बुजुर्गों के लिए बेरहम वक्त की टीस
कोविड-19 महामारी के दौरान वरिष्ठ नागरिकों को विकट स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें न केवल कोरोना वायरस से संक्रमित होने और इसका परिणाम जानलेवा बनने का खतरा ज्यादा है बल्कि पहले से अनेक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, मसलन हृदय रोग, मधुमेह या मोटापा इत्यादि से ग्रस्त होने की वजह से वे समाज के उस वर्ग में आते हैं, जिनके ऊपर महामारी की वजह से बंद हुए सरकारी या निजी अस्पतालों का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा है।
मौजूदा स्थिति के चलते 90 फीसदी अंतः एवं बाह्य रोगी अस्पताल सेवाएं बंद पड़ी हैं। कोई इस बात को नहीं नकार सकता कि बुजुर्गों को गैर-कोविड संक्रमण और गैर-छूत रोगों से भी उतना ही खतरा है, जितना कि कोरोना वायरस से। अनुमान के मुताबिक केवल कोरोना काल में ही लगभग 63 लाख लोगों में तपेदिक रोग पनप सकता है और इनमें लगभग 10 लाख इस बीमारी की भेंट चढ़ जाएंगे। पहले से ही हृदय, फेफड़ों, गुर्दा, दिमाग, लीवर, कैंसर या मनोरोग इत्यादि बीमारियों से ग्रस्त बड़ी उम्र के लोगों के ज्यादातर मामलों में इलाज में छह महीने का अंतराल बनने से हालत और अधिक गंभीर बन जाएगी। आखिर मुख्य अस्पताल पहले बंद क्यों किए गए? गैर कोविड-19 मरीजों के लिए अस्पताल वाले अभी भी बाह्य रोग विभाग खोलने को तैयार नहीं हैं।
मीडिया में यह बहस छिड़ी हुई है कि क्या लॉकडाउन ने करोड़ों लोगों को घातक कोविड-19 से संक्रमित होने से बचाया है या फिर इसको लागू करने को अपनाए गए निर्मम उपाय किसी तबके विशेष को कानूनी एवं मानवाधिकारों को नियंत्रित करने की गर्ज से थे। जहां इस सवाल का उत्तर इंतजार कर सकता है, वहीं यह तथ्य कायम रहेगा कि न केवल कोरोना काल में बल्कि हर उस समय में जब तक बुढ़ापा संबंधी स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं का स्तर ऊपर नहीं उठता तो सबसे ज्यादा परेशानी, तंगी और बेपरवाही, खासकर स्वास्थ्य संबंधी, बुजुर्गों को ही झेलनी पड़ेगी।
बड़ी उम्र के लगभग 70 फीसदी नागरिकों को पहले से ही स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होती हैं जो महामारी के दौरान और गंभीर बन जाएंगी, और कोरोना काल में से सबसे ज्यादा तकलीफ इसी वर्ग को झेलनी पड़ी है। शारीरिक व्याधियों के अलावा बुजुर्गों की भावनात्मक एवं मानसिक समस्याएं जैसे कि व्यग्रता, अवसाद, उनींदापन, नींद न आना, संत्रास, गुस्सैलपन, नाउम्मीदी, आलस्य और आत्मघाती प्रवृत्ति बनना इत्यादि मानसिक स्थितियां बनने की संभावना रहती है। ‘ऐज-वैल’ फाउंडेशन द्वारा करवाए अध्ययन के मुताबिक लगभग 65 प्रतिशत बुजुर्गों को शिकायत है कि लॉकडाउन की वजह से उनकी आजादी, स्वाभिमान और यहां तक कि गरिमा पर गहरा असर हुआ है क्योंकि उन्हें मूल आवश्यकताओं के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहना पड़ा है।
हालांकि, काफी लंबी चली राष्ट्रीय तालाबंदी लगभग खत्म हो चुकी है, इसके बावजूद 65 साल से ज्यादा उम्र वालों के लिए प्रतिबंध अभी भी कायम हैं और उन्हें बाहर निकलने की मनाही है। इसलिए स्वास्थ्य संबंधी या सुबह की सैर जैसी आम क्रियाओं में राहत मिलने की उम्मीद फिलहाल दिखाई नहीं दे रही है। मुंह पर मास्क का प्रयोग अनिवार्य बनाना बेशक सुरक्षा के लिहाज से जरूरी है, लेकिन जिनको पहले से ही श्वास संबंधी समस्या है, उन वरिष्ठ नागरिकों के लिए इस निर्देश ने और तंगी खड़ी कर दी है। चूंकि बुजुर्गों को घर की चारदीवारी तक सीमित होकर रहना पड़ रहा है, ऐसे में अधिकतर टेलीविजन, कंप्यूटर या मोबाइल फोन इत्यादि उपकरणों से चिपके रहते हैं। लिहाजा लंबे समय तक इनके प्रयोग से दृष्टि में धुंधलापन, आंखों में खुजली-जलन या तीखा सिरदर्द होने लगता है। आमतौर पर इसे कंप्यूटर सिंड्रोम कहा जाता है। कसरत, पौष्टिकता, यथेष्ट जलग्रहण और धूप-सेवन का अभाव और लंबे समय तक एक मुद्रा में बैठे अथवा लेटे रहने की वजह से उन्हें शरीर में कई जगह दर्द और ऐंठन का सामना करना पड़ता है।
