बनें परिवार की काउंसलर
दीप्ति अंगरीश
परिवार का मतलब सिर्फ एक छत में रहने, खाने, हंसने-खिलखिलाने से नहीं है बल्कि हर परिस्थिति में साथ निभाने से है। यानी दुख बांटना, दुख सुनना और दुख निपटारा भी। इसका बीड़ा आपको ही उठाना होगा। यदि आप बीड़ा नहीं उठाएंगी तो परिवार का हर सदस्य बिखरा-बिखरा रहेगा। यानी साथ होते हुए भी अंजान। ऐसे में परिवारवालों को मजबूत बनाएं।
सहनशीलता सिखाएं
सुख-दुख, अच्छा-बुरा दोनों ही जीवन का हिस्सा हैं। जब हम सुख को खुले दिल से अपनाते हैं तो बुरे वक्त को भी अपनाने में झिझक नहीं करनी चाहिए। जब तक बुरे वक्त को नहीं झेलेंगे तब तक अच्छे वक्त की एहमियत का अंदाजा कैसे लगेगा। हर हाल में सबको सहनशीलता का पाठ सिखाएं।
घुटने न टेकें
जीवन में किसी के साथ कुछ भी घटित हो, उसे खुद पर हावी न होने दें। जैसे भी हालात हों, उन्हें अपनाते हुए खुद को उसके अनुसार ढालने का प्रयास करें।
आभारी रहें
परिवार के हर शख्स के प्रति आभारी रहें। ज़रूरत पड़ने पर इनके प्रति अपना आभार प्रकट करें। मम्मी, पापा, भाई-बहन, प्यार, दोस्त अच्छी जिंदगी आदि ऐसा बहुत कुछ है, जिनके लिए आप को शुक्रिया अदा करना चाहिए।
अपनों से शेयरिंग
दोस्त या परिवार दोनों ही आप को दुख के अंधेरे से बाहर निकालने के लिए आप का हाथ पकड़कर उजाले की ओर ले जाते हैं। आप को भी उनकी शरण में सहजता का अनुभव होता है। इन्हें साथ लेकर चलना गृहलक्ष्मी की जिम्मेदारी है।
समस्याओं का हल
दुनिया में यदि कोई भी समस्या है तो उसका समाधान भी अवश्य होता है। समस्याएं कैसी भी हो सकती हैं। व्यक्तिगत, आर्थिक, शारीरिक आदि उसका हल खोजने का प्रयास करें। इसका दायित्व आप लें।
सच से दोस्ती
हर परिस्थिति को अपनाने का प्रयास करें। चाहे आप एग्जाम में फेल हो गए हों या आप की नौकरी छूट गई हो, सबको सच के साथ जीना सिखाएं। आपके साथ की बदौलत सच को अपनाकर ही परिवार वाले आगे बढ़ते हुए दुबारा नयी शुरुआत कर सकते हैं।
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