औद्योगिक दुर्घटनाएं

अभिषेक कुमार सिंह

कोरोना वायरस के प्रकोप के इस दौर में ऐसा लग रहा है कि सारी मुसीबतें एक साथ आ गई हैं। बंद हुए कामकाज के बाद इधर अनलॉक-1 और अनलॉक-2 के बीच जिन उद्योग-धंधों में काम शुरू हुआ है और बेरोजगारी से त्रस्त कामगारों ने आकर अपनी ड्यूटी संभाली है, फैक्टरियों में हो रही दुर्घटनाओं ने उनके लिए नई चिंता पैदा कर दी है। बीते तीन-चार महीनों में इन दुर्घटनाओं का एक पूरा सिलसिला बन गया है, जिनमें सबसे हाल की घटना तमिलनाडु के कुड्डालोर जिले में एनएलसी इंडिया लिमिटेड के थर्मल प्लांट की है। इस प्लांट में पहली जुलाई, 2020 को बॉयलर फट गया, जिससे 6 लोगों की मौत हो गई और 17 श्रमिक घायल हो गए। सवाल है कि अचानक फैक्टरियों और उनके प्लांटों में ऐसी दुर्घटनाओं की संख्या क्यों बढ़ गई है। क्या इसकी वजह लापरवाही या सुरक्षा उपायों का कारगर ढंग से लागू नहीं किया जाना है।
औद्योगिक दुर्घटनाओं-आपदाओं के बारे में एक सर्वमान्य तथ्य यह है कि यदि लापरवाही न बरती जाए तो उनके बारे में पहले से अनुमान लगाया जा सकता है। इसके लिए प्रायः सभी प्लांटों-फैक्टरियों में यह सूत्रवाक्य बड़े अक्षरों में लिखा जाता है कि सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। औद्योगिक दुर्घटनाओं से स्पष्ट हुआ है कि लापरवाही बरते जाने और सावधानी के नियम-कायदों का उचित ढंग से पालन नहीं करने के कारण ही ऐसी दुर्घटनाएं घटित होती हैं। बॉयलर का ढांचा पुराना पड़ जाना, पाइपों में लीकेज की कोई समस्या पैदा हो जाना, प्लांट के भीतर कहीं निकासी का कोई वॉल्व बंद होने से बेतहाशा दबाव बन जाना या ज्यादा मात्रा में ईंधन का प्रवाह हो जाने से विस्फोट हो जाना, ऐसी तमाम गड़बड़ियां हैं, जिनकी समय-समय पर जांच न हो तो दुर्घटना होने की आशंका रहती है।
असल में लॉकडाउन के बाद देश की ज्यादातर फैक्टरियों का कामकाज फिर से शुरू किया जा रहा है। इस दौरान बहुत ज्यादा संभावना यह बनती है कि संबंधित प्रणालियों पर नजर रखने वाले कर्मचारी किसी ऐसी गड़बड़ी की अनदेखी कर जाते हैं, जिन पर आम दिनों में उनकी नजर रहती है। किसी सिस्टम के हर छोटे-मोटे पुर्जे पर निगाह रखने वाले कर्मचारी लंबे अरसे बाद जब काम पर लौटते हैं, तब ऐसी असावधानियों की गुंजाइश अक्सर बन जाती है। पूरे देश की फैक्टरियों में इसे फौरन दुरुस्त करना होगा। एक अन्य समस्या है कि बीते तीन-चार महीनों में बंद पड़े प्लांटों में क्षरण से अथवा किसी अन्य कारण से मशीनरी में कोई दिक्कत पैदा हो सकती है। कामकाज शुरू होने पर बीते दिनों के घाटे की भरपाई करने और मांग के मुताबिक सप्लाई सुनिश्चित करने की जल्दबाजी में फैक्टरी संचालक हो सकता है कि मशीनरी में इस दौरान पैदा हुई समस्याओं की तरफ ध्यान न दे पा रहे हों।
मई में आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में एक केमिकल इंडस्ट्री (एलजी पॉलिमर इंडस्ट्री) में हुए गैस रिसाव से करीब एक दर्जन लोगों की मौत से ये आशंकाएं साफ हुई थीं। यह हादसा लॉकडाउन खत्म होने की घोषणा के फौरन बाद फैक्टरी का कामकाज फिर से शुरू करने की तैयारी के दौरान हुआ था। दावा है कि इस प्लांट से स्टाइरीन गैस के रिसाव से संपर्क में आने वाले आसपास के करीब पांच हजार लोगों के दिमाग और रीढ़ पर इसका असर हुआ था।
ज्यादातर विशेषज्ञों ने यह मत दिया था कि हो सकता है कि लॉकडाउन की वजह से फैक्टरी की टंकियों और मशीनों का सही रखरखाव नहीं हो पाया। केमिकल फैक्टरी में तो कई चीजों के नियमित निरीक्षण की जरूरत पड़ती है। ऐसे में मुमकिन है कि लॉकडाउन के दौरान नियमित निरीक्षण में बाधा आई हो या किसी स्तर पर लापरवाही हुई हो। इन्हीं आशंकाओं के तहत विशाखापत्तनम की घटना के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) की आपात बैठक बुलाई थी। जाहिर है कि इस बैठक में जो सुझाव दिए गए थे, ज्यादातर फैक्टरियों में अभी उन पर गंभीरता से अमल नहीं किया जा रहा है। 10 जून, 2020 को असम के तिनसुकिया जिले में 15 दिन तक हुए गैस के अनियंत्रित रिसाव के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम ‘ऑयल इंडिया’ के बागजान कुएं में भीषण आग लग गई, जिसमें 2 दमकल कर्मियों की मौत हो गई। ऐसी ही कई छोटी-मोटी दुर्घटनाएं और हुई हैं, जिनसे कोरोना संकट और लॉकडाउन की वजह से कई तरह की तकलीफें झेल रहे लोगों, फैक्टरी वर्करों और देशभर में औद्योगिक इलाकों के आसपास रहने वालों में भी दहशत फैला दी है।

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