जीवन का गणित
एक राजा सुबह सैर करने के लिए महल से अकेला ही निकला। रास्ते में उसने एक किसान को पसीने में तर-ब-तर अपने खेत में काम करते हुए देखा। राजा ने पूछा, ‘भाई आप इतनी मेहनत करते हो, दिन में कितना कमा लेते हो?’ किसान ने उत्तर दिया, ‘एक सोने का सिक्का।’ राजा ने पूछा ‘उस सोने के सिक्के का क्या करते हो?’ किसान ने कहा, ‘राजन! एक-चौथाई भाग मैं खुद खाता हूं। दूसरा-चौथाई भाग उधार देता हूं। तीसरे-चौथाई भाग से ब्याज चुकाता हूं और बाकी चौथाई हिस्सा कुएं में डाल देता हूं।’ किसान की बात राजा की समझ में न आई। वह बोले, ‘भाई, पहेली मत बुझाओ। साफ़-साफ़ बताओ। किसान ने मंद-मंद मुस्कुराकर कहा, ‘महाराज, पहले चौथाई भाग में से मैं अपना और अपनी पत्नी का पेट पालता हूं। दूसरे-चौथाई हिस्से में अपने बाल-बच्चों को खिलाता हूं, क्योंकि बुढ़ापे में वे ही हमें पालने वाले हैं। तीसरे-चौथाई भाग से मैं अपने बूढ़े मां-बाप को खिलाता हूं, क्योंकि उन्होंने मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया है। इसलिए मैं उनका ऋणी हूं। इस प्रकार उनका ब्याज चुकाता हूं। बाकी चौथाई हिस्से को मैं दान-पुण्य में लगा देता हूं, जिससे मृत्यु के बाद परलोक सुधर जाए। राजा किसान की ईमानदारी पर बहुत खुश हुआ।
प्रस्तुति : पूनम पांडे

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