एकदा
राजगुरु का दायरा
एक राजा को गुरु की आवश्यकता महसूस हुई तो उसने वजीर से कहा—कोई ऐसा आश्रम खोजिए जो अत्यधिक विशाल हो। कोई गुरु अथवा आचार्य नया आश्रम बनाना चाहते हों तो उसके लिए राज्य की भूमि दान में दी जाएगी। यह सुनकर कई संत, महात्मा और आचार्य आदि आगे आए और भूमि पाकर आश्रम निर्माण में लग गए। एक दिन राजा वजीर को लेकर आश्रमों की निर्माण प्रगति देखने निकला। राजगुरु बनने की होड़ में एक से बढ़कर एक आश्रम बनाए जा रहे थे। एक जगह ऋषि सत्यानन्द को वृक्ष के नीचे विश्राम करते देखकर राजा रुक गया। राजा ने पूछा, ‘स्वामी जी, आपके आश्रम का निर्माण कार्य अभी तक प्रारंभ नहीं हुआ?’ सत्यानन्द जी बोले, ‘राजन! यह सारा संसार ही मेरा आश्रम है और यहां विचरण करने वाले सभी मेरे अपने हैं। फिर मैं क्यों चारदीवारी खींच कर अपने आश्रम को छोटा करूं।’ राजा ने संतुष्ट होकर सत्यानन्द जी को ही राजगुरु का दर्जा दे दिया।
प्रस्तुति : मुकेश कुमार जैन
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