगित करती हुई समाज को जाग्रत करना चाहती है ताकि मानवता के विकास में अमानवीय सोच का विष न घोला जा सके। उपन्यास पठनीय और विचारणीय है—ईश्वर मानवता में है, मजहबों में नहीं।
पुस्तक : मंगला से शयन तक लेखिका : सुश्री अचला नागर प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद पृष्ठ : 223 मूल्य : रु. 495.

जिंदगी की धूप-छांव की बात
राजेंद्र धवन

पत्रकारिता व संगीत का शौक रखने वाली मधु शर्मा के प्रथम कविता संग्रह ‘मोह के धागे’ में 64 कविताएं पिरोई गई हैं। कवयित्री ने अपनी रचनाओं में जिंदगी की धूप-छांव का सजीव चित्रण किया है। इनकी लेखन शैली कविताओं से पाठकों को बांधे चली जाती है।
मधु की कविताओं में रिश्तों की गहराई साफ महसूस होती है। एक जगह कहा भी गया है कि काव्य लेखन में जब से मन रमा, फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।
मुड़ कर देखो तो
रेत का गुबार नज़र आता है
ठान लो अगर आगे बढ़ने का
तब रास्ता साफ नज़र आता है
मधु की कविताओं में मायके की गलियां, बचपन, मां-बाप का दुलार, संतान आदि हरेक का जिक्र बड़ी भावुकता के साथ उभरता है। कवयित्री का मन प्रकृति के भी बहुत निकट है। चंद्रमा की शीतलता हो, सूर्य की तेजस्विता या मिट्टी की सौंधी महक या प्रकृति का कोई अन्य रूप, लेखिका की लेखनी से बच नहीं सका है। यही इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि भी है।
‘जिंदगी’ नामक कविता में कवयित्री हर पल शिद्दत के साथ जीना चाहती है :-
जि़ंदगी मिली है एक ख्वाब-सी
जब देखो तब मुस्कुराती है
मैं हंसती हूं तो खुश होती है ज़िंदगी
मैं रोती हूं तो रोती है
‘बदलती तस्वीरें’ कविता में वह फिर से बच्चा बन जाना चाहती है और मां के पल्लू से लिपटकर फिर इतराना चाहती है। ‘पंछी’ में इनसान से उन पर दया की याचना की जाती है। ‘बूंद’ शीर्षक कविता में मिट्टी बादलों की गरज से लहलहा जाती है। संग्रह की अंतिम कविता ‘अपने जन्मदिन पर’ भी बड़ी मार्मिक बन पड़ी है।
पुस्तक : मोह के धागे कवयित्री : मधु शर्मा प्रकाशक : साहित्य सागर प्रकाशन, जयपुर पृष्ठ : 120 मूल्य : रु. 200.

सघन अनुभूतियों का नूर
सरस्वती रमेश

जिंदगी एक सफर है। इस सफर में हमारी बहुत सारे लोगों से मुलाकात होती है। कई तरह की अनुभूतियां होती हैं। लेकिन यही वे किस्से हैं, जिससे हमारी जिंदगी समृद्ध होती है। निवेदिता चक्रवर्ती का कविता संग्रह ‘मेरे हिस्से के नूर’ भी कुछ ऐसे ही अनुभवों से भरा हुआ है। ये कविताएं तो बस अनुभूतियों की यात्रा हैं। यात्राएं तो अपने आप में निमित्त होती हैं।
संग्रह की कविताएं दो हिस्से में बंटी हुई हैं। पहले हिस्से की कविताएं ‘उजली सुबह के नूर’ में संकलित हैं। इन कविताओं को कवयित्री ने अपनी उम्र के 25वें पड़ाव तक लिखा है। दूसरा हिस्सा है ‘तपती दोपहर के नूर’, इसमें अगले 25 वर्ष की कविताएं हैं। पहला हिस्सा उजली सुबह के धूप सरीखी नरम किन्तु भरपूर चमक लिये है। निवेदिता बड़ी दक्षता से अपनी कविताओं को उथला होने से बचा लेती हैं। उनके गाढ़े भाव पाठक को गहराई में उतार देते हैं। कविताओं में छोटी-छोटी खुशियों का जश्न है, यादें हैं, उमंगे हैं। रिश्तों का आना जाना है। बुढ़ापे की छड़ी है और जवानी की घड़ी है। मसलन एक उम्र जी लेने पर जो कुछ हाथ लगता है वह सब कवयित्री ने यहां निचोड़ने की कोशिश की है।
पुस्तक : मेरे हिस्से के नूर कवयित्री : निवेदिता चक्रवर्ती प्रकाशक : इन्विंसिबल पब्लिशर्स पृष्ठ : 204 मूल्य : रु. 599.

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