बुढ़ापा, क्षीण हुई जीवनशक्ति, अपनों की उपेक्षा के चलते यूं भी आमतौर पर बुजुर्ग अपने ही घर में हाशिए पर होते हैं। ज्यादातर समाज बुढ़ापे को बीत चुके काल की तरह लेता है और नजरिया बहुत दफा बड़ी उम्र वालों से दुर्व्यवहार का बायस बनता है। मीडिया में रात-दिन चल रही खबरें कि कोविड-19 से बुजुर्ग सबसे ज्यादा मर रहे हैं या अन्यों को संदूषित कर रहे हैं, यह भद्र तरीका नहीं है। इसमें ताड़ना और कलंक की बदबू आती है। बड़ी उम्र में सांस लेने में कठिनाई, श्वास तंत्र में रुकावट पैदा करने वाले फेफड़े संबंधी रोग या आम जुकाम तक का अक्सर जिद्दी खांसी, गले में दर्द और फ्लू जैसे लक्षणों में तबदील होना आम बात है। यदि इसे कोविड-19 समझने की गलती करते हुए उन्हें एकांतवास में रखने या अपने हाल पर छोड़ देने से मानसिक संत्रास बनेगा, यह आगे इनसान की रोग प्रतिरोधक शक्ति का ह्रास करता है, लिहाजा इससे संक्रमण पकड़ने की गुंजाइश बढ़ जाएगी।
यदि किसी बुजुर्ग की जीवनशैली सही नहीं है तो रोजमर्रा की क्रिया पर लग गया अतिरिक्त प्रतिबंध, कुपोषण और घटी रोग प्रतिरोधक शक्ति के कारण उनमें और अधिक कमजोरी पैदा हो जाएगी। आंख की रोशनी अथवा श्रवण शक्ति कमजोर पड़ने से उन्हें दूसरों के साथ संवाद बनाने में मुश्किल होने लगती है। ऊपर से याददाश्त, विचार और व्यक्त करने की शक्ति में ह्रास होने से उनमें स्वास्थ्य और सुरक्षा संबंधी सभी निर्देशों को पूरी तरह याद रखने और पालन करने में असमर्थता पैदा हो जाती है।
गलत जानकारी की बाढ़ में हो सकता है बुजुर्गों को संक्रमण के बारे में सही जानकारी न हो। एक ही समय में अनेकानेक दवाइयों के इस्तेमाल की जरूरत, सही खुराक और समय याद रखना उनको चकरा देते हैं। मनोवस्था-सामाजिक असुरक्षा से उनके अंदर एकाकीपन, व्यग्रता और अनिश्चितता की भावना भर जाती है, जिससे आगे अवसाद संबंधी मुश्किलें, नींद न आना और गहरा अवसाद पैदा हो जाता है। अकेला पड़ने या प्रियजनों से दूर होने पर पैदा हुई उदासी और छिन जाने की भावना बहुत गहरी और दीर्घकालीन असर अंदाज बन जाती है।
सरकारी एजेंसियां, गैर-सरकारी संगठन, परिवार और देखभालकर्मी मिलकर बुजुर्गों को सामाजिक, भावनात्मक, मेडिकल और खुशमिजाजी का संबल दे सकते हैं। उनकी रोजाना की जरूरतें और आवश्यकताओं का समुचित समन्वयन करने की जरूरत है। बड़े लोगों में हाथ-श्वास स्वच्छता और शारीरिक चुस्ती बनाए रखने की जागरूकता बनाने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने की जरूरत है। अस्पताल उनके लिए आखिरी विकल्प होना चाहिए। विशेष सर्जरी जैसे कि मोतियाबिंद, हर्निया या घुटने बदलना आदि को फिलहाल आगे टालना श्रेयस्कर होगा। डिजिटल स्क्रीन का इस्तेमाल रोजाना दो घंटे से कम रखा जाए। किसी स्पष्टीकरण के लिए मेडिकल परामर्श सबसे बेहतर विकल्प है। घर में संकट की स्थिति बनने पर बुजुर्गों को निर्णय प्रक्रिया लेने में शामिल किया जाना चाहिए। उनके अधिकार, स्वाभिमान और गरिमा को हर कीमत पर अक्षुण्ण किसी भी कीमत पर बनाए रखना होगा।
लेखक नैतिक एवं वहन योग्य स्वास्थ्य देखभाल समिति के अध्यक्ष हैं।
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