लोकपाल : सौ दिन चले अढ़ाई कोस
माधव गोडबोले
लोकपाल : सौ दिन चले अढ़ाई कोस
लोकपाल बनाना भारत की सिविल सोसायटी के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना गया था। सत्ता में कोई भी दल रहा हो, लेकिन शायद ही किसी अन्य संस्था को अपने गठन की राह में राजनीतिक प्रतिष्ठानों की ओर से इतनी कड़ी रुकावटों का सामना करना पड़ा होगा, जितना लोकपाल पद सर्जन करने के दौरान हुआ है। 35 सालों से ज्यादा समय तक लटकते रहे लोकपाल पद हेतु समय-समय पर पेश किए गए विधेयक इसलिए पारित न हो पाए क्योंकि उन पर बाद में कोई दिलचस्पी नहीं ली गई थी। एक मिथक यह भी गढ़ा गया कि अगर कोई सरकार लोकपाल बिल लाने में सक्रियता दिखाती है तो वह जल्द ही सत्ता से बाहर हो जाती है।
प्रधानमंत्री पद को भी लोकपाल की वैधानिक शक्ति के अंतर्गत लाया जाना चाहिए, यह बात सबसे ज्यादा विवादास्पद विषयों में एक रही थी। आखिरकार दिल्ली में लोकपाल को लेकर हुए अण्णा हजारे के आंदोलन, देशभर में बेशुमार नागरिक कैंडल मार्च और मीडिया की सक्रियता रंग लाई। घोटालों के सिलसिले के कारण पहले ही बैकफुट पर आ चुकी यूपीए-2 को लोकपाल कानून पारित करने में अपनी भूमिका निभानी पड़ी थी। लेकिन वर्ष 2014 में सत्तासीन होने के बाद भाजपा ने भी लोकपाल पर कदम खींचने शुरू कर दिए थे। नई सरकार की उदासीनता को देखते हुए हुए पिछले फैसलों को अमल में लाने के लिए एक जनहित याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर करनी पड़ी थी। अंततः सरकार को मानना पड़ा और लोकपाल का पद वर्ष 2019 में वजूद में आया है।
परंतु लोकपाल का काम शुरू करवाने से पहले ही जिस किस्म के शुुरुआती कदम उठाए गए हैं, वे चिंताजनक हैं। लोकपाल पद बनाये जाने के लगभग एक साल बाद इस साल 2 मार्च को लोकपाल-नियमों की अधिसूचना जारी की गई है, इसमें कहा है कि वर्तमान अथवा पूर्व प्रधानमंत्री के विरुद्ध आई किसी शिकायत पर कोई जांच बनती है या नहीं, पहले इसे पूर्ण खंडपीठ के सामने पेश किया जाएगा। सुनवाई के बाद वही इस बाबत फैसला लेगी। अगर कोई शिकायत खारिज की जाती है तो ऐसा करने के पीछे कोई कारण नहीं बताया जाएगा और न ही इस आरंभिक परख का कोई रिकार्ड रखा जाएगा, इतना ही नहीं, न तो इसकी तफ्सील छापी जा सकती न ही किसी को दी जाएगी। यह वही प्रक्रिया है जो जनहित याचिका मामला दायर होने के बाद लागू की जाती है।
लेकिन लोकपाल कोई न्यायिक अदालत नहीं है। यह एक विशेष प्रावधान है जिसे भ्रष्टाचार से लड़ने की जिम्मेवारी दी गई है। अब पेंच यह है कि अगर प्रधानमंत्री के खिलाफ आई शिकायत को खारिज करने के कारण नहीं बताए जाएंगे तो याची सर्वोच्च न्यायलय में इस निर्णय के विरुद्ध अगली अपील नहीं कर पाएगा। अतएव लोकपाल सर्जना के आरंभिक सालों में विशेष रूप से सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इस संस्था की साख स्थापित हो पाए। लोकपाल की ओर से आया हर निर्णय खुद अपनी बानगी कहता और स्व-व्याख्यात्मक तथ्यों पर आधारित हो। इस सिद्धांत पर किसी भी सूरत में समझौता न किया जाए।
हालांकि यह भी सही है कि बेलगाम होकर भ्रष्टाचार का रिकॉर्ड बनाने वाली यूपीए-2 सरकार ने अन्ना आंदोलन से घबराकर मांगों में कुछ अव्यावहारिक प्रावधानों का प्रतिरोध नहीं किया था। लिहाजा इसी वजह से ऐसी लोकपाल व्यवस्था वजूद में आई है, जिसका शीर्ष तो काफी भारी-भरकम है परंतु आधारहीन है। चूंकि लोकपाल को अपना काम शुरू करने में महीनों लग गए, इससे आजिज आए दो सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया है। इसकी बजाय अगर शुरुआत कम आकार वाली लोकपाल व्यवस्था से की जाती और जैसे-जैसे लोगों की शिकायतें आती जातीं, वैसे-वैसे विस्तार दिया जाता, तो यह कार्यप्रणाली अधिक व्यावहारिक होती। अभी भी यह साफ नहीं है कि कब तक लोकपाल पूरी तरह से अपना काम करना आरंभ करेगा।
