सीताराम गुप्ता

यदि केवल अच्छे संबंधों की अधिकता हो तो जीवन कितना सुगम, सरल व संपन्न हो जाए लेकिन ऐसा होता नहीं है। संबंध बनते-बिगड़ते रहते हैं। संबंधों के विघटन की पीड़ा विशेष रूप से महत्वपूर्ण आत्मीय संबंधों के विघटन की पीड़ा बहुत दुखदायी होती है। इससे जीवन रूपी नौका का संतुलन डगमगाना स्वाभाविक है। वर्तमान संबंधों को अक्षुण्ण बनाए रखने व नए संबंध विकसित करने के साथ-साथ टूटे हुए अथवा तनावपूर्ण संबंधों को सुधारने के प्रयासों में कभी कमी नहीं आने देनी चाहिए। संबंध अनमोल होते हैं।
किंत्सुगी अथवा किंत्सुकुरोई टूटे हुए सिरेमिक अथवा कांच के पात्रों को स्वर्ण, रजत अथवा प्लेटिनम मिश्रित लैकर से जोड़ने की एक सदियों पुरानी कला अथवा शैली है, जिसका विकास पंद्रहवीं सदी में जापान में हुआ था। जब किसी बहुमूल्य पात्र अथवा कलाकृति में दरार आती है या वह टूट जाती है तो उसे न तो रखना ही अच्छा लगता है और न एकदम से फेंकना ही संभव हो पाता है। हमारे यहां टूटे हुए पात्रों अथवा कलाकृतियों को रखना अत्यंत अशुभ माना जाता है। देव प्रतिमाएं खंडित होने पर उनकी पूजा नहीं की जाती अपितु उन्हें जल में प्रवाहित कर दिया जाता है। इस मामले में जापानियों का दृष्टिकोण हमसे भिन्न है। वे अपूर्णता में भी सौंदर्य खोज लेते हैं। जब हम स्क्रैप से सुंदर कलाकृतियां बना सकते हैं तो सुंदर कलाकृतियों के टूट जाने पर उनकी मरम्मत क्यों नहीं कर सकते? जब हमारे शरीर के किसी अंग में चोट लग जाती है तो हम उसका उपचार करते हैं। तभी शरीर स्वस्थ रहता है। समाज को स्वस्थ रखने के लिए भी संबंधों के उपचार की आवश्यकता होती है।
किंत्सुगी का विकास वास्तव में इसी समस्या के कलात्मक उपचार के लिए हुआ था। इसके लिए अत्यंत सावधानी व कलात्मकता अनिवार्य है। इसमें पुनर्सृजन करना पड़ता है। किसी चीज़ का निर्माण सरल होता है लेकिन बिगड़ जाने पर उसका सुधार करना अत्यंत कठिन होता है। आज यूज़ एंड थ्रो संस्कृति के चलते हमने दुनिया को एक कूड़ेघर में परिवर्तित कर दिया है। इसी संस्कृति के प्रभाव के कारण हमने समाज को संबंधों का कूड़ाघर बना डाला है। हम स्वयं उस कूड़े-कचरे के ढेर के एक हिस्से से अधिक नहीं रह गए हैं। हम संबंधों को जीने की बजाय उन्हें ढोते रहते हैं। इस पर विचार करने की आवश्यकता है। हम अपने संबंधों को सुधारकर, उन्हें गरिमा व अर्थवत्ता प्रदान कर अपने जीवन को अत्यंत सहज व सार्थक बना सकते हैं। संबंधों के निर्वहन में हमसे जो चूक हुई व उसका जो प्रभाव पड़ा, उसे स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए।
यदि हम पुराने बिगड़े हुए संबंधों का नवीनीकरण कर पाते हैं तो ये हमारी कमज़ोरी नहीं, ताकत होगी। किंत्सुगी नामक इस कला के विकास के पीछे महत्वपूर्ण जापानी दर्शन कार्य करता है। वह दर्शन है अपूर्णता में सौंदर्य देखना, किसी चीज़ के व्यर्थ जाने पर दुख होना व परिवर्तन को स्वीकार करना। टूटा हुआ नए से बेहतर हो सकता है अगर उसे ठीक से जोड़ा जाए। जिस प्रकार से किंत्सुगी कार्य के लिए एक कलाकार की ज़रूरत होती है, उसी प्रकार से रिश्तों को सुधारने के लिए हमें कलाकार होना पड़ता है। एक ऐसा कलाकार जिसकी दृष्टि व्यापक हो। जो दूसरों में कमी नहीं, सौंदर्य को खोज सके। दूसरों में कमियां खोजने का कार्य तो हम सब कर सकते हैं लेकिन ख़राब से ख़राब व्यक्ति में गुण खोजने का कार्य एक कलाकार ही कर सकता है।
टूटे हुए पात्रों की मरम्मत करते समय हम उन्हें प्रायः इस प्रकार से जोड़ने का प्रयास करते हैं कि जोड़ दिखलाई न पड़े और वो नए जैसा ही दिखलाई पड़े। लेकिन इसमें दुराव-छिपाव का भाव निहित है। हम सच्चाई से भाग रहे हैं। हममें यथार्थबोध व सौंदर्यबोध नहीं है। हम वास्तविकता को स्वीकार करना नहीं चाहते। टूटा हुआ पात्र जुड़ने के बाद नए जैसा दिखलाई पड़े, इसकी बजाय जोड़ों के बावजूद वह नए से बेहतर नज़र आए, इसमें ही वास्तविक कलात्मकता अथवा सौंदर्यबोध है। हम अपने बिगड़े हुए संबंधों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने व उनमें नया उत्साह पैदा करने के लिए किंत्सुगी की मदद ले सकते हैं। हमारी जिन ग़लतियों के कारण संबंध ख़राब हुए थे हम उन ग़लतियों के प्रति सचेत रहने लगते हैं। हमारे जीवन की दशा और दिशा दोनों ही बदल जाती हैं। एक माली भी बहुत अच्छा कलाकार होता है। वह सामान्य प्रजाति के पौधों में अच्छी प्रजाति के पौधों की कलमें जोड़कर उनसे अच्छे फल प्राप्त कर लेता है। यदि हम टूटी हुई वस्तुओं अथवा सामान्य प्रजाति के पौधों में अच्छी प्रजाति के पौधों की कलम लगाने की तरह बिगड़े हुए संबंधों में जोड़ लगाने और उसे स्वीकार करने की कला सीख लें तो हमारा जीवन भी सचमुच कलात्मक व अत्यंत आकर्षक हो जाए।

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