कानूनी आधार का प्रश्न
दंगइयों के होर्डिंग्स लगाने का विवाद
बीते दिसंबर में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हुई हिंसा व आगजनी में शामिल लोगों के फोटो व पते वाले होर्डिंग्स चौराहों पर लगाने का विवाद इलाहाबाद हाईकोर्ट होता हुआ सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए योगी सरकार से 16 मार्च तक ऐसे होर्डिंग्स हटाने को कहा था, जिसमें 57 आरोपियों के फोटो व पते दर्ज थे। हाईकोर्ट ने इसे व्यक्ति की निजता का हनन बताया था, जिससे आरोपियों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। योगी सरकार ने इस फैसले के क्रियान्वयन के बजाय सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट की वेकेशन बेंच ने मामले की सुनवायी के दौरान योगी सरकार से पूछा कि किस कानून के तहत लखनऊ में आरोपियों के नाम-पते वाले होर्डिंग्स लगाये गये। अब तक ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो इस कार्रवाई की इजाजत देता हो। अदालत ने मामले को बड़ी बेंच को हस्तांतरित किया है। इसी बीच योगी सरकार की कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बीच एक नया अध्यादेश पारित किया है। इसके तहत सार्वजनिक व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों से हर्जाना वसूलने का नियम बनाने का फैसला किया है। जहां एक ओर कुछ लोगों ने इस अध्यादेश का समर्थन किया है, वहीं कुछ लोगों ने इस कदम को असंवैधानिक बताया है। वे लोग इसे नागरिकों की निजता में दखल बताते हैं और संविधान के अनुच्छेद-21 का उल्लंघन कहते हैं। ऐसे में सवाल उठाये जा रहे हैं कि जब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रही है तो अध्यादेश लाने का औचित्य क्या है और उसकी वैधानिकता क्या है। सत्ता पक्ष की ओर से कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि किस कानून के तहत कार्रवाई हुई, इसीिलए कानून लाया जा रहा है। सरकार अध्यादेश को अमल में लाने वाले नियम बना रही है।
कानून के जानकार सवाल उठा रहे हैं कि क्या किसी अध्यादेश के तहत ऐसे कदम उठाये जा सकते हैं, जिनसे संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन होता हो? ऐसे में किसी व्यक्ति की निजी जानकारी सार्वजनिक करके उसकी निजता व सुरक्षा को खतरे में नहीं डाला जा सकता है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने गाहे-बगाहे सरकारों को नसीहत दी है कि हिंसा के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाने वाले लोगों से वसूली के दौरान कायदे-कानूनों का पालन किया जाना जरूरी है। इसके मायने यह भी हैं कि किसी पक्ष या व्यक्ति को यह महसूस न हो कि उसके साथ ज्यादती हुई है। आमतौर पर ऐसी हिंसा राजनीतिक या संाप्रदायिक ध्रुवीकरण के बाद सामने आती है। ऐसे में किसी पक्ष को ऐसा महसूस भी नहीं होना चाहिए कि उसके खिलाफ वसूली की कार्रवाई किसी राजनीतिक दुराग्रह या जाति-धर्म के द्वेष के वशीभूत होकर की गई है। कमोबेश इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जब उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को राजधर्म की याद दिलायी तो उसका मकसद शीर्ष अदालत द्वारा निर्धारित मापदंडों के अनुपालन की ओर ही ध्यान दिलाना था। ऐसे में सीएए के खिलाफ लखनऊ में भड़की हिंसा में कथित रूप से शामिल लोगों के पोस्टर सार्वजनिक रूप से लगाने का एक पक्ष द्वारा मुखर विरोध किया जा रहा था। उनकी दलील थी कि यह व्यक्ति के मौलिक अधिकारों व प्रतिष्ठा का हनन है। कहना कठिन है कि पुलिस की जानकारी कितनी सटीक थी। फिर अदालत द्वारा ऐसे व्यक्तियों को दोषी भी नहीं पाया गया है। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने योगी सरकार से पूछा था कि क्या वसूली के लिये दी गई अवधि खत्म हो गई है, जो सार्वजनिक रूप से उनके पोस्टर लगाये गये हैं। नि:संदेह, दंगों के दौरान सार्वजनिक व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाना चाहिए। मगर इसके लिये संविधान व कानून के प्रावधानों का अनुपालन किया जाना भी बेहद जरूरी है।
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