कालजयी कहानी

मोहन राकेश

चित्रांकन : संदीप जोशी

चेयरिंग क्रॉस पर पहुंचकर मैंने देखा कि उस वक्त वहां मेरे सिवा एक भी आदमी नहीं है। एक बच्चा, जो अपनी आया के साथ वहां खेल रहा था, अब उसके पीछे भागता हुआ ठंडी सड़क पर चला गया था। आसपास के विस्तार को देखते हुए उस नि:स्तब्ध एकान्त में मुझे हार्डी के एक लैंडस्केप की याद हो आयी, जिसके कई पृष्ठों के वर्णन के बाद मानवता दृश्यपट पर प्रवेश करती है अर्थात‍् एक छकड़ा धीमी चाल से आता दिखाई देता है। मेरे सामने भी खुली घाटी थी, बादल थे, चेयरिंग क्रॉस का सुनसान मोड़ था और यहां भी कुछ उसी तरह मानवता ने दृश्यपट पर प्रवेश किया—अर्थात‍् एक पचास-पचपन साल का भला आदमी छड़ी टेकता दूर से आता दिखाई दिया। जब वह मुझसे कुछ ही फ़ासले पर रह गया, तो उसने आंखें तीन-चौथाई बंद करके छोटी-छोटी लकीरों जैसी बना लीं और मेरे चेहरे का गौर से मुआयना करता हुआ आगे बढ़ने लगा। मेरे पास आने तक उसकी नज़र ने जैसे फैसला कर लिया, और उसने रुककर छड़ी पर भार डाले हुए पल-भर के वक्फे के बाद पूछा, ‘यहां नये आये हो?’
‘जी हां’, मैंने उसकी मुरझाई हुई पुतलियों में अपने चेहरे का साया देखते हुए ज़रा संकोच के साथ कहा। ‘आप यहीं रहते हैं?’ मैंने पूछा। ‘हां यहीं रहते हैं।’ उसने विरक्ति और शिकायत के स्वर में उत्तर दिया। उसकी रस्सी की तरह बंधी टाई से यह अनुमान होता था कि वह एक रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी है। ‘आपकी यहां पर अपनी ज़मीन होगी?’ मैंने उत्सुकता न रहते हुए भी पूछ लिया। ‘ज़मीन?’ उसके स्वर में और भी निराशा और शिकायत भर आयी, ‘ज़मीन कहां जी?’ मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अब मुझे क्या कहना चाहिए। मैंने पूछ लिया, ‘तो आप यहां कोई अपना निज का काम करते हैं?’ ‘काम क्या करना है जी?’ उसने जवाब दिया, ‘घर से खाना अगर काम है, तो वही काम करते हैं और आजकल काम रह क्या गये हैं? मेरा ध्यान पल-भर के लिए जली हुई इमारत के ज़ीने की तरफ़ चला गया। उसके ऊपर एक बन्दर आ बैठा था और सिर खुजलाता हुआ शायद यह फैसला करना चाह रहा था कि उसे कूद जाना चाहिए या नहीं। ‘अकेले आये हो?’ अब उस आदमी ने मुझसे पूछ लिया। ‘जी हां, अकेला ही आया हूं,’ मैंने जवाब दिया।
‘आजकल यहां आता ही कौन है?’ सैर के लिए अच्छी जगहें हैं शिमला, मंसूरी वग़ैरह। वहां क्यों नहीं चले गये?’ ‘ख़ैर, अब तो आ ही गये हो,’ वह फिर बोला, ‘कुछ दिन घूम-फिर लो। ठहरने का इंतज़ाम कर लिया है?’ ‘जी हां,’ मैंने कहा, ‘कथलक रोड पर एक कोठी ले ली है।’ ‘सभी कोठियां खाली पड़ी हैं।’ वह बोला, ‘हमारे पास भी एक कोठरी थी। अभी कल ही दो रुपये महीने पर चढ़ाई है।’ फिर दो-एक क्षण के बाद उसने पूछा, ‘खाने का क्या इंतजाम किया है?’ ‘अभी कुछ नहीं किया। इस वक्त इसी ख्याल से बाहर आया था कि कोई अच्छा-सा होटल देख लूं, जो ज्यादा महंगा भी न हो।’
