घर का आंगन सूना है उसके बिना
विश्व गौरैया दिवस 20 मार्च
ज्ञाानेन्द्र रावत
मानवीय जीवन की करीबी गौरैया अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। हमारी बदलती जीवनशैली से उनके रहने की जगह नष्ट हो गई है, जिसने गौरैया को हमसे दूर करने में अहम भूमिका निभाई है। ग्रामीण अंचलों में आज भी उसके दर्शन हो पाते हैं लेकिन महानगरों में उसके दर्शन दुर्लभ हैं, जिसमें बहुमंजिली इमारतें बड़ी वजह है। कारण गौरैया 20 मीटर से अधिक ऊंची उड़ ही नहीं पाती। बीते बीस सालों से प्रति वर्ष दो हजार से अधिक गौरैया के घोंसले बंटवाने वाले पर्यावरणविद् सुबोध नंदन शर्मा का कहना है कि अब घोंसलों में गौरैया नहीं, बल्कि और अन्य चिड़िया अपना बसेरा बना रही हैं। खुद को परिस्थितियों के अनुकूल बना लेने वाली गौरैया की तादाद आज भारत ही नहीं यूरोपीय देशों में भी तेजी से घट रही है। नीदरलैंड में तो इसे दुर्लभ प्रजाति की श्रेणी में रखा गया है।
गौरैया की घटती तादाद के पीछे खेतों में कीटनाशकों का छिड़काव भी प्रमुख कारण है। इससे खेतों में छोटे-पतले कीट, जिन्हें आम भाषा में सुण्डी कहते हैं, जिन्हें गौरैया जन्म के समय अपने बच्चों को खिलाती है, वह अब उसे नहीं मिल पाते हैं। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी से सम्बद्ध रहे विख्यात पक्षी वैज्ञानिक आर.जे. रंजीत डैनियल के अनुसार गौरैया धूल स्नान करती है। वह शाम को सोने से पहले जमीन में एक गड्ढा खोदकर उसमें धूल से नहाती है। इससे उसके पंख साफ रहते हैं और उनमें रहने वाले कीट परजीवी मर जाते हैं। कंक्रीटीकरण के चलते शहरों में उसे धूल नहीं मिल पाती। उसे शहरों में भोजन आसानी से नहीं मिल पाता, न वह आधुनिक किस्म के मकानों में घोंसले बना पाती है। शहरों में बने मकानों में उसे भोजन ढूंढ़ना बहुत मुश्किल होता है। शहरों में मिट्टी की ऊपरी सतह, जिसमें नरम शरीर वाले कीड़े रहते हैं, मलबे, कंक्रीट और डामर से ढंकी होने के कारण उसे नहीं मिल पाते। फिर गौरैया शहरों से दूर हो गई है।
आज गौरैया के बिना घर का आंगन सूना है। असलियत में भारत, यूरोप, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और कई अमेरिकी देशों में पायी जाने वाली गौरैया अब कस्बों और गांवों से भी लुप्त हो चुकी है। हमारी घरेलू गौरैया यूरेशिया में पायी जाने वाली गौरैया से काफी मिलती है। तकरीबन 4.5 इंच से 7 इंच लम्बी और 13.4 ग्राम से 42 ग्राम के करीब वजन वाली घरेलू गौरैया कार्डेटा संघ की चिड़िया है। इसका रंग भूरा-ग्रे, पूंछ छोटी और चोंच मजबूत होती है। विडम्बना है कि गौरैया से संबंधित सरकार के पास कोई जानकारी नहीं है। यूरोप में पक्षियों की संख्या की जानकारी के लिए एक पूरा तंत्र मौजूद है।
भारतीय उपमहाद्वीप में हाउस स्पैरो, स्पेनिश स्पैरो, सिंध स्पैरो, डेड सी या अफगान स्क्रब स्पैरो, ट्री स्पैरो या यूरेशियन स्पैरो और रसेट या सिनेमन स्पैरो ये छह प्रजातियां पायी जाती हैं। घरेलू गौरैया को छोड़कर अन्य सभी उप कटिबंधीय और समशीतोष्ण क्षेत्रों में पायी जाती हैं।
देश में दिन-ब-दिन बढ़ती टाॅवर संस्कृति और पर्यावरण प्रदूषण के कारण भी इनकी संख्या कम हो रही है। मोबाइल टॉवरों के विकिरण के कुप्रभाव से गौरैया के मस्तिष्क और उनकी प्रजनन क्षमता पर घातक असर पड़ा है। साथ ही वे दिशा भ्रम की शिकार होती हैं सो अलग। दरअसल अनलेडैड पेट्रोल के जलने से बनने वाले मिथाइल नाइट्रेट नाम के बेहद जहरीले यौगिक से छोटे-मोटे कीड़े-मकौड़े खत्म हो जाते हैं। ये गौरैया को बेहद प्रिय हैं, जिन्हें वह बड़े चाव से खाती है। जब वे ही उसे खाने को नहीं मिलेंगे तो वह जियेगी कैसे।
सच यह है कि अक्सर घर-परिवारों के आस-पास रहना पसंद करने वाली गौरैया के लिए आज बढ़ते शहरीकरण और मनुष्य की बदलती जीवनशैली में कोई जगह रह ही नहीं गई है। आज व्यक्ति के पास इतना समय ही नहीं है कि वह अपनी छतों पर कुछ जगह ऐसी खुली छोड़े जहां वे अपने घोंसले बना सकें। वह इतना ही करें कि नालियों, डस्टबिन व सिंक में बचे हुए अन्न के दानों को बहने देने से बचाये और उनको छत पर खुली जगह पर डाल दे ताकि उनसे गौरैया अपनी भूख मिटा सके। यही कारण है कि आज उसके भूखों मरने की नौबत आ गई है।
आज सरकार में एेसा कोई नेता नहीं है जो पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशील हो और उनके बारे में कुछ जानकारियां रखता हो। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक बार भरतपुर प्रवास के दौरान केवलादेव पक्षी विहार में तकरीब 80 चिड़ियों को उनके नाम से पहचान कर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया था। केवल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाने से कुछ नहीं होने वाला। ‘हैल्प हाउस स्पैरा’ के नाम से समूचे विश्व में चलाये अभियान में सरकार का नकारात्मक रवैया चिंतनीय है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली का तो यह राजकीय पक्षी है। दुख यह है कि इस बारे में सब मौन हैं। इन हालातों में गौरैया आने वाले समय में किताबों में ही रह जायेंगी, इसमें दो राय नहीं।
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