अलसाता बिखराता मौसम
शचीन्द्र आर्य
जैसे सर्दियों का यह काल गुलाबी-गुलाबी होता है, वैसे आती गर्मियां इसी रंग की क्यों नहीं होती। ठंड में दिमाग ठंडा रहता है और हरारत बढ़ते ही दिमाग का पारा देखने लायक होता है। एक गर्मी की दुपहरिया में पटेल नगर से लौट रहे थे बस में। बस तप रही थी। तारकोल की सड़क की तरह। उस पर दौड़ते हुए। अजीब तरह का रंग होता है सड़क का, उस पर पसरते मौसम का। जिसे देखने का मन नहीं करता। उसमे ज़रा रंग होता भी कम है। अमलतास का पीलापन नहीं। सरसों की बालियां भी नहीं। सिर्फ लाल। सेमर के पेड़ पर पत्ते नहीं होते। बस होते हैं लाल-लाल फूल जैसे। सर्दी के बाद मौसम खुलने लगता है। खिड़की खुलने लगी है। हफ्ताभर पहले जब पहली बार खिड़की खोली थी तब उस पर पर्दा लगा रखा था। अब वह भी नहीं। पर मच्छर इतनी जल्दी आ धमकेंगे सोचा न था।
दिल्ली तो चंडीगढ़ नहीं है। न अब हो सकता है। वरना यहां भी सड़क किनारे बोगनवेलिया के लाल नीले फूल खिलते। यहां फूलों का खिलना सरकारी बागों में ही होता है। या किसी की बालकनी में लगे गमलों में। आज तक सिर्फ इन लोगों को देखता ही आ रहा हूं। कभी रोक कर पूछा नहीं कि गुलाबी सफ़ेद पंखुड़ियों वाले फूल को क्या कहते हैं। मैं क्या कहूं। इसलिए आज तक कोई नाम उसे नहीं दे पाया हूं। जो मेरे दिल के करीब है उसका नाम मुझे मालूम है। फिरंगी पानी। दिन धीरे-धीरे बड़े होते जा रहे हैं और करने को जो भी काम हैं, उन्हें बराबर बांट नहीं पा रहा हूं। उधर लिखने की जो आदत अंधेरा होने के साथ बन गयी थी, उसे फिर से देखना होगा। वक़्त बढ़ गया लगता है। पर साथ आई है उबासी। अलसाई-सी शामें। बदलता रहता है समय। सुबह दूध लाते वक़्त पीपल के पत्ते पैर के नीचे पड़ते हैं। उससे पहले उजाला खिड़की से कमरे के अन्दर आ जाता है। तड़के कभी चार-वार बजे आंखों के साथ कान भी खुल जाते हैं तब पीछे रिज़ की तरफ से मोरों की बतकहियां सुनाई दे जाती हैं। जैसे अभी बरसात वाले बादल आने हो वाले हों। पर ऐसा कुछ नहीं होता। और फिर दोबारा लेट जाता हूं। जैसे दिन होते जा रहे हैं, उनमे देह टूटती-सी लगती है। सात बजे के बाद भी उठने का मन नहीं करता। पता नहीं क्यों। सुबहें सुबह की तरह पिछले कई सालों से नहीं रहीं। उनका ताज़ापन कहीं गुम है। हम भी पीले पत्तों की तरह मुरझाये से चेहरों के साथ रोज़ उठते हैं। उठाना पड़ता है। पर अभी भी कबूतरों की उस जोड़ी का इंतज़ार कर रहा हूं जो हर सुबह छज्जे से होते हुए कमरे में दाखिल होते थे। इधर अभी तक वह भी गायब हैं।
साभार : करनी चापकरन डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम
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