शिक्षित बेरोजगार बनाने वाली शिक्षा
कई साल पहले गांव में पड़ोस की चाची सामने बैठी थी। उनके चेहरे पर चिंता की रेखाएं थीं। शादी का माहौल था। हंसी मजाक था। वह हंसती भी थीं लेकिन हंसी में भी जैसे कोई निराशा दिखती थी। चाची सभी को बहुत खुशमिजाज लगती थी। उनके घर में जाओ तो न केवल प्यार से बिठाती थी बल्कि घर में जो कुछ भी बनाया होता, उसे बिना खाए-पिए न आने देती थीं।
गांव में कई साल बाद जाना हुआ था जब से माता-पिता नहीं रहे थे। गांव तभी जाना होता था, जब कोई शादी ब्याह हो, वरना तो गांव के घर से जैसे नाता-सा टूट गया था। जब बात आगे बढ़ी और उनके परिवार के बारे में होने लगी तो चाची एक-एक करके अपनी बेटियों के बारे में बताने लगी। तीन बेटियां। एक ने एम.ए., बी.एड. किया था। दूसरी ने बी.एससी., बी.एड. और तीसरी एम.ए., पी.एचडी. थी। लेकिन कोई भी लड़की कहीं नौकरी नहीं करती थी। गांव से बाहर दो कि.मी. के बाद शहर था। लेकिन इस छोटे शहर में न कोई उद्योग था, न बड़े दफ्तर। इसलिए न लड़कों को रोजगार था, न लड़कियों को। चाची का कहना था कि लड़कियां पढ़ने-लिखने में बहुत होशियार हैं। हमेशा वजीफा मिलता रहा है, लेकिन इतना पढ़-लिखकर घर में बैठी हैं। घर में ही बैठना था तो हमारी पीढ़ी ही क्या बुरी थी। कम से कम घर के सारे काम खुद करके सारे पैसे बचा लेती थी, जिन चीजों में आजकल के कमाऊ लड़के-लड़कियां ढेर-सा पैसा खर्च करते हैं। चाची की हां में हां आसपास बैठी दूसरी औरतें भी मिला रही थीं। सबके बाल-बच्चों की कथाएं एक जैसी थीं—बेरोजगारी की। पढ़ने-लिखने के बाद खाली बैठने की, निराशा और दुख की।
चाची ने एक महत्वपूर्ण बात और कही। कहने लगी कि लड़कियों को इसलिए भी पढ़ाया-लिखाया कि अच्छे घरों में इनके रिश्ते हो जाएंगे। मगर लड़कियों की पढ़ाई को देखते हुए इनसे ज्यादा पढ़े-लिखे लड़के ढूंढ़ने पड़ते हैं। पहले तो मिलते नहीं। मिलते हैं तो बहुत से बेरोजगार हैं। और रोजगार वालों की मांगें इतनी ज्यादा हैं कि पूरी करने की हैसियत नहीं। इसलिए न तो लड़कियों की शादी हुई है और न उनके पास कोई नौकरी ही है। और उम्र है कि निकलती जा रही है। कम पढ़े-लिखे लड़के ढूंढ़ें तो पहले तो लड़कियां ही तैयार नहीं होतीं। अगर हो भी जाएं तो लड़के नहीं मानते। वे कहते हैं कि अपने से ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की लाएंगे तो उनकी पूछ क्या रहेगी। वैसे दहेज की मांग इनकी भी कोई कम नहीं होती।
सोचने लगी, हम सब लगाते रहें दहेज के खिलाफ नारे, मगर सच्चाई यह है कि बिना दहेज के आज भी कोई शादी मुश्किल से ही होती है। इसीलिए जब कोई ऐसी शादी होती है तो वह खबर बन जाती है। ये सारी बातें एक शादी के दौरान हो रही थीं, इसलिए और भी परेशानी पैदा कर रही थीं। जिन माता-पिता के बच्चे बेरोजगार हैं और जिनकी शादी भी नहीं हुई, ऐसे वक्त में उनका दुख उभर आना स्वाभाविक भी था।