‘नीचे बाज़ार में चले जाओ,’ वह बोला, ‘नत्थासिंह का होटल पूछ लेना। सस्ते होटलों में वही अच्छा है।’ फिर छड़ी टेकता हुआ वह अपने रास्ते पर चल दिया। नत्थासिंह का होटल बाज़ार में बहुत नीचे जाकर था। जिस समय मैं वहां पहुंचा बुड्ढा सरदार नत्थासिंह और उसके दोनों बेटे अपनी दुकान के सामने हलवाई की दुकान में बैठे हलवाई के साथ ताश खेल रहे थे। मुझे देखते ही नत्थासिंह ने तपाक से अपने बड़े लड़के से कहा, ‘उठ बसंते, ग्राहक आया है।’ बसन्ते बाहर निकल आया। ‘क्या चाहिए साब?’ उसने आकर अपनी गद्दी पर बैठते हुए पूछा। ‘एक प्याली चाय बना दो,’ मैंने कहा। ‘अभी लीजिए!’ ‘अंडे-वंडे रखते हो?’ मैंने पूछा। ‘रखते तो नहीं, पर आपके लिए अभी मंगवा देता हूं,’ वह बोला, ‘कैसे अंडे लेंगे? फ्राई या आमलेट?’ ‘आमलेट,’ मैंने कहा।
‘जा हरबंसे, भागकर ऊपर वाले लाला से दो अंडे ले आ,’ उसने अपने छोटे भाई को आवाज़ दी। बसन्ता केतली भट्ठी पर रखकर नीचे से हवा करने लगा। हलवाई अपने पायजामे का कपड़ा उंगली और अंगूठे के बीच में लेकर जांघ खुजलाता हुआ कह रहा था, ‘अब चढ़ाई शुरू हो रही है नत्थासिंह!’ ‘हां, अब गर्मियां आयी हैं, तो चढ़ाई शुरू होगी ही,’ नत्थासिंह अपनी सफेद दाढ़ी में उंगलियों से कंघी करता हुआ बोला। ‘पर नत्थासिंह, अब वह पहले वाली बात नहीं है, हलवाई ने कहा, ‘पहले दिनों में हज़ार-बारह सौ आदमी इधर को आते थे, हज़ार-बारह सौ उधर को जाते थे, तो लगता था कि हां, लोग बाहर से आये हैं। अब भी आ गये सौ-पचास तो क्या है!’ ‘सौ-पचास की भी बड़ी बरकत है,’ नत्थासिंह धार्मिकता के स्वर में बोला। ‘कहते हैं आजकल किसी के पास पैसा ही नहीं रहा,’ हलवाई ने जैसे चिन्तन करते हुए कहा, ‘यह बात मेरी समझ में नहीं आती। दो-चार साल सबके पास पैसा हो जाता है, फिर एकदम सब के सब भूखे-नंगे हो जाते हैं!’ ‘सब करनी करतार की है,’ कहता हुआ नत्थासिंह भी पत्ते फेंककर उठ खड़ा हुआ। हलवाई बेमन से पत्ते रखता हुआ बोला, ‘जब करतार पैदावार उसी तरह करता है, तो लोग क्यों भूखे-नंगे हो जाते हैं? यह बात मेरी समझ में नहीं आती।’
कुछ देर बाद मैं चाय पीकर वहां से चलने लगा, तो बसंते ने कुल छह आने मांगे। उसने हिसाब भी दिया—चार आने के अंडे, एक आने का घी और एक आने की चाय। मैं पैसे देकर बाहर निकला, तो नत्थासिंह ने पीछे से आवाज़ दी, ‘भाई साहब, रात को खाना भी यहीं खाइएगा। आज आपके लिए स्पेशल चीज़ बनाएंगे! ज़रूर आइएगा।’ उसके स्वर में ऐसा अनुरोध था कि मैं मुस्कुराए बिना नहीं रह सका। शाम को सैर से लौटते हुए मैंने बुक एजेंसी से अख़बार ख़रीदा और बैठकर पढ़ने के लिए एक बड़े से रेस्तरां में चला गया। अंदर पहुंचकर देखा कि कुर्सियां, मेज़ और सोफ़े करीने से सज़े हुए हैं, पर न तो हॉल में कोई बैरा है और न ही काउंटर पर कोई आदमी। मैं एक सोफ़े पर बैठकर अख़बार पढ़ने लगा। एक कुत्ता जो उस सोफ़े से सटकर लेटा था, अब वहां से उठकर सामने के सोफ़े पर आ बैठा और मेरी तरफ़ देखकर जीभ लपलपाने लगा। मुझे पंद्रह-बीस मिनट बीत गये। आख़िर जब मैं वहां से उठने को हुआ, तो बाहर का दरवाज़ा खुला और पायजामा-कमीज पहने एक आदमी अंदर दाख़िल हुआ। मुझे देखकर उसने संकोच के साथ कहा, ‘माफ कीजिएगा, मैं एक बाबू का सामान मोटर-अड्डे तक छोड़ने चला गया था।’ मैंने उसके ढीले-ढाले जिस्म पर एक गहरी नज़र डाली और उससे पूछ लिया, ‘तुम यहां अकेले ही काम करते हो?’ ‘जी, आजकल अकेला ही हूं,’ उसने जवाब दिया। ‘यहां का कोई मैनेजर नहीं है?’ मैंने पूछा। ‘जी, मालिक आप ही मैनेजर हैं,’ वह बोला, ‘वह आजकल अमृतसर में रहता है। यहां का सारा काम मेरे ज़िम्मे है।’ ‘अच्छा ज़रा अपना मेन्यू दिखाना।’ उसके चेहरे के भाव से मैंने अन्दाज़ा लगाया कि वह मेरी बात नहीं समझा। मैंने उसे समझाते हुए कहा, ‘तुम्हारे पास खाने-पीने की चीज़ों की छपी हुई लिस्ट होगी, वह ले आओ।’ ‘अभी लाता हूं जी,’ कहकर वह सामने की दीवार की तरफ़ चला गया और वहां से एक गत्ता उतार लाया। देखने पर मुझे पता चला कि वह उस होटल का लाइसेंस है। ‘यह तो यहां का लाइसेंस है’, मैंने कहा। वह असमंजस में पड़ गया। ‘अच्छा ठीक है, मेरे लिए चाय ले आओ,’ मैंने कहा। अब वह काफी आत्मीयता से बोला, ‘मैं कहता हूं, खाने का टैम है, खाना ही खाओ। चाय का क्या पीना! साली अन्दर जाकर नाडि़यों को जलाती है।’ मैं उसकी बात पर मन-ही-मन मुस्कुराया। मैंने पूछा, ‘सब्जी-अब्जी क्या बनाई है?’ ‘आलू-मटर, आलू-टमाटर, भुर्ता, भिंडी, कोफ्ता, रायता…’ वह जल्दी-जल्दी लम्बी सूची बोल गया। ‘कितनी देर में ले आओगे?’ मैंने पूछा। ‘बस जी पांच मिनट में।’ ‘तो आलू-मटर और रायता ले आओ। साथ ख़ुश्क चपाती।’ ‘पर साहब,’ और फिर स्वर में वही आत्मीयता लाकर उसने कहा, ‘बरसात का मौसम है। रात के वक्त रायता नहीं खाओ, तो अच्छा है। ठंडी चीज़ है। बाज़ वक्त नुक़सान कर जाती है।’ उसकी आत्मीयता से प्रभावित होकर मैंने कहा, ‘तो अच्छा, सिर्फ़ आलू-मटर ले आओ।’ ‘बस, अभी लो जी, अभी लाया,’ कहता हुआ वह नीचे चला गया।
उसके जाने के बाद मैं कुत्ते से जी बहलाने लगा। चार-पांच मिनट के बाद बाहर का दरवाज़ा फिर खुला और एक पहाड़ी नवयुवती अंदर आ गयी। उसके कपड़ों और पीठ पर बंधी टोकरी से ज़ाहिर था कि वह वहां की कोयला बेचने वाली लड़कियों में से है। वह सीधी मेरे पास आ गयी और छूटते ही बोली, ‘बाबूजी, हमारे पैसे आज ज़रूर मिल जाएं।’ मेरे कुछ कहने से पहले ही वह फिर बोली, ‘आपके आदमी ने एक किल्टा कोयला लिया था। आज छह-सात दिन हो गये। मैं आज तीसरी बार मांगने आयी हूं। आज मुझे पैसों की बहुत ज़रूरत है।’ मैंने कुत्ते को बांहों से निकल जाने दिया। मेरी आंखें उसकी नीली पुतलियों को देख रही थीं। उसके कपड़े मैले थे। मुझे उसकी ठोड़ी की तराश बहुत सुंदर लगी। सोचा कि उसकी ठोड़ी के सिरे पर अगर एक तिल भी होता…। ‘मेरे चौदह आने पैसे हैं,’ वह कह रही थी। और मैं सोचने लगा कि उसे ठोड़ी के तिल और चौदह आने पैसे में से एक चीज़ चुनने को कहा जाए, तो वह क्या चुनेगी?
