आसाड्ड तपंदा तिसु लगै…
7 जून को शहीदी दिवस
भीषण गरमी का महीना था। आग भी प्रचंड थी। आग पर रखा लोहे का तवा तप रहा था। लेकिन, जहांगीर के आदेश से उस तवे पर बैठाये गये श्री गुरु अर्जन देव जी शांत थे। उनके शरीर पर गरम रेत डाली गयी। अत्याचार की इंतेहा कर दी गयी, पर गुरु अर्जन देव जी परमात्मा के ध्यान में लीन रहे। शांत रहे।
जिस मौसम में धूप भी सहन करना मुश्किल हो, कोई आग पर शांत कैसे रह सकता है? इसका जवाब खुद गुरु अर्जन देव जी ने अपनी वाणी में दिया है। शहीदों के सरताज गुरु अर्जन देव जी ने कहा है-
आसाड्ड तपंदा तिसु लगै हरि नाहु न जिंना पासि।। जगजीवन पुरखु तिआगि कै माणस संदी आस… आसाड्ड सुहंदा तिसु लगै जिसु मनि हरि चरण निवास।।
सतगुरु जी ने फरमान किया, आषाढ़ का महीना भले ही अत्यंत गर्मी वाला है, लेकिन यह गरम उसे लगता है, जिसके पास परमात्मा का नाम नहीं है। यह उसको गरम लगता है, जिसने सारे विश्व के सृजनहार को छोड़कर मनुष्य पर आशा लगा रखी है। गुरु जी ने कहा कि प्रभु के बजाय किसी अन्य का सहारा चाहने या लेने में व्यर्थ का भटकाव है। यह गले में यम का फंदा पड़ने जैसा है। दूसरी तरफ, जीवन के आषाढ़ महीने में जिनको साधु अथवा सतगुरु का साक्षात्कार हो गया, वे प्रभु-दरबार में मुक्त हैं। इसलिए हे प्रभु, अपनी कृपा करना। मेरे मन में भी आपके दीदार की प्यास जग जाये। प्रभु यही प्रार्थना है कि मुझे सतगुरु से ज्ञात हो जाये कि आपके बिना कोई भी अन्य मेरा नहीं है। गुरु जी ने कहा, जिस मनुष्य के मन में प्रभु-चरणों का निवास है, उसको गरमी का आषाढ़ महीना भी सुखदायी लगता है।
परमात्मा के नाम, सुमिरन की महिमा बताते हुए गुरु अर्जन देव जी ने कहा, जिस प्रकार मिट्टी को पानी से चाहे कितनी भी बार धो लिया जाये, मगर उसका मैलापन नहीं जाता। यही दशा मानस की है। यानी इनसान के मन में जो मैल जमी हुई है, वो बाहरी स्नान-मात्र से उतरने वाली नहीं, केवल परमात्मा की कृपा द्वारा, उसका नाम-सिमरन करने से ही दूर हो सकती है। उन्होंने कहा, हे मेरे मन, सतगुरु की शरण में रह, क्योंकि सतगुरु की शरण में जाने से ही आनंद की प्राप्ति होती है।
गुर अर्जन विटहु कुरबाणी…
प्रो. नव संगीत सिंह
गुरु अर्जन देव जी (1563-1606) का बचपन बाबा बुड्ढा जी एवं दूसरे गुरुसिखों की रहनुमाई में बीता। उन्होंने सांसारिक विद्या के साथ-साथ बहुत से धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन भी किया। इस तरह उनका व्यक्तित्व महान विद्वान के रूप में उभरा। उन्होंने अपने पिता, गुरु रामदास जी की हर आज्ञा का पालन करते हुए अपना जीवन धर्म व मानवता को समर्पित कर दिया।
गुरु अर्जन देव जी के बड़े भाई पृथी चंद ने गुरु पद पाने की कई कोशिशें कीं, लेकिन गुरु रामदास जी ने अपने छोटे पुत्र अर्जन देव को ही गुरु गद्दी सौंपी।
गुरु अर्जन देव जी ने सिख धर्म के प्रचार, प्रसार के लिए अनेक कार्य किए। अमृतसर में सरोवर के बीच हरिमंदिर साहिब बनवाया। आदि ग्रंथ का संपादन करवाकर हरिमंदिर साहिब में प्रकाश करवाया। अमृतसर से 24 किलोमीटर की दूरी पर तरनतारन नाम का नगर बसाया और एक सरोवर तैयार करवाया। अपने पुत्र हरगोविंद के जन्म पर ब्यास नदी के किनारे एक सुंदर नगर बसाया, जिसका नाम हरगोविंदपुर रखा गया। 1593 में सतलुज एवं ब्यास के मध्य करतारपुर नाम के शहर का निर्माण करवाया।
श्री गुरु ग्रंथ साहिब में सबसे ज्यादा वाणी श्री गुरु अर्जन देव जी की ही है। उनकी वाणी में प्रभु प्रेम, गुरु की महिमा, नाम की महिमा, कर्म सिद्धांत, गुरमुखों की संगत, जगत रचना आदि का विस्तार मिलता है। प्रभु के निर्गुण एवं सगुण स्वरूप के बारे में उन्होंने सुखमनी साहिब में लिखा है- निरगुनु आपि सरगुन भी ओही। कला धारि जिनि सगली मोही।
गुरु अर्जन देव जी की शहादत पर भाई गुरदास जी ने कहा- रहिंदे गुरु दरियाओ विच मीन कुलीन हेत निरबाणी। दर्शन देख पतंग जियों ज्योति अंदर जोत समाणी… गुर अर्जन विटहु कुरबाणी।
यानी गुरु अर्जन देव जी सदा स्थिर रहने वाले प्रभु की ज्योति में ऐसे विलीन हो गये, जैसे दरिया में मछली। पतंगे की तरह ज्योति स्वरूप परमात्मा में विलीन हो गये। मुश्किल में भी गुरु जी का ध्यान शब्द में लीन रहा। ऐसे अद्भुत व्यक्तित्व वाले गुरु से मैं कुर्बान जाता हूं।
गुरु जी की प्रशंसा में विभिन्न भट्ट साहिब ने क्या खूब बयान किया है-
कलजुगि जहाजु अरजुनु गुरु। सगल सृष्टि लगि बितरहु।
जप्ओ जिनु अरजुन देव गुरु फिरि संकट जोनि गरभ न आयओ।
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