धरती कहे पुकार के
बाल कहानी
ललित शौर्य
चीकू खरगोश ने डैंजर भेड़िये को दो इंसानों से कुछ बातें करते हुए सुना। वो दोनों लोग बोल रहे थे, ‘इस बार कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए। तुम जितना कहोगे हम उतना पैसा तुम्हें देंगे। तुम बस जंगल के दूसरे जानवरों को संभाल लेना।’ डैंजर बोला, ‘ठीक है। इस बार बिल्कुल भी गड़बड़ नहीं होगी। बस काम आधी रात को शुरू होना चाहिए, और सुबह होते ही खत्म हो जाना चाहिए।’ ठीक है । जिस दिन काम शुरू होगा उससे एक दिन पहले तुम्हें सारी योजना बता देंगे। ये कहते हुए दोनों लोग वहां से चुपचाप निकल लिए। उन दोनों के हाथों में बड़ी-बड़ी कुल्हाड़ियां थी। जिन्हें देखकर कर चीकू डर गया। चीकू को दाल में कुछ काला लग रहा था। डैंजर भेड़िया पहले भी कई बार जंगल को मुसीबत में डाल चुका था। उसे इस बार भी कुछ ऐसा ही नजर आ रहा था। चीकू ने सारी बातें जंगल के अन्य जानवरों को बता दीं। सभी चीकू की बातों को सुनकर चिंतित हो उठे। हक्कू हाथी ने कहा, ‘जरूर डैंजर इनसानों के साथ मिलकर हमारे जंगल को खत्म करना चाहता है।’ डेयरी भालू ने हक्कू की बातों को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘हक्कू सही कहता है। डैंजर हमारे जंगल कटवाना चाहता है। हम ये बिल्कुल भी नहीं होने देंगे।’ वहां खड़े मास्टर पिंटू पांडा बोले, ‘ जंगल धरती की आत्मा हैं।अगर जंगल नहीं रहेंगे तो धरती रहने लायक नहीं बचेगी। वैसे भी धरती दिन-प्रतिदिन गर्म होते जा रही है। ग्लोबल वार्मिंग भयावह भविष्य का संकेत दे रही है। अगर अब भी जंगल कटते रहे तो, सूखा, बाढ़, भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएं आते रहेंगी।’ मास्टर पांडा की बातों से सभी सहमत थे। वहां उपस्थित सभी जानवरों ने एक सुर में निर्णय लिया कि इस बार धरती दिवस पर जंगल में बड़ा कार्यक्रम किया जाएगा। जिसमें जंगल के सभी जानवरों को आमंत्रित किया जाएगा। हम इस कार्यक्रम में डैंजर को भी आमंत्रित करेंगे। धरती दिवस पर जंगल में एक नाटक करने की योजना बनाई गई। नाटक मास्टर पांडा ने ही लिखा था। जिसका शीर्षक था, ‘ धरती रही पुकार।’ सभी जानवरों ने धरती दिवस के आयोजन की जमकर तैयारी शुरू कर दी। नाटक की थीम के अनुसार पात्र बनाये गए। चीकू को धरती माँ का अभिनय करने का अवसर प्राप्त हुआ। हक्कू को निर्दयी जंगल विनाशक का रोल दिया गया। देखते ही देखते धरती दिवस आ गया। योजना के अनुसार डैंजर को भी नाटक देखने के लिए आमंत्रित किया गया। उसे मंच के पास ही एक कुर्सी पर बिठाया गया। सभी जानवर स्टेज के सामने जमीन पर बैठ गए। सभी बड़ी उत्सुकता से नाटक शुरू होने का इन्तजार करने लगे। पर्दा खुलता है। चारों तरफ तबाही का मंजर दिखाई देता है। एक ओर जानवर भूख से मरते हुए दिखाई देते हैं, तो दूसरी ओर बाढ़ में बहते हुए नजर आते हैं। कुछ जानवर शुद्ध ऑक्सीजन न मिल पाने के कारण तड़पते दिखाई दिए। ये मंजर देखकर दर्शक दीर्घा में बैठे सभी जानवरों की आँखों से आसूं निकलने लगे थे। डैंजर भी सिसकने लगा था। सभी जानवर डैंजर को सिसकता देख हैरान थे। अचानक स्टेज से जोरों से चिल्लाने की आवाज आती है। हक्कू हाथी जो जंगल विनाशक का अभिनय कर रहा होता है ,वो कुल्हाड़ी लेकर चीकू के पीछे दौड़ता है। धरती बना चीकू जोर-जोर से धरती को बचाने की गुहार लगाने लगता है। ये दृश्य देखकर सभी जानवर फूट-फूटकर रोने लगे हैं। वहां बैठा डैंजर अचानक उठ खड़ा होता है, और बोलता है ,’मैंने इस जंगल को नष्ट करने के अनेक प्रयास किये। लेकिन अब मैं समझ चुका हूं कि जंगल कितने जरुरी हैं। आज से मैं जंगल बचाने का संकल्प लेता हूं।’ डैंजर की बातों को सुनकर सभी ने तालियां बजाईं,साथ में सभी ने पृथ्वी बचाने की बात दोहराई।
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