नये जीवन मूल्य तलाशने का वक्त
चार महीने से अधिक हो गये, पूरे देश में भयबोध एक नया युग सत्य बनकर झंझावात की तरह बह रहा है। मार्च के दिन वे पहले दिन थे जब इस देश की एक सौ तीस करोड़ से अधिक आबादी के लिए जीवन का अर्थ बदल गया। मार्च के अन्तिम दिनों में एक अदृश्य अपरिचित वायरस, जिसे कोरोना का नाम दिया गया, ने देश के हर राज्य में कुछ इस प्रकार दस्तक दी कि अच्छे भले लोग लगातार संक्रमित होने लगे। उनकी सांस रुकने लगी, फेफड़े चरमरा कर असह्य कष्ट देने लगे और देखते ही देखते इस दुनिया का हर छोटा-बड़ा देश संक्रमित हो गया।
दुनिया भर में इस समयावधि में सवा करोड़ लोग संक्रमित हो गये। साढ़े पांच लाख मौतें हो गयीं, और प्रतिदिन दो लाख से अधिक मरीज संक्रमित होने लगे। इस रोग ने भारत जैसे मेहनती देश को भी नहीं बख्शा। अलग-अलग राज्यों में कुल दस लाख के करीब लोग संक्रमित हो गये, 26 हजार से अधिक लोग जान गंवा बैठे, और सामाजिक अन्तर रखने की पूरी एहतियात के बावजूद प्रतिदिन लगभग तीस से अधिक लोग इन विषाणुओं के संक्रमण का शिकार होने लगे।
देखते ही देखते लोगों को अपनी भौतिक उपलब्धियां नगण्य लगने लगीं। भारत जैसे धर्मप्राण देश में, जो सदा अपनी सांस्कृतिक गरिमा के कवच और कुण्डलों की सुरक्षा से जीता रहा, अचानक लगा कि जिंदगी को देखने के लिए एक नये दृष्टिकोण को विकसित करना पड़ेगा। शिक्षा, चिन्तन, अध्ययन, अध्यवसाय और सिद्धपुरुषों के प्रवचनों ने आज तक उसके लिए जीने का एक संस्कार पथ निर्मित किया था, अब लगा उसे एकदम त्याग कर एक निपट अकेली राह पकड़नी होगी।
पूर्ण बन्दी के चरणों में तो घरों में बंद रहने की मजबूरी थी। इस मजबूरी ने लोगों को दो विकल्प दे दिये। पहला, या तो अवसादग्रस्त अकेला झेलो। भौतिकवाद की अन्धी दौड़ में हथेली पर सरसों जमाने, या देखते ही देखते झोपड़ी से प्रसाद हो जाने के सपनों पर औषधि रहित मृत्यु भय को डैने पसारता देखो। फिर इस प्रकार खंडित हो जाओ कि अवसाद से लेकर नकारात्मकता तुम्हारे कदमों से कदम मिलाने लगे। देशभर में संक्रमण से मरने वाले लोगों से अधिक अपनी मनोवैज्ञानिक व्याधियों से बिखरते, परिवारों के टूटने और अपने जीवन से भयाक्रान्त हो खत्म कर देने के प्रयासों की खबरें आने लगीं। इनकी बढ़ती संख्या इतनी भयावह थी कि अभी चाहे पूर्ण बन्दी की समाप्ति के चार चरणों के बाद ढील और राहत भरी अपूर्ण बन्दी का दूसरा चरण शुरू हो गया, लेकिन मानसिक रूप से अस्तव्यस्त हो गये लोगों की संंख्या में कमी नहीं आयी।
रोज स्थिति सुधरने का इंतजार करते लोगों को जब संक्रमित होते और जान खोते लोगों के बढ़ते आंकड़े नजर आते, इस रहस्यमय बीमारी की कोई भी औषधि मार्किट में आती नजर न आयी तो और भी विखण्डित हो गये। इसीलिए अभी विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत के केंद्रीय सेहत संस्थान ने कहा है िक इस कोरोना महामारी के रोगियों के लिए उचित अस्पतालों, बेडों, आक्सीजन और वेंटिलेटरों की व्यवस्था के साथ इन मन से टूटते लोगों के लिए एक मनोव्याधि चिकित्सा क्षेत्र का भी विकास करना होगा। ऊपर से अमेरिका की एमआईटी ने यह दावा कर दिया कि अगर 2021 तक इस महामारी की कोई अचूक दवा न बनी तो अकेले भारत में ही रोज 2.87 लाख मरीज मिलने लगेंगे।