‘मुझे आज जाते हुए बाज़ार से सौदा लेकर जाना है,’ वह कह रही थी। ‘कल सवेरे आना!’ उसी समय बैरे ने ज़ीने से ऊपर आते हुए कहा। ‘रोज़ मुझसे कल सवेरे बोल देता,’ वह मुझे लक्ष्य करके ज़रा गुस्से के साथ बोली, ‘इससे कहिए कल सवेरे मेरे पैसे ज़रूर दे दे।’ ‘इनसे क्या कह रही है, ये तो यहां खाना खाने आये हैं,’ बैरा उसकी बात पर थोड़ा हंस दिया। इससे लड़की की नीली आंखों में संकोच की हल्की लहर दौड़ गयी। वह अब बदले हुए स्वर में मुझसे बोली, ‘आपको कोयला तो नहीं चाहिए?’ ‘नहीं,’ मैंने कहा। ‘ये यहां आकर खाना खाते हैं, इन्हें कोयला नहीं चाहिए,’ बैरे ने उसे झिड़क दिया। ‘आपको खाना बनाने के लिए नौकर चाहिए?’ लड़की बात करने से नहीं रुकी, ‘मेरा छोटा भाई है। सब काम जानता है। आठ रुपये महीने में सारा काम कर देगा पहले एक डॉक्टर के घर में काम करता था। डॉक्टर अब यहां से चला गया है…।’ बैरे ने अब उसे बांह से पकड़ लिया और बाहर की तरफ़ ले जाता हुआ बोला, ‘चल-चल, जाकर अपना काम कर।’ ‘मैं कल इसी वक्त उसे लेकर आऊंगी,’ लड़की ने फिर भी चलते-चलते मुड़कर कह दिया।
बैरा उसे दरवाज़े से बाहर पहुंचाकर पास आता हुआ बोला, ‘कमीन जात! ऐसे गले पड़ जाती हैं कि बस…!’ ‘खाना अभी कितनी देर में लाओगे?’ मैंने उससे पूछा। ‘बस जी पांच मिनट में लेकर आ रहा हूं,’ वह बोला, ‘आटा गूंथकर सब्जी चढ़ा आया हूं। ज़रा नमक ले आऊं, आकर चपातियां बनाता हूं।’
ख़ैर, खाना मुझे काफ़ी देर से मिला। खाने के बाद मैं काफ़ी देर ठंडी-गरम सड़क पर टहलता रहा। लौटते वक्त बाज़ार के पास से निकलते हुए मैंने सोचा कि नाश्ते के लिए सरदार नत्थासिंह से दो अंडे उबलवाकर लेता चलूं। दस बज चुके थे, पर नत्थासिंह की दुकान अभी खुली थी। मैं वहां पहुंचा तो नत्थासिंह और उसके दोनों बेटे पैरों के भार बैठे खाना खा रहे थे। मुझे देखते ही बसंते ने कहा, ‘वह लो, आ गये भाई साहब!’ ‘हम कितनी देर इंतजार कर-करके अब खाना खाने बैठे हैं!’ हरबंसा बोला। ‘ख़ास आपके लिए मुर्गा बनाया था।’ पर न आप आये, और न किसी और ने ही मुर्गे की प्लेट ली। हम अब तीनों खुद खाने बैठे हैं। ज़िन्दगी में ऐसे भी दिन देखने थे! वे भी दिन थे कि जब अपने लिए मुर्गे का शोरबा तक नहीं बचता था! और एक दिन यह है। भरी हुई पतीली सामने रखकर बैठे हैं! गांठ से साढ़े तीन रुपये लग गये, जो अब पेट में जाकर खनकते भी नहीं! जो तेरी करनी मालिक!’ ‘इसमें मालिक की क्या करनी है?’ बसन्ता ज़रा तीख़ा होकर बोला, ‘जो करनी है, सब अपनी ही है! आप ही को जोश आ रहा था कि चढ़ाई शुरू हो गयी है, लोग आने लगे हैं, मैंने कहा था कि अभी आठ-दस दिन ठहर जाओ, पर नहीं माने! हठ करते रहे कि अच्छी चीज़ से मुहूरत करेंगे तो सीजन अच्छा गुज़रेगा। लो, हो गया मुहूरत!’
उसी समय वह आदमी, जो कुछ घंटे पहले मुझे चेयरिंग क्रॉस पर मिला था, मेरे पास आकर खड़ा हो गया। अंधेरे में उसने मुझे नहीं पहचाना और छड़ी पर भार देकर नत्थासिंह से पूछा, ‘नत्थासिंह एक ग्राहक भेजा था, आया था?’ ‘कौन ग्राहक?’ नत्थासिंह चिढ़े-मुरझाए हुए स्वर में बोला। ‘घुंघराले बालों वाला नौजवान था—मोटे शीशे का चश्मा लगाए हुए…?’ ‘ये भाई साहब खड़े हैं!’ इससे पहले कि वह मेरा और वर्णन करता, नत्थासिंह ने उसे होशियार कर दिया। ‘अच्छा आ गये हैं!’ उसने मुझे लक्ष्य करके कहा और फिर नत्थासिंह की तरफ़ देखकर बोला, ‘तो ला नत्थासिंह, चाय की प्याली पिला।’ कहता हुआ वह सन्तुष्ट भाव से अंदर टीन की कुर्सी पर जा बैठा। बसंता भट्ठी पर केतली रखते हुए जिस तरह से बुदबुदाया उससे जाहिर था कि वह आदमी चाय की प्याली ग्राहक भेजने के बदले में पीने जा रहा है!
साभार : हिंदी समय डॉट कॉम

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