जिम्मेदार व्यवहार से टलेगा संकट
ऐसे वक्त में जब देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या साढ़े आठ लाख पहुंच गई है और मरने वालों का आंकड़ा साढ़े बाइस हजार पार कर गया है, देश के कई राज्यों में लॉकडाउन की वापसी हुई है। तेजी से फैलते संक्रमण के मद्देनजर राज्यों की चिंताओं को समझा जा सकता है। ऐसी महामारी, जिसका कारगर इलाज अभी तक तलाशा नहीं जा सका है और चिकित्सा व्यवस्था नाकाफी है, तो बचाव में ही उपचार नजर आता है। उत्तर प्रदेश में 55 घंटे का लॉकडाउन लगाया गया और अब भीड़भाड़ वाले शनिवार व रविवार को लॉकडाउन हर सप्ताह लागू होगा। संक्रमण बढ़ने के चलते कर्नाटक, अरुणाचल प्रदेश, असम व मेघालय में निश्चित अवधि के लिये लॉकडाउन लगाने की बात सामने आ रही है। कई राज्यों ने संक्रमित क्षेत्र विशेष में लॉकडाउन लागू किया है। लोगों से कहा जा रहा है कि केवल आपातकाल में ही घर से बाहर निकलें। बिहार, केरल, महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों समेत उत्तराखंड के उधम सिंह नगर व काशीपुर में संक्रमण बढ़ने की वजह से लॉकडाउन लागू है। कई राज्य शनिवार व रविवार को लॉकडाउन लागू करने पर विचार कर रहे हैं क्योंकि इन दिनों सार्वजनिक स्थानों पर लोग ज्यादा निकलते हैं। ऐसे में भीड़ से बचकर ही संक्रमण से बचाव संभव है। दरअसल, अनलॉक की प्रक्रिया में जरूरी बचाव के उपाय नहीं अपनाये गये, जुर्माना लगाने के बावजूद लोगों ने नियमों का पालन नहीं किया।
निस्संदेह कोरोना संकट अभी बरकरार है। ऐसे में अनलॉक की जो प्रक्रिया जीवन को सामान्य बनाने के लिये शुरू की गई थी, लोगों ने उसे पूरी आजादी के रूप में लिया। यह विडंबना ही है कि हम अपनी सुविधाओं के लिये बड़े खतरे को नजरअंदाज करने लगे। जो सावधानी अपेक्षित थी, उसका पालन नहीं किया गया। यह ठीक है कि आंकड़े बढ़ने की वजह जांच की संख्या में रिकॉर्ड तेजी आना भी है। मार्च में जहां इक्का-दुक्का लैब कोरोना टेस्ट कर रही थी, अब इनकी संख्या ग्यारह सौ से अधिक है। मरीजों के उपचार के लिये बैडों की संख्या लाखों तक जा पहुंची है। मगर इस संकट काल में ज्यादा सतर्कता व सावधानी की जरूरत है। अब वह समय नहीं है कि पूरे देश में फिर से लॉकडाउन घोषित किया जा सके। ऐसे में आर्थिक स्थिति सुधारने के प्रयासों पर पानी फिर जायेगा। उससे जो सामाजिक व आर्थिक नुकसान होगा, उसकी भरपाई करना संभव न होगा। कोरोना संकट तो बड़ा है ही, उससे बड़ा संकट बेकारी व भुखमरी पैदा होने का है।  खासकर रोज कमाने-खाने वाले तबके के लिये। कोई ऐसी चूक नहीं होनी चाहिए कि संक्रमण को विस्तार मिले और राज्य सरकारें फिर से लॉकडाउन के बारे में सोचें। यह वक्त जान बचाने का भी है और जहान बचाने का भी। वह भी ऐसे वक्त में जब पता नहीं है कि महामारी का प्रकोप कब तक रहने वाला है। कारगर वैक्सीन मिलने के बाद ही जिंदगी पटरी पर लौट पायेगी। हम सरकार के भरोसे ही न बैठें, आत्मरक्षा के लिये खुद को भी बदलें।

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