अनूप भटनागर

हमारे देश की न्यायपालिका में महिला न्यायाधीशों की भागीदारी में इजाफा हुआ है लेकिन भारत को अभी भी पहली महिला प्रधान न्यायाधीश का इंतजार है। यह इंतजार काफी लंबा हो सकता है क्योंकि फरवरी, 2027 तक ऐसी कोई संभावना नहीं है।
उच्चतम न्यायालय में इस समय न्यायाधीशों के दो पद रिक्त हैं। इनके अलावा, न्यायमूर्ति आर. भानुमति और न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा इस साल जुलाई और सितंबर में सेवानिवृत्त हो रहे हैं। चूंकि ऐसी स्थिति में शीर्ष अदालत में चार न्यायाधीशों की नियुक्ति होनी है, इसलिए कॉलेजियम चाहे तो किसी ऐसी महिला न्यायाधीश को पदोन्नति देने की सिफारिश कर सकती है, जिसे आगे चलकर देश की प्रथम महिला प्रधान न्यायाधीश होने का गौरव हासिल हो सके। हम भले ही समाज के विभिन्न क्षेत्रों में लैंगिक असमानता खत्म करने के लिए भरसक प्रयास करने का दावा करते हों, लेकिन आज भी कई शीर्ष और महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी महिलाओं को सौंपने में हमारी सोच बाधक बन जाती है।
देश में संविधान लागू होने के सात दशक बाद भी न्यायपालिका के इस शीर्ष पद पर किसी महिला न्यायाधीश की नियुक्ति नहीं होना अनेक सवाल खड़े करता है। हमारे देश में अगर महिलाएं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष और राज्यों में मुख्यमंत्री और उच्च न्यायालयों की बागडोर संभाल सकती हैं तो फिर देश की प्रधान न्यायाधीश क्यों नहीं बन सकतीं?
उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति और उन्हें पदोन्नति देने की सिफारिश करने का अधिकार इस समय न्यायपालिका के हाथ में ही है, इसलिए मौलिक अधिकारों की रक्षा और लैंगिक न्याय दिलाने के लिए सदैव प्रतिबद्ध रहने वाली न्यायपालिका को ही इस दिशा में पहल करनी होगी ताकि आने वाले सालों में देश को पहली महिला प्रधान न्यायाधीश मिल सके।
उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश पद पर नियुक्ति के साथ ही पता चल जाता है कि अमुक न्यायाधीश प्रधान न्यायाधीश बनेंगे, तो कितने समय के लिए, या नहीं। ऐसी स्थिति में महिला न्यायाधीश को देश की प्रथम महिला प्रधान न्यायाधीश बनने का गौरव प्रदान करने के लिए शीर्ष अदालत की कॉलेजियम को ही पहल करनी होगी। लेकिन मौजूदा दौर में तो यह मृगतृष्णा ही लगती है। कॉलेजियम के लिए ऐसा करना नामुमकिन नहीं है। हाल के बरसों में ऐसा हुआ है। वरिष्ठ अधिवक्ता उदय यू. ललित की सीधे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश पद नियुक्ति के समय ही यह साफ हो गया था कि वह 2022 में देश के प्रधान न्यायाधीश भी बनेंगे।
कॉलेजियम चाहे तो विलक्षण प्रतिभा की धनी और पर्याप्त अनुभव रखने वाली किसी महिला अधिवक्ता को इस तरह से सीधे शीर्ष अदालत में नियुक्त करने की सिफारिश कर सकती है, जिससे कि वह देश के प्रधान न्यायाधीश पद तक पहुंच सके। इसके लिए बार से ही किसी अनुभवी महिला अधिवक्ता का चयन करने पर विचार किया जा सकता है और ऐसा नहीं होने की स्थिति में उच्च न्यायालय में पदासीन किसी वरिष्ठ महिला न्यायाधीश के नाम पर विचार हो सकता है।
इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में महिला न्यायाधीशों की भागीदारी बढ़ने के बावजूद देश को अभी तक महिला प्रधान न्यायाधीश से वंचित रखने के मामले में न्यायाधीश पद के लिए चयन और पदोन्नति की मौजूदा व्यवस्था काफी हद तक जिम्मेदार है। ऐसा प्रतीत होता है कि पुरुष प्रधान सोच अधिक हावी रहती है।
उच्चतम न्यायालय में इस समय तीन महिला न्यायाधीश— न्यायमूर्ति आर भानुमति, न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा और न्यायमूर्ति इन्दिरा बनर्जी हैं। न्यायमूर्ति भानुमति 19 जुलाई को सेवानिवृत्त हो रही हैं जबकि न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा का कार्यकाल 13 मार्च, 2021 और न्यायमूर्ति इन्दिरा बनर्जी का कार्यकाल 23 सितंबर, 2022 तक है।
देश में पहली बार छह अक्तूबर, 1989 को केरल की न्यायमूर्ति एफ. फातिमा बीवी, जो बाद में राज्यपाल भी बनीं, को शीर्ष अदालत का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। वह अप्रैल, 1992 तक इस पद पर रहीं। इसके बाद, न्यायमूर्ति वी. सुजाता मनोहर नवंबर, 1994 से अगस्त, 1999 तक, न्यायमूर्ति रूमा पॉल जनवरी, 2000 से जून, 2006 तक, न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा अप्रैल, 2010 से अप्रैल, 2014 तक और न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई सितंबर, 2011 से अक्तूबर, 2014 तक शीर्ष अदालत की न्यायाधीश रहीं।
मौजूदा समय में उच्च न्यायालयों में महिला न्यायाधीशों के कार्यकाल के आधार पर कर्नाटक उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति बी. वेंकटरमैया नागरत्न इस पद के लिए दावेदार हो सकती हैं, बशर्ते कॉलेजियम शीर्ष अदालत में पदोन्नति के लिए समय रहते उनके नाम की सिफारिश करे और सरकार बगैर किसी नुक्ताचीनी के उसे मंजूरी दे।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति नागरत्न का कार्यकाल 29 अक्तूबर, 2024 तक है। अगर कॉलेजियम न्यायमूर्ति नागरत्न को पदोन्नति देकर शीर्ष अदालत का न्यायाधीश बनाने की सिफारिश करता है और सरकार उसे स्वीकार कर लेती है तो उनका कार्यकाल तीन साल बढ़ जायेगा। इस तरह, वह आठ महीने के लिए देश की प्रथम महिला प्रधान न्यायाधीश बन सकती हैं।

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