मैं का बंधन
लाओत्से के पास एक आदमी गया और उसने पूछा कि मैं मोक्ष चाहता हूं। लाओत्से हंसने लगे। उन्होंने कहा, ‘पागल, तू मोक्ष चाहता है?’ उसने कहा, ‘हां, मैं मोक्ष चाहता हूं, मोक्ष को कैसे पाऊं?’ लाओत्से ने कहा, ‘पहले समझ कर आ कि ‘मैं’ है? पहले जा, खोज कर आ कि ‘मैं’ है, अगर ‘मैं’ हो तो मैं मुक्त होने का रास्ता बता दूंगा और अगर ‘मैं’ ही न हो, तो किसको मुक्त करने का रास्ता बताऊंगा।’ वह आदमी वापस गया। वर्षों बाद वापस लौटा, चरणों पर सिर रख दिया। लाओत्से ने पूछा, ‘खोज लिया ‘मैं’? उस आदमी ने कहा, ‘आपने भी क्या आश्चर्यजनक बात कही। ‘मैं’ को खोजने गया, ‘मैं’ खो गया!’ लाओत्से ने कहा, ‘मोक्ष का इरादा?’ उसने कहा, ‘बात ही खत्म हो गई। ‘मैं’ ही नहीं हूं तो मुक्त किसको होना है! और जब ‘मैं’ ही नहीं हूं तो मुक्त हो गया। क्योंकि ‘मैं’ ही बंधन था।’
प्रस्तुति : सुभाष बुड़ावनवाला

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