महामारी के सैलाब के लगभग चार महीने गुजरने को आये। लेकिन सामाजिक दूरी, नकाब और दस्ताने से लदी-फदी इनसानों की यह बेचारगी अपने भयावह अकेलेपन के कैदघरों में कैद हो गयी है। धर्मस्थलों और भविष्यवक्ताओं की दिलासायें उनके लिए अर्थहीन हो गयी हैं। इस अनिश्चित बेचारगी में आज तक जो मूल्य उन्हें आधार देते, वे उन्हें खो बैठे। डेरों, सन्ताें, महन्तों और सांस्कृतिक उत्सवों का उत्साह उन्होंने खो दिया, लेकिन किसी को याद क्यों नहीं आया कि इस लाचार अकेलेपन से कहीं बड़ा होता है अपना एकान्त।
कभी द्वापर युग में गीता में अपने एकान्त में उतर कर अपनी अकूत शक्तियों को तोलने का संदेश दिया था। देवालयों और धर्मस्थानों के ताले तो आज भी लोगों के लिए आधे अधूरे खुले हैं, लेकिन हर व्यक्ति के अन्तस में उतर कर अपनी आत्मा का साक्षात्कार कर एक अपने देवालय का निर्माण कर लेना भी तो अवसर है। इस वक्त को स्वीकार करके कितने लोग हैं जो अपने-अपने घरों के समक्ष खड़े होकर अपने-अपने चेहरों की पहचान कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात होती है, अपनी मौजूदा स्थिति को स्वीकार करके अप्रत्याशित अंधेरे में से भी अपने पक्के कदम उठा लेना। इस अंधेरी सुरंग से बाहर आ जाने की इच्छा।
इस इच्छा को न मरने देने के लिए किसी चिन्ता ने पूरे देश को आत्मनिर्भर हो जाने का संदेश दे दिया तो क्या गलत किया। उधार की बैसाखियों से हर दिन कठिन होती जा रही सड़क का रास्ता तय नहीं होता। भूख से सिसकते हुए अस्सी करोड़ लोगों को जिंदगी नवंबर मास तक प्रति मास पांच किलो गेहूं, चावल या एक किलो चने की खैरात से नहीं चलेगी। इस भयाक्रान्त वातावरण में क्यों नहीं पहचान पाये हम कि लगभग पचहत्तर बरस के योजनाबद्ध आर्थिक विकास के बावजूद न तो देश के बुनियादी उद्योग विकास ने लय पकड़ी है, और न ही मूलभूत आर्थिक ढांचे का विकास इसने किया।
अब अगर अंतर्राष्ट्रीय मन्दी में उद्योग धंधों के नकार के कारण देश का दस करोड़ मजदूर अपनी जड़ों की ओर लौट अपने जीने का वसीला तलाशता है तो उसे मनरेगा के फर्जी कार्डों और एक देश-एक राशनकार्ड के लक्ष्य के बावजूद अपने कृषक समाज की कमर टूटी नजर आती है। पौन सदी गुजर गयी, हम अभी तक इस लम्बे-चौड़े देश में कृषि आधारित उद्योगों का कोई नया मानचित्र ही खड़ा नहीं कर पाये। सही है कि घर लौटे इस श्रमिक समुदाय के लिए सरकार ने पचास हजार करोड़ रुपये के निवेश के साथ उनके गांव-घरों के साथ वैकल्पिक रोजगार का सपना देखा है। लेकिन इतना काफी नहीं, आज निराश हो इन गांवों से वापस अपने महानगरों की ओर लौटते हुए मजदूरों की व्यथा बयान कर रही है। अनलाॅक के खुलते हुए चरण उन्हें काम पर लौटाने का प्रलोभन दे रहे हैं।
लेकिन क्या अब जरूरी नहीं कि इस देश के लोग अपनी मूल प्रकृति की पहचान करें? गिरते-पड़ते इस कृषक को फिर अपने पैरों पर खड़ा होने का संदेश दे दें। कृषि के आधारभूत उद्योगों का विकास ही इसकी औद्योगिक क्रांति को संतुलन दे सकता है, यह उसे अकेलेपन की अपंगता नहीं, अपना-अपना एकांत स्वयं झेलने की सामर्थ्य देगा।
लेखक साहित्यकार एवं पत्रकार हैं।
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