दवा मिले तक हाथ धोते रहिये
तिरछी नज़र
सहीराम
सवाल यह था कि आखिर कोरोना की दवा क्या है? सबने कहा दवा बनाना कोई हंसी-खेल थोड़े ही है। शोध होता है, ट्रायल होता है। पहले लैब ट्रायल, फिर जानवरों पर ट्रायल होता है और अंततः इनसानों पर ट्रायल होता है। बड़े-बड़े विकसित देश लगे हुए हैं। चीन, अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान सब लगे हुए हैं। बड़ी-बड़ी दवा कंपनियां लगी हुई हैं। तसल्ली रखो। साल भर लगेगा, तब तक कुछ दिन लॉकडाउन में रहो, कुछ दिन अनलॉक रहो। लॉकडाउन में भी एक-दो-तीन हैं। अनलॉक में एक-दो-तीन है। सावधानी लॉकडाउन में भी बरतनी पड़ेगी, सावधानी अनलॉक होने पर भी बरतनी पड़ेगी। ताला तालाबंदी में भी है और ताला, ताला खुलने में भी है। ताला तो रहेगा। इसलिए तब तक हाथ धोते रहो, मॉस्क पहने रहाे और दो गज की दूरी बनाए रखो। और क्या?
लेकिन बाबा को चैन कहां? उन्हें दवा बनाने की जबरदस्त हुड़हुड़ी उठी और उन्होंने कोरोना की दवा बना ही डाली। नहीं भैया, वह बाबाओं वाली भभूत नहीं थी। नहीं, वह बाबाओं वाला झाड़-फूंक भी नहीं था। न ही वह बाबाओं का दिया हुआ कोई फल था, न ही वह प्रसाद था। वह तो बाकायदा दवा थी। शीशी में बंद, मोहर लगी हुई एकदम प्रमाणित। इतनी सुंदर कि कोई भी रश्क कर सकता था।
ऐसे में होना तो यह चाहिए था कि देश इस पर गर्व करता कि हमने सबसे पहले कोरोना की दवा बनाने में सफलता हासिल की। हमने बड़े-बड़े विकसित अमीर देशों को पीछे छोड़ दिया। होना तो इस बात पर गर्व ही चाहिए था कि हम आखिर विश्वगुरु साबित हो गए। आखिर हमारी देशी पद्धति, आयुर्वेद की पद्धति ने अपनी श्रेष्ठता साबित की। लेकिन विडंबना है कि प्रतिभा की कोई कद्र ही नहीं। लोगों ने कहा कि शोध क्या हुआ? ट्रायल कहां हुआ? जंगल में मोर नाचा किसने देखा? न तो हमारी पांच हजार साल की मेधा पर किसी को विश्वास हुआ, न अपने विश्वगुरु होने पर भरोसा हुआ और न ही किसी ने अपनी देशी उपचार पद्धति का किसी ने पक्ष लिया? ऐसे कैसे आत्मनिर्भर बनेगा, भारत? ऐसे में प्रधानमंत्री की सीख का क्या होगा कि संकट को अवसर में बदल दो।
बाबा ने बदला, लेकिन उसे सम्मान किसने दिया? उल्टे बाबा से जवाब-तलबी हो गयी। खुद सरकारी विभाग तक भड़क गए। लोगों ने मजाक उड़ाया। बाबा ने बहुत कहा कि यह ड्रग माफिया की साजिश है। बाबा ने कहा कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दलाल यह सब कर रहे हैं। पर बाबा आखिर बाबा हैं। उनका प्रभाव रंग लाया और चाहे उस दवा को कोरोना की दवा न माना गया हो, पर इम्यूनिटी बूस्टर तो माना गया न। बाबा के लिए यह बूस्टर ही काफी है। तोप का लाइसेंस मांगा, तो बंदूक का मिल गया न।
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