गणतंत्र के लिए हमारे संकल्प
जन संसद
तब लौटेगी गरिमा
हमें केवल अधिकारों के प्रति उन्मुख न होकर अपने नैतिक दायित्वों व कर्तव्यों की पालना पर भी ध्यान देना चाहिए। भ्रष्टाचार से दूर रहकर देश में शिक्षा, चिकित्सा, आवास, पेयजल तथा ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में सुधार हेतु एक सुदृढ़ संकल्पशक्ति का परिचय देते हुए अग्रसर होना चाहिए। हमारे संकल्प गणतंत्र की सौम्यता और सुरक्षा की दिशा में सादगी और शिष्टता की भावनाओं से परिपूर्ण होने चाहिए। ‘मैं बदलूंगा तो मेरा देश बदलेगा’ प्रत्येक जन की इसी तरह की सोच ही गणतंत्र की गरिमा लौटा सकती है।
देवेन्द्रराज सुथार, जालोर, राजस्थान
संकल्प का वक्त
भारतीय नागरिक मौलिक अधिकारों के प्रति जागरूक हैं लेकिन मौलिक कर्तव्यों के प्रति अशिक्षित और असंवेदनशील है। संविधान की पालना, राष्ट्र की रक्षा, सार्वजनिक सम्पत्ति की सुरक्षा इत्यादि हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य है। विडंबना यह है कि अधिकांश नागरिक मौलिक कर्तव्यों से अवगत नहीं है। सरकार को एक राष्ट्रीय मुहिम चलाकर सभी नागरिकों को मौलिक कर्तव्यों से अवगत कराना चाहिए। आज हर क्षेत्र में राष्ट्र के अपेक्षित विकास के लिए मौलिक कर्तव्यों का संकल्प लेना समय की आवश्यकता है।
सुखबीर तंवर, गढ़ी नत्थे खां, गुरुग्राम
मौलिक कर्तव्य भी
अब तक ‘गण’ का ‘तंत्र’ से और ‘तंत्र’ का ‘गण’ से जो अटूट और अटल रिश्ता था, कमोबेश दरक रहा है। संविधान की प्रस्तावना में ‘हम भारत के लोग’ उसी को लेकर आज सबसे ज्यादा बवाल मचा है। आजादी की व्याख्या लोगबाग अपने-अपने ढंग से कर रहे हैं। वे भूल रहे हैं कि संवैधानिक आजादी के साथ-साथ संवैधानिक कर्तव्यों का भी प्रावधान है। कुछ नए कानूनों को लेकर समाज का एक वर्ग व्याकुल है तो वह दुहाई तो संविधान बचाने की दे रहा है, लेकिन गाहे-बगाहे उसकी हरकतें संवैधानिक नियम-कानून की धज्जियां उड़ाने वाली हैं। मौलिक कर्तव्यों से क्यों अनभिज्ञ हो जाते हैं?
हर्ष वर्द्धन, कदमकुआं, पटना
समरसता का भारत
संविधान की शुरुआत ही ‘हम भारत के लोग, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए…’ शब्दों से हुई है। आज संविधान में उल्लिखित बातों के ठीक विपरीत समाज को बांटने का प्रयास किया जा रहा है। जिससे देश को जिस प्रगति के रास्ते पर बढ़ना चाहिए, उसके ठीक विपरीत देश जा रहा है। ये बातें देश अौर समाज के लिए बहुत ही घातक हैं। हमें इन सांप्रदायिक शक्तियों से लड़कर, उन्हें परास्त करके, देश में अमनचैन, भाईचारा, सहयोग, मिलजुलकर रहने की गंगा-जमुनी संस्कृति को पुनः विकसित करनी ही होगी।
निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उ.प्र.
दायित्व निभाएं
भारतीय गणतंत्र की सात दशक की यात्रा में निश्चित रूप से देश के नागरिकों ने संविधान में वर्णित मौलिक कर्तव्यों का निर्वहन समय, काल एवं परिस्थितियों के मद्देनजर ईमानदारी के साथ किया है। गणतंत्र को समृद्ध करने के लिए चाहिए कि हम संविधान में वर्णित समस्त मौलिक कर्तव्यों का वर्तमान के साथ ही भविष्य में भी अनुपालन सुनिश्चित करें। संविधान के आदर्शों व उसके प्रतिमानों से हटकर चलकर हम अपने राष्ट्र को उन्नति के पथ पर अग्रसर नहीं कर सकते। इसलिए सदैव इसका संरक्षण करें। यह तभी संभव हो पायेगा जब हम ईमानदारी से कार्य करेंगे।
सुनील महला, पटियाला, पंजाब
जागरूक करें
आज मौलिक अधिकारों के हनन की बात तो व्यक्ति करता है लेकिन कोई बुद्धिजीवी वर्ग, समाजसेवी और रंग-कर्मी कर्तव्यों की बात नहीं करता। नि:संदेह मौलिक अधिकारों की तरह ही हमारे मौलिक कर्तव्य भी हैं। हम अपने मौलिक अधिकार के लिए तो जागरूक हैं लेकिन जब कर्तव्यों की बात आती है तो पीछे हट जाते हैं। आज लोकतंत्र तमाम चुनौतियों से दो-चार हो रहा है, इसका कारण हमारे द्वारा कर्तव्यों का पालन नहीं हो रहा है या उससे अनभिज्ञ हैं। इसलिए कर्तव्यों के लिए आमजन को जागरूक करने की जरूरत है।
नरेश कुमार सचदेवा, सोनीपत
पुरस्कृत पत्र
कर्तव्य बोध हो
आज के दौर में जो माहौल बना हुआ है और संविधान की दुहाई देकर मौलिक अधिकारों की बात करते हैं, क्या उन्हें अपने कर्तव्यों का बोध है? अगर मौलिक कर्तव्य हैं तो उसका संबंध नागरिक दाियत्व से भी है। देश में जो भी राष्ट्रीय समस्याएं खड़ी हैं, उसके पीछे कर्तव्यों की अनदेख्ाी है। इसलिए देश के सभी नागरिकों को कर्तव्यों के बारे में जनसंचार माध्यम तथा साहित्य द्वारा जागरूक किया जाना चाहिए। उन्हें समझाना होगा कि संविधान केवल मौलिक अधिकारों तक सीमित नहीं है। हम स्वतंत्रता की आड़ में उच्छृंखलता को बढ़ावा न दें, अधिकार के साथ कर्तव्य निर्वहन की भी सोचें। हमारा यही संकल्प हमें समरसतामूलक समाज का प्रगतिशील हिस्सा बनायेगा।
देशबंधु, नयी दिल्ली
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