गांव की छांव
ज्ञानदत्त पाण्डेय
गांव, गांव ही रहेगा। मैं सोचता था कि गांव हाईवे के किनारे है, गांव के बीच में एक रेलवे स्टेशन है। रेल का दोहरीकरण हो रहा है। बहुत बदलाव हो रहे हैं। लेकिन गांव तो गांव ही है। कभी बिना मांगे सलाह मिलती है तो कभी अपनापन। ऐसा ही हुआ पिछले दिनों। यूं ही पूरा दिन बीत जाता है। कहते हैं, पुरवाई चले तो आलस आता है। मौसम तप रहा था। पछुआ हवा थी-गर्म और सूखी। शाम के समय हल्की आंधी आई और बिजली गायब। नींद उखड़ी-उखड़ी सी रही। दिन में जब तब आंखें झपक जाती थीं। बिजली नहीं, इंटरनेट भी उखड़ा-उखड़ा सा। पूर्वांचल में प्रवासी आने लगे हैं बड़ी संख्या में साइकिल/ऑटो/ट्रकों से। उनके साथ आ रहा है वायरस भी, बिना टिकट। गांव देहात में मामले बढ़ रहे हैं, पर लगता है जनता कुछ सचेत है। शहरों की भीड़ यहां नहीं है। लोग खोंचा या मास्क उतना पहने नहीं दिखते, पर मुंह पर गमछे की आड़ बनाये दिखते हैं। दुकानदार ज्यादा सतर्क हैं। दो दवा के दुकानदारों ने तो सामने शीशे का स्क्रीन जैसा बनवा कर ग्राहक से दूरी बनाने का इंतजाम कर लिया है। दवा की दुकान पर बीमार के आने और संक्रमण के फैलने की सम्भावना ज्यादा है।
कई लोग पूरी तरह बेफिक्र नजर आते हैं! सवेरे गंगा किनारे नावों के पास बैठे नौजवान उसी प्रकार के हैं। आपस में चुहुलबाजी करते। वहीं पर राजेश मिला। राजेश सरोज। वह बम्बई गया था। वहां से मुझे फोन पर बताया था कि किसी मछलीमार नौका में स्थान बनाने का यत्न कर रहा है। बम्बई से लॉकडाउन के पहले ही आ गया था। तब ट्रेनें चल रही थीं। आज शाम गुन्नी पाण्डे आये थे। एक सज्जन की दशा बता रहे थे। दो शादियां हुई थीं उन सज्जन की। पहली से एक लड़का है जो नौकरी कर रहा है। पहली पत्नी के देहावसान के बाद दूसरी शादी हुई तो उससे चार लड़के हैं। चारों ही अकर्मण्य। आसपास देखें तो जो दुख, जो समस्यायें, जो जिंदगियां दिखती हैं, उनके सामने कोरोना विषाणु की भयावहता तो पिद्दी सी है। पर जैसा हल्ला है, जैसा माहौल है; उसके अनुसार तो कोरोना से विकराल और कुछ भी नहीं। यह समय भी निकल जायेगा। समझाते अच्छा हैं गांव वाले निश्छल भाव से।
साभार : हलचल डॉट ब्लॉग
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