योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’

जीवन में हर व्यक्ति शान्ति की कामना करता है। कोई भी यह नहीं चाहता कि उसके जीवन में पल भर के लिए भी कोई ऐसी बात हो, जिससे उसका मन अशान्त हो जाए और वह बेचैनी महसूस करे। अगर कहीं हो-हल्ला हो रहा हो या आपको लगे कि आपके आसपास कुछ लोगों में संघर्ष होने वाला है तो क्या आप शान्ति से सो पाएंगे? आपका उत्तर होगा कि यह कैसे संभव है कि मेरे आसपास सशस्त्र लड़ाई हो रही हो और मैं दंगे को भूल कर सो जाऊं?
अब जरा महाभारत के युद्ध में, कुरुक्षेत्र के कोलाहल भरे युद्ध-क्षेत्र में, अपने गुरु द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, कुरुवंश के भाई-बांधवों और युद्ध के लिए सन्नद्ध अन्य आत्मीयजनों को देखकर व्याकुल हुए अर्जुन को दिए भगवान श्रीकृष्ण के उद‍्बोधन पर विचार कीजिये। आप पाएंगे कि वासुदेव श्रीकृष्ण तब युद्ध-क्षेत्र में खड़े व्याकुल पार्थ को स्थितिप्रज्ञ होकर कर्म करने का उपदेश देते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं पार्थ! भीरु मत बनो, युद्ध करो। और अंततः, अर्जुन युद्ध की विभीषिका के बीच अपना कर्तव्य का पालन करता है। अपने गुरु द्रोणाचार्य को भी ललकारता है, पितामह से भी युद्ध करता है और अंततः विजय पाण्डवों की होती है।
प्रश्न फिर वही है कि ‘शांति’ कहां है? एक बोधकथा में इस प्रश्न का बेहद सरल और सटीक उत्तर है। बोधकथा इस प्रकार है— एक राजा को कलाकृतियों से बहुत प्यार था। एक बार उसने घोषणा की कि जो भी कलाकार उसे एक ऐसा चित्र बना कर देगा, जो शांति को दर्शाता हो तो वह कलाकार को मुंह मांगा इनाम देगा। राज्य के एक से बढ़कर एक चित्रकार इनाम जीतने के लालच में अपनी-अपनी कलाकृतियां लेकर राजा के दरबार में पहुंचे। राजा ने एक-एक करके सभी चित्रों को देखा और उनमें से दो चित्रों को अलग रखवा दिया। इनमें पहला चित्र एक अति सुन्दर शांत झील का था। उस झील का पानी इतना निर्मल था कि उस झील के अन्दर की सतह तक नज़र आ रही थी और उसके आसपास मौजूद हिमखंडों की छवि झील पर ऐसे उभर रही थी, मानो कोई दर्पण रखा हुआ हो। जो कोई भी इस चित्र को देखता, उसको यही लगता कि शांति को दर्शाने के लिए इससे अच्छी कलाकृति तो और कोई हो ही नहीं सकती।
दूसरे चित्र में भी पहाड़ थे, पर वे बिल्कुल रूखे, बेजान और वीरान से थे। इन पहाड़ों के ऊपर घने काले गरजते हुए बादल थे, जिनमें बिजलियां चमक रही थीं… घनघोर वर्षा होने से नदी पूरे उफान पर थी… तेज हवाओं से पेड़ हिल रहे थे… और पहाड़ी के एक ओर स्थित झरने ने रौद्र रूप धारण कर रखा था। जो कोई भी इस चित्र को देखता, वह यही सोचता कि भला इस चित्र का शांति से क्या लेना-देना? सभी आश्वस्त थे कि पहले चित्र बनाने वाले चित्रकार को ही आज इनाम मिलेगा। तभी राजा ने घोषणा की कि दूसरे चित्र को बनाने वाले चित्रकार को मुंह मांगा इनाम देंगे।
दरबार में उपस्थित हर कोई आश्चर्य में था। पहले चित्रकार से रहा नहीं गया, वह बोला, लेकिन महाराज! उस चित्र में ऐसा क्या है, जो आपने उसे इनाम देने का फैसला लिया? राजा ने पहले चित्रकार को अपने साथ चलने के लिए कहा। दूसरे चित्र के समक्ष पहुंच कर राजा बोले—झरने के बायीं ओर तेज़ हवा से, एक तरह से पूरे झुके हुए इस वृक्ष को देखो? …देखो, इसकी डाली पर बने इस घोसले को देखो? …और देखो, कैसे एक चिड़िया इतनी कोमलता से, इतने शांत-भाव और प्रेम से पूर्ण होकर अपने नन्हे से बच्चों को खाना खिला रही है… और तब राजा ने वहां उपस्थित सभी लोगों को समझाया, शांत होने का मतलब यह नहीं होता है कि आप ऐसी स्थिति में हों, जहां कोई शोर नहीं हो… कोई समस्या ही नहीं हो… बल्कि शांत होने का सही अर्थ तो यह है कि आप हर तरह की अव्यवस्था, अशांति और अराजकता के बीच खड़े हों और फिर भी आप शांत रहें, अपने कर्म पर केंद्रित रहें… अपने लक्ष्य की ओर पूरे मन से अग्रसरित रहें।
दरबार में उपस्थित सभी लोग समझ चुके थे कि दूसरे चित्र को राजा ने क्यों चुना है? सच यही है कि हर कोई अपनी जिंदगी में शांति चाहता है। परन्तु जाने क्यों, अक्सर हम शांति को कोई बाहरी वस्तु समझ लेते हैं और उसे बाहरी दुनिया में, पहाड़ों और झीलों में ढूंढ़ते हैं, जबकि शांति तो पूरी तरह से हमारे अन्दर की चीज है। इसीलिए कबीर ने कहा था :-
माला तो कर में फिरे, जीभ फिर मुख माहीं।
मनवा तो चहुं दिसि फिरे,यह तो सुमिरन नाहीं।
जीवन का सत्य तो यही है कि शान्ति कर्महीन होकर बैठने से नहीं मिलती, बल्कि जीवन के संघर्षों से जूझते हुए अपने आसपास दूसरों के लिए सुखों को ढूंढ़ने से मिलती है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा है— कंदराओं में कैद होकर तपस्या करने से मन की शान्ति या मोक्ष नहीं मिलता, बल्कि दरिद्र नारायण की सेवा करने से शान्ति और मन की प्रसन्नता मिलती है। याद रखिए, शान्ति मरघटों में नहीं मिलती, बल्कि सच्ची शान्ति मानवता के लिए जूझने में मिलती है। निष्िक्रयता का अर्थ है मृत्यु और सक्रियता का अर्थ है जीवन और शान्ति।

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