क्रोध पर नियंत्रण

खलीफ़ा उमर उम्रभर धर्म और अध्यात्म की राह पर चलते रहे। सबको प्रेम और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले खलीफ़ा को सद‍्भाव का पाठ दुनिया को समझाने के लिए जीवन के अंतिम दिनों में तलवार उठानी पड़ गई थी। अपने प्रतिद्वंद्वी के उत्तेजक विचारों के कारण वह उससे भिड़ गए। शारीरिक भिड़ंत के पश्चात वह अपने विरोधी की छाती पर सवार हो गए और सिर कलम करने को तलवार निकाल ली। जैसे ही उन्होंने उसे मारने के लिए तलवार उठाई, विरोधी ने उन्हें भद्दी गाली दे दी। गाली सुनते ही उमर उठ खड़े हुए और तलवार भी वापस म्यान में रख ली। उनके एक साथी सैनिक ने पूछा—हुज़ूर, यह क्या किया। आपके पास अच्छा अवसर था इसे मारने के लिए, फिर छोड़ क्यों दिया। खलीफ़ा गम्भीरता से बोले—भाई, जब हमारा युद्ध प्रारंभ हुआ था, तब मैं बिना क्रोध के न्याय के लिए लड़ रहा था। किंतु इसके गाली देते ही मुझे क्रोध आ गया। ऐसी स्थिति में मेरे लिए पहले क्रोध को मारना आवश्यक हो गया। मैं नहीं चाहता कि मेरी मन:स्थितियों और इंद्रियों का नियंत्रण किसी और के हाथ में हो। खलीफ़ा के नि:स्वार्थ भाव से बोले गए वचनों से विरोधी भी पिघलकर उनके चरणों में गिर गया।

प्रस्तुति : मुकेश कुमार जैन

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