फूल चढ़े, पत्र चढ़े और चढ़े दुर्वा
दुर्गेश कुमार मिश्र
प्रत्येक देवी-देवता का अपना पसंदीदा पुष्प होता है, जिसे विधि-विधान के अनुसार उन पर श्रद्धा के साथ समर्पित किया जाता है। यह जान लेना आवश्यक है कि कौन सा पुष्प किस देवता को चढ़ाया जाना चाहिए। ऐसे पुष्प-पत्र भगवान पर नहीं चढ़ाए जाते, जो अपवित्र बर्तन या स्थान पर रखे गए हों। कीड़े लगे, जमीन पर गिरे, अनखिले, कली एवं सड़े-गले या बासी पुष्प भी निषिद्ध माने जाते हैं। कुम्हलाया हुआ, नाक से सूंघा हुआ, अंग से स्पर्श किया हुआ या किसी अन्य देवता पर पहले चढ़ाया गया पुष्प भी पूजा में निषिद्ध माना जाता है।
श्रीगणेश : वैसे तो गणेशजी को सभी पत्र एवं पुष्प चढ़ाये जा सकते हैं, लेकिन पद्मपुराण, आचार्यरत्न एवं कार्तिक महात्म्य के अनुसार गणपति पर तुलसी पत्र कभी नहीं चढ़ाना चाहिए। गणेशपुराण में बताया गया है कि इनकी पूजा में सफेद या हरी दुर्वा अवश्य चढ़ानी चाहिए। दुर्वा तोड़ते समय ध्यान रखना चाहिए कि इसके ऊपरी हिस्से पर तीन या पांच पत्तियां अवश्य हों।
भगवान शिव : वीरमित्रोदय में बताया गया है कि सर्वगुण सम्पन्न किसी ब्राह्मण को स्वर्ण मुद्राएं दान करने पर जो पुण्य अर्जित होता है, वह भगवान शिव पर सौ पुष्प चढ़ा देने मात्र से प्राप्त हो जाता है। इन पर केतकी एवं केवड़ा के फूल भूल कर भी नहीं चढ़ाने चाहिए। इन फूलों को छोड़ भगवान शिव को सभी तरह के फूल प्रिय हैं।
भगवान विष्णु : भगवान विष्णु को कमल का पुष्प अति प्रिय है। इसके साथ ही इन्हें गुलाब, बेला, अशोक, केवड़ा, मालती, मौलसिरी, सेफाली, नवमल्लिका, जूही, कदम्ब, चमेली, अशोक, वासंती, चंपा, वैजयंती आदि के पुष्प भी प्रिय हैं। धर्मशास्त्रों का कहना है कि जितना पुण्य इन सभी फूलों को चढ़ाने से प्राप्त होता, उससे कई गुना पुण्य मंजरीयुक्त तुलसी पत्र चढ़ाने से मिलता है। भगवान विष्णु पर आक, धतूरा, शिरीष, सहजन, सेमल, कचनार और गूलर के फूल नहीं चढ़ते।
मां दुर्गा : भगवान शिव की पूजा में चढ़ने वाले ज्यादातर फूल मां भगवती को चढ़ाये जा सकते हैं। जितने भी लाल पुष्प हैं, वे सभी आदिशक्ति मां दुर्गा को प्रिय हैं। साथ ही, श्वेत सुगंधित पुष्प भी इन्हें चढ़ाये जा सकते हैं। शास्त्र में उल्लेख है कि केवड़ा, केतकी, आक और मदार को छोड़कर इनकी पूजा में सभी तरह के शुद्ध पुष्पों का चयन किया जा सकता है।
सूर्य देव : भविष्यपुराण में बताया गया है कि सूर्य देव को आक का फूल अर्पित करने से सोने की दस अशर्फियां चढ़ाने जितना पुण्य प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त कुटज, गुड़हल, कनेर, कुश, शमी, मौलसिरी, केसर, मालती, अरुषा, अशोक, पलाश, चंपा आदि के पुष्प भी सूर्य पूजा में इस्तेमाल किये जा सकते हैं।
सच पूछा जाये तो परमपिता परमेश्वर पर अर्पित किए जाने वाले सभी तरह के पुष्प, जल एवं अन्य पूजन सामग्री केवन मन को शांति पहुंचाने का माध्यम भर है, क्योंकि उनकी शक्ति को हम देख नहीं सकते, स्पर्श नहीं कर सकते, मात्र अपने अंत:करण में महसूस कर सकते हैं। जो समस्त चराचर का स्वामी है, दाता है, उसे किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं। वह तो भाव का भूखा है।
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