तिरछी नज़र

अंशुमाली रस्तोगी

आखिर वही हुआ न जिसका ‘डर’ था! कोरोना वायरस के कहर ने दलाल पथ पर बमचक मचा ही दी। लुढ़क-लुढ़ककर सेंसेक्स ने निवेशकों के करोड़ों रुपये स्वाहा कर दिए। वैसे, अपना सेंसेक्स ठीक-ठाक ही चल रहा था। बीच-बीच में जरा-बहुत झटके आ जाते थे तो खुद को संभाल लेता था। लेकिन कोरोना का करंट तो एक ही दिन में विकट झटका दे गया।
बेचारे सेंसेक्स को कितना कुछ ‘झेलना’ पड़ता है। कितना भार है उसके कंधों पर। एक कंधे पर अर्थव्यवस्था टिकी है तो दूसरे कंधे पर निवेशकों की उम्मीदें। और ये सब कुछ उसे ही देखना है। मगर ‘संवेदनशील’ भी वो कम नहीं। जरा कहीं किसी को छींक भी आ जाए तो तुरंत ‘ढह’ पड़ता है।
चीन के प्रति दीवानगी भी दुनिया की कुछ कम न थी। दिन-रात चीन-चीन ही करते थे। मोबाइल से लेकर खाने-पीने तक चीन की बनी हुई इस्तेमाल करते हैं। और जब कोरोना जैसा भयंकर वायरस चपेट में ले लेता है, तब चीन को गरियाते हैं। दुनियाभर में चीन ने ऐसा असर कायम किया है कि लोग पगलाए रहते हैं उसके इश्क में। बदले में उसने कोरोना का झुनझुना दे दिया है, अब बजाते रहो हर पल।
हम भी कहां कुछ कम हैं। हमें भी खाने से लेकर सोने तक में बस चीन ही चीन चाहिए। एक तरफ राग ‘मेक इन इंडिया’ का अलापते हैं, दूसरी तरफ ‘मेड इन चाइना’ को जेब में रख मुस्कुराते हैं।
सेंसेक्स का यों बैठे-ठाले लुढ़कना मुझे अच्छा नहीं लगता। दिल में बड़ी तकलीफ-सी होती है। जैसे-तैसे कर शेयर्स की वैल्यू कुछ बढ़ती है फिर बीच में ऐसा भूचाल आ जाता है कि सब मिट्टी में मिला देता है। एक तो हमारा सेंसेक्स भी न हर अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे या बीमारी का लोड खुद पर ले लेता है। जबकि कोरोना से भारतीय शेयर बाजार को भला क्या मतलब! यह चीन का वायरस है, चीन ही निपटे इससे। मगर नहीं, सेंसेक्स को तो हर बात में अपनी दखल देने की आदत है न। जब टांग टूट जाती है, तब रोता है, पछताता है। लेकिन पछताने से क्या होता है, जब चिड़िया चुग गई खेत।
दलाल पथ पर बिखरी ‘उदासी’ देखकर कलेजा मुंह को आता है। इसे ऐसा नहीं होना चाहिए था। यह जगह तो हर वक्त गुलजार रहनी चाहिए। अंटी में दो पैसे बढ़ते हैं तो सुकून मिलता है। सेंसेक्स को सिर्फ भारतीय निवेशकों पर निगाह रखनी चाहिए। उनकी ही बेहतरी के लिए चढ़ते-बढ़ते रहना चाहिए। वो चलेगा तो अर्थव्यवस्था भी चलेगी और देश भी। कोरोना-फोरोना तो बेकार के वायरस हैं। इन्हें चीन में ही बना रहने दें तो अच्छा। कोरोना के चक्कर में आकर अपनी हालत क्यों पतली की जाए! दिल बैठ जाता है हमारा। पॉजिटिविटी का दामन न छोड़ें बस।

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