इन सब महिलाओं की बात सुनकर लगने लगा कि वाकई क्या मात्र यह कहने से कि सब पढ़ें-लिखें, समस्याएं हल हो सकती हैं। अगर आदमी पढ़-लिख जाए तो आगे क्या हो। यह बात भी सच है कि पढ़ने के बाद गांव के बच्चे अपने खेतों में काम नहीं करना चाहते। अपनी शिक्षा की एक खास मुश्किल यह है कि वह पढ़ने के बाद नौकरी का मतलब मेज-कुर्सी पर बैठने वाले यानी कि बाबू वर्ग का निर्माण मानती है। शारीरिक श्रम के प्रति शिक्षा नफरत क्यों सिखाती है। लोग शारीरिक श्रम को भी छोटा मानने लगते हैं। जिम में जाकर वजन घटाने की तरकीबें निकाली जा सकती हैं, मगर अपने ही खेतों को जोतने-बोने के लिए बाहरी मजदूर चाहिए। ये बातें सिर्फ किताबी ही क्यों हों और अमल में कभी न लाई जाएं कि कोई काम छोटा नहीं होता।
हाल ही में ग्रामीण शिक्षा के बारे में एक रिपोर्ट जारी की गई है। इसे चौबीस राज्यों के छब्बीस जिलों के आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया था। एक हजार पांच सौ चौदह गांवों के तीस हजार चार सौ पचीस घरों के, छत्तीस हजार नौ सौ तीस बच्चों से बात की गई थी। इनकी उम्र चार साल से आठ साल के बीच थी। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि चार से आठ साल तक के लगभग नब्बे प्रतिशत बच्चे स्कूल जा रहे हैं। उम्र के साथ यह संख्या बढ़ते भी देखी गई। जैसे कि बहुत-सी जगहों पर आठ साल के साढ़े निन्यानवे प्रतिशत बच्चे स्कूल जा रहे हैं। चार से पांच साल की उम्र के बच्चों में लड़कियों की संख्या 56.8 प्रतिशत है। जबकि लड़के 50.4 प्रतिशत हैं। छह से आठ साल की उम्र के बच्चों में लड़कियां 61.1 प्रतिशत और लड़के 52.1 प्रतिशत हैं। यानी कि लड़कों के मुकाबले अधिक संख्या में लड़कियां स्कूल जा रही हैं। 2001 की जनगणना में ही बताया गया था कि गांवों में लोग अपनी लड़कियों को पढ़ाना चाहते हैं। और सिर्फ पढ़ाना ही नहीं, उन्हें आत्मनिर्भर भी बनाना चाहते हैं।
इन आंकड़ों को देख रही हूं तो ऊपर चाची से हुई जो बातें लिखी हैं, वे रह-रहकर याद आ रही हैं। लड़कियां या लड़के पढ़-लिख जाएं तो रोजगार के लिए उन्हें अक्सर बड़े शहरों का मुंह देखना पड़ता है। क्यों उनके अपने शहरों, गांवों के आसपास रोजगार नहीं मिल सकते। सिर्फ पढ़ाने से समस्याएं हल नहीं होतीं। उसके बाद के रास्ते भी बनाने पड़ते हैं। यदि रोजगार वहीं हों, जहां हमारा घर-गांव हैं तो शहरों पर बढ़ती आबादी के बोझ को रोका जा सकता है। विस्थापन और उससे होने वाली परेशानियां कम हो सकती हैं।
यही नहीं, पढ़ने वाले बच्चों को नए सिरे से यह सिखाने की जरूरत भी है कि वे चाहें तो अपने खेतों से ही सोना उगा सकते हैं। जिस चार, छह हजार की नौकरी को करने शहर जाएंगे, उसके मुकाबले अगर अपने खेतों पर ध्यान दें तो तकदीर बदल सकती है। किसान की शिक्षा उसकी खेती क्यारी के काम भी आ सकती है, यह अक्सर नहीं बताया जाता। लड़कियों को भी ऑनलाइन रोजगारों के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए। जिससे बाहर अगर कुछ न भी मिले तो वे घर बैठे ही अपनी आय के बहुत से साधन जुटा सकें।
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।
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