दरअसल

राजकुमार सिंह
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अचानक लेह यात्रा की अलग-अलग नजरिये से व्याख्या संभव है, लेकिन सच यही है कि अपनी चौंकाने वाली कार्यशैली के इस नवीनतम और सबसे महत्वपूर्ण कदम से उन्होंने एक साथ कई निशाने साधे हैं, कई संदेश दिये हैं। यह संदेश बिना संवेदनशीलता महसूस किये हर मुद्दे पर राजनीति करने के आदी राजनीतिक दलों से लेकर भारत की शांतिप्रियता को कमजोरी समझने वाले चीन और भारत के अहसान भुला कर चीन के पिट्ठू बनने को उतावले कुछ देशों तक—सभी के लिए है। अब चाहे इसे मोदी का मास्टर स्ट्रोक कहें या फिर सरप्राइज स्ट्राइक—मोदी ने अपनी शैली में सभी को जवाब दे दिया है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता की त्वरित टिप्पणी बताती है कि संदेश सही जगह, सही रूप में पहुंच भी गया है। बाकी की प्रतिक्रियाएं आने में भी ज्यादा समय नहीं लगेगा।
गत 15 जून को गलवान घाटी में चीनी सैनिकों से हिंसक भिड़ंत और उसमें 20 भारतीय सैनिकों की शहादत के बाद बने माहौल में बढ़ता तनाव हर कोई महसूस कर रहा है। जाहिर है, चीन ने एक बार फिर अपने विश्वासघाती चरित्र का ही परिचय दिया था, लेकिन अतीत से सबक सीखे बिना बार-बार विश्वासघाती पर विश्वास करना भी काबिलेतारीफ तो नहीं माना जा सकता। अभूतपूर्व कोरोना महामारी और लॉकडाउन के समय इस मुद्दे पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये हुई सर्वदलीय बैठक में गोपनीयता समेत तमाम कारणों से सरकार की अपनी सीमाएं रही होंगी। फिर भी सभी दलों ने इस मुद्दे पर एकजुटता का ही संदेश दिया था, लेकिन उसके बाद अलग-अलग राजनीतिक राग आलापने में भी देर नहीं लगी।
राजनीति बुरी बात नहीं है। सवाल पूछना तो लोकतंत्र का बुनियादी अधिकार है, लेकिन हर चीज का समय और सीमा होती है। अगर कोरोना से लेकर गलवान घाटी तक हर मुद्दे पर आलोचना का मकसद सिर्फ केंद्र सरकार या और स्पष्ट शब्दों में कहें तो प्रधानमंत्री मोदी को कठघरे में खड़ा करना रह जायेगा, तब वह प्रासंगिकता खो कर खीझ से उपजा अनर्गल प्रलाप भर रह जायेगा, जबकि यह समय राजनीति का नहीं, राष्ट्रनीति का है। मोदी सरकार और भाजपा भले कहे कि लॉकडाउन समेत समय पर उठाये गये कदमों से कोरोना संक्रमण नियंत्रित करने में मदद मिली, पर संक्रमितों के आंकड़ों में आये दिन की उछाल का सच तो नहीं छिप सकता। जाहिर है, संभावित परिस्थितियों के आकलन और उनसे निपटने की रणनीति बनाने में सरकार से चूक हुई है, पर यह समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं है। केंद्र से लेकर राज्य सरकारों तक से कब क्या चूक हुई, उसकी जिम्मेदारी-जवाबदेही की बहस बाद में भी हो सकती है। फिलहाल तो देश के कुछ हिस्सों में बेकाबू नजर आ रहे कोरोना संक्रमण पर नियंत्रण तथा संभावित परिस्थितियों के अनुरूप हर मोर्चे पर तैयारियां ही हर किसी की प्राथमिकता होनी चाहिए।
कोरोना से संक्रमित भारत अकेला देश नहीं है। अन्य देशों की सरकारों से भी स्थिति के आकलन और तैयारियों में चूक हुई होगी, पर क्या वहां कहीं भी दलगत राजनीति से प्रेरित आरोप-प्रत्यारोप का शर्मनाक खेल दिखा? कोरोना किसी भी सरकार की विफलता का परिणाम नहीं है। हां, उससे निपटने की रणनीतियों में विफलता की जिम्मेदारी-जवाबदेही अवश्य सरकारों पर आयद होती है। यह भी कि ऐसी महामारी से निपटने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार के भरोसे भी नहीं छोड़ी जा सकती। दरअसल ऐसे किसी भी संकट से बिना सामाजिक भागीदारी और सामूहिक प्रयास के पार पायी ही नहीं जा सकती। अब यह बताने की जरूरत तो नहीं होनी चाहिए कि राजनीतिक दल भी समाज का ही हिस्सा हैं, जो कोरोना संक्रमण रोकने और उसके लिए सामाजिक जागरूकता फैलाने में कहीं प्रयासरत नहीं दिखे। हां, वे चिकित्सा विशेषज्ञों से लेकर प्रधानमंत्री मोदी तक द्वारा बार-बार की जा रही मास्क, सामाजिक दूरी और बार-बार हाथ धोने की अनिवार्यता सावधानी की अपील की धज्जियां उड़ाते अवश्य दिखे। खुद भाजपा सांसद मनोज तिवारी लॉकडाउन के दौरान ही सोनीपत में बिना मास्क क्रिकेट खेलने आये तो हाल ही में मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल विस्तार के समय अनेक मंत्री-विधायक बिना मास्क ही सामाजिक दूरी की अवधारणा की धज्जियां उड़ाते टीवी न्यूज चैनलों पर नजर आये।
अब दूसरे बड़े संकट की ओर लौटते हैं। वैसे विडंबना यह है कि कोरोना हो या गलवान, दोनों ही संकट चीन के धूर्त और विश्वासघाती चरित्र की ही देन हैं। सिर्फ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ही यह आरोप नहीं है कि न सिर्फ चीन की लैब से कोरोना वायरस फैला, बल्कि उसने विश्व समुदाय को समय रहते इसके प्रति आगाह भी नहीं किया। चीन जिस तरह इस संक्रमण को वुहान शहर या हद से हद एक प्रांत तक सीमित रखने में सफल रहा, और इस बीच कोरोना संकट में जरूरी चिकित्सा उपकरणों समेत तमाम चीजों का भारी स्टॉक भी कर लिया, उससे तो किसी सुनियोजित बड़ी साजिश का संदेह और भी गहराता है। उसी कोरोना संकटकाल में चीन ने लद्दाख में भारतीय सीमा में जमीनी वास्तविकताएं बदलने की भी साजिश रची। कारणों पर बहस हो सकती है, पर यही सच है कि दशकों से भारत की सुरक्षा चिंताएं और सामरिक तैयारियां पाकिस्तान केंद्रित ही रही हैं। खासकर समाजवादी पृष्ठभूमि के राजनेता और विचारक समय-समय पर केंद्र सरकार को चीन के नापाक मंसूबों के प्रति आगाह भी करते रहे, लेकिन लंबे अंतराल के बाद टास्क फोर्स और विशेष प्रतिनिधि स्तर पर शुरू हुई सीमा वार्ता वजह रही हो या फिर चीन द्वारा बनायी गयी अपनी विश्व महाशक्ति की छवि—हर केंद्र सरकार भारतीय सीमा क्षेत्र में चीनी घुसपैठ की हरकतों को नजरअंदाज कर तूल देने से परहेज करती रही।
ध्यान रहे कि तीन दशक से भी ज्यादा समय तक दोनों देशों के रिश्तों में जमी रही बर्फ 1988 में तब पिघली थी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी चीन की यात्रा पर गये थे। तत्कालीन चीनी नेतृत्व देंग शियाओ पिंग ने भी भारत के युवा प्रधानमंत्री का गर्मजोशी से स्वागत करते हुए दोनों देशों के संबंधों में नये अध्याय की उम्मीद जतायी थी। उसके बाद ही सीमा विवाद निपटारे के लिए टास्क फोर्स बनी, जिनमें बाद में अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्वकाल में विशेष प्रतिनिधि शामिल करने का भी फैसला हुआ।
गलवान अचानक नहीं हो गया। अरुणाचल, सिक्किम और यहां तक कि उत्तराखंड में भी पिछले कई दशकों में चीनी सेना की नापाक हरकतें जारी रही हैं। बेशक दोनों देशों के बीच होने वाली वार्ताओं में इस तनाव को कम किया जाता रहा, लेकिन उस प्रक्रिया, जिसे अब दिखावा कहना ज्यादा सही लगता है, के बीच भी चीन का धूर्त और विश्वासघाती चरित्र नहीं बदला। गलवान घाटी में 15 जून की भिड़ंत इसका सबसे ताजा प्रमाण है। जब अन्य देशों की तरह भारत भी कोरोना के भयावह संकट से अपने नागरिकों का जीवन बचाने के लिए जूझ रहा है, चीनी सेना ने अपने नापाक मंसूबों को अंजाम दिया। हमारे 20 सैनिकों की शहादत का सच सबके सामने है, पर मारे तो चीनी सैनिक भी गये हैं, जिनकी संख्या न तो चीन बता रहा है, न ही वहां कोई पूछ भी रहा है। तर्क दिया जा सकता है कि चीन में तानाशाही है, जबकि भारत में लोकतंत्र। बेशक यह बड़ा और बुनियादी फर्क है, जो दोनों देशों के चरित्र में भी साफ नजर आता है, लेकिन कम से कम संकटकाल में तो राष्ट्रहित में राजनीति पर कुछ समय के लिए विराम लगा देना चाहिए।

