जन संसद

राहत और वसूली
पेट्रोल के दाम बढ़ने के पीछे सरकार की कुछ गलत नीतियां जिम्मेदार हैं, लेकिन हम यह नहीं सोचते कि वाहनों का दुरुपयोग कर हम पेट्रोल और डीजल को बेवजह बर्बाद करते हैं। सरकार को कीमतों को कम करने के उपाय करने चाहिए। जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी आयी है तो उसका लाभ देश की जनता को भी मिलना चाहिए। वैसे भी इस समय सार्वजनिक सड़क और रेल यातायात लगभग बंद है, पेट्रोल और डीजल की खपत भी बहुत कम है। वहीं सरकार आर्थिक पैकेज दे रही है। मुफ्त का अन्न-धन सरकार बांट रही है, क्या उसकी भरपाई तेल की कीमतें बढ़ाकर पूरी होगी?
राजेश कुमार चौहान, जालंधर

राहत भी मिले
अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें गिर जाने के बावजूद भारत की तेल कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है। इसके पीछे मुख्य भूमिका टैक्स में हुई भारी बढ़ोतरी की है, जिसे मौजूदा हालात में समझा भी जा सकता है। सरकार की आय के सारे रास्ते करीब-करीब बंद हैं। आमदनी जुटाने के लिए उसके पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं। पेट्रोल-डीजल की मूल्य वृद्धि का ज्यादा असर मध्य वर्ग पर होता है। सरकार को समय रहते कोई ऐसी राह निकालनी चाहिए, जिससे पेट्रोल और डीजल की महंगाई बर्दाश्त से बाहर न हो।
प्रदीप कुमार दुबे, देवास, म.प्र.

सरकार की मजबूरी
जब विश्व में कच्चे तेल के दाम बहुत कम हैं तो इस समय देश में डीजल-पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी भी जारी है। ऐसे में महंगाई ने भी रफ्तार पकड़ ली है। यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब देश में कोरोना संकट से लोग त्रस्त हैं। कच्चे तेल के भाव में कमी का जनता को कोई लाभ नहीं मिल रहा। इसका मुख्य कारण लाॅकडाउन में कारोबार का ठप होना है, जिससे सरकार के राजस्व में कमी हो गई है। ऐसे में कस्टम ड्यूटी, एक्साइज ड्यूटी व जीएसटी में कमी आयेगी। ऐसे में राजस्व घाटा पूरा करने के लिए सरकार को आसान रास्ता पेट्रोल व डीजल के दाम बढ़ाना ही लगता है।
सोहन लाल गौड़, बाहमनीवाल, कैथल

मानवीय हो नजरिया
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल का मूल्य न्यूनतम स्तर पर है, लेकिन भारत में तेल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत के अनुपात में घटने की बजाय निरंतर बढ़ रही हैं। माल ढुलाई में प्रयुक्त वाहन डीजल चालित हैं, जिससे दैनिक प्रयोग की वस्तुओं और खाद्य पदार्थों की कीमत और महंगाई बढ़नी तय है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत कम होने पर उपभोक्ताओं को राहत मिलनी ही चाहिए। सरकार को कोरोना काल में त्रस्त जन सामान्य की आर्थिक बेबसी और दुर्दशा के दृष्टिगत अनावश्यक कर वृद्धि को समाप्त करके कच्चे तेल की कीमतों के अनुरूप तेल की कीमतें अविलंब कम करनी चाहिए।
सुखबीर तंवर, गढ़ी नत्थे खां, गुरुग्राम

कीमतें तय हों
कोरोना महामारी के नाजुक समय में कोई भी सरकार तेल आदि के दामों में बढ़ोतरी नहीं करना चाहेगी क्योंकि इससे वह जनता और विपक्ष की नाराजगी और आलोचना का पात्र बनती है। मगर दूसरी ओर सरकार इसके बदले गरीब जनता को बहुत सस्ता राशन गेहूं, चावल और चीनी आदि भी तो बहुत कम दामों पर जनवितरण प्रणाली के माध्यम से देती। लगता है सरकार इसकी पूर्ति तेल के दामों को बढ़ाकर करना चाहती है। सरकार को दूसरे देशों का अनुसरण करके तेल के दाम तय करने चाहिए।
वेद मामूरपुर, नरेला

आर्थिक समीकरण
इस सप्ताह डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में गिरावट आई है, जिसका मतलब है कि भारतीय तेल कंपनियां डॉलर खरीदने के लिए अधिक भुगतान करेंगी। इसका सीधा असर यह होगा कि तेल की कीमतों में गिरावट का उपभोक्ताओं को लाभ नहीं मिलेगा। लेकिन कच्चे तेल की कीमत में एक डॉलर की कमी से भारत का आयात खर्च कम होता है। इसी तरह डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में एक रुपये प्रति डॉलर का बदलाव आने से भारत के आयात बिल में अंतर पड़ता है। इसलिए सरकार के लिए इसे ऊंची कीमत पर बेचना मजबूरी है क्योंकि उसके खर्चे का बड़ा हिस्सा इसी से आता है। यह मुख्य कारण है कि तेल के दामों में कमी होने के बावजूद उपभोक्ताओं को लाभ नहीं हो रहा है।
नेहा जमाल, मोहाली, पंजाब