राजनीतिक दलों के भ्रष्टाचार पर जरा भी सहनशीलनता न रखने की लोकलुभावन घोषणाएं महज कागज़ों पर ही हैं। भारत ने आज की तारीख तक भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए कोई राष्ट्रीय नीति नहीं अपनाई है। जब लोकपाल कानून पारित हुआ था तो उम्मीद की गई थी कि राज्य सरकारें भी अपने-अपने यहां एक निश्चित समय सीमा में लोकायुक्त विधेयक पारित करेंगी। लेकिन स्वायत्तता और संघीय ढांचे के सिद्धांतों को बचाने के नाम पर राज्य सरकारों ने अपने कदम इस ओर खींचकर रखे हैं। जबकि अंतर-राज्यीय परिषद की बैठकों में लोकायुक्त संबंधी विषयों को उठाकर, इस पर एक राष्ट्रीय नीति बनाई जानी चाहिए थी। परंतु इस विषय को राष्ट्रीय एवं राज्यस्तर पर दरकिनार कर किया जाता रहा है।
मैंने अपनी पुस्तक ‘गुड गवर्नेंस नेवर ऑन इंडियास राडार’ (सुशासन कभी भारत की सोच में नहीं) में भ्रष्टाचार से लड़ाई लड़ने हेतु 26 सूत्रीय संहिता सुझाई है। इसमें वृहद विषयों पर संवैधानिक संशोधनों से लेकर विधायिका और कार्यपालिका के कामकाज में बदलाव सुझाए हैं। इस तरह की बहुमुखी योजना पर समयबद्ध क्रियान्वयन तभी व्यावहारिक हो पाएगा जब केंद्रीय एवं राज्य सरकारें एक साथ मिलकर काम करें। प्रधानमंत्री पद संभालते ही नरेंद्र मोदी ने ‘छोटी सरकार-प्रशासन असरदार’ बनाने के अपने महत्वपूर्ण ध्येय का ऐलान किया था। ऐसे किसी कार्यक्रम में भ्रष्टाचार उन्मूलन एक अभिन्न अंग होना चाहिए। सूचना के अधिकार पर सरकार की प्रतिबद्धता पर संशय दिखाई दे रहे हैं।
वहीं ज्यादातर राज्यों में भ्रष्टाचार उन्मूलन की प्रक्रिया पर काम शुरू तक नहीं हो पाया है। कराधान, पुलिस और शहरी विकास विभाग में भ्रष्टाचार की संभावना सबसे ज्यादा होती है। इनके अलावा सामाजिक भलाई, बाल-भलाई एवं जनजातीय विकास भलाई विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की खबरें पढ़ना खासतौर पर दुखदायी है क्योंकि वंचित वर्ग की भलाई के लिए दिया जाने वाला अधिकांश धन बीच रास्ते में हड़प लिया जाता है। एक तो मदद राशि पहले ही बहुत कम है तिस पर यह भी पूरी तरह पात्रों तक नहीं पहुंच पाती है।
उपरोक्त वर्णित विभागों में अपने काम के सिलसिले में जो लोग आते हैं उनसे बाहर आते वक्त समय-समय पर सर्वे के जरिए उन कारकों की शिनाख्त की जानी चाहिए, जिसकी वजह से उनके काम अंदर अटकते पाए जाते हैं। हालांकि पुरानी पड़ चुकी दफ्तरी कार्यपद्धति, अव्यव्यस्थित कार्यशैली, निर्णय लेने से पहले तफ्तीश-पर-तफ्तीश वाली प्रक्रिया से लोगों को पेश आने वाली मुश्किलें सर्वविदित हैं। राज्यों में पंजीकरण दफ्तरों का कंप्यूटरीकरण करने का बहुत ढिंढोरा पीटा गया है लेकिन तथ्य जांच से रहस्योद्घाटन होता है कि उच्च तकनीक और कंप्यूटरीकरण किए जाने के बावजूद जहां कहीं प्रक्रिया में मानव की सहूलियत होती है, वहीं पर वह मौकापरस्ती से फौरी पैसा बना लेता है। कार्यप्रणाली में इस तरह की मानवजन्य उपस्थिति की आखिर जरूरत क्या है? विभागों में भी कार्यपद्धति और कार्यशैली की पूर्ण समीक्षा करते हुए प्रार्थी के साथ बरतने में मानव संचालित खिड़की वाली व्यवस्था हटा दी जाए और इस कार्य को पहली तरजीह दी जाए। अफसोस कि पिछले तमाम समय में प्रशासनिक और राजनीतिक इच्छाशक्ति में कमी की वजह से इस ध्येय को जान-बूझकर हाशिए पर डाले रखा गया है।
लेखक केंद्र में गृह सचिव और
न्याय विभाग के सचिव रहे हैं।
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