राजकुमार सिंह

कुछ लोग मोदी की एलएसी यात्रा को संभावित युद्ध का संकेत मान रहे हैं। निश्चय ही इस यात्रा से उन सैनिकों को बड़ा हौसला मिला होगा, जो बेहद प्रतिकूल और जटिल परिस्थितियों में भी देश की सीमाओं की रक्षा के लिए दुर्गम स्थानों पर दिन-रात डटे रहते हैं। 2020 में हम जैसी अप्रत्याशित स्थितियों का सामना कर रहे हैं, उसमें किसी भी स्थिति की संभावना-आशंका से इनकार भी नहीं किया जा सकता, लेकिन हर समझदार इनसान जानता है कि युद्ध अक्सर अंतिम विकल्प तो माने जाते हैं, पर समस्या हल करने के बजाय नयी समस्याएं ही पैदा करते हैं। इसलिए चीनी एप, निवेश और कारोबार पर हर संभव लगाम कसते हुए कूटनीति के जरिये अलग-थलग कर चीन पर दबाव बनाया जाना चाहिए कि वह 21वीं शताब्दी में विस्तारवादी मानसिकता को त्याग कर विकासवाद के रास्ते पर चले। वही सभी के हित में है।

journalistrksingh@gmail.com

The post राजनीति नहीं, राष्ट्रनीति का समय appeared first on दैनिक ट्रिब्यून.



from दैनिक ट्रिब्यून https://ift.tt/31Hgg0k
via Latest News in Hindi

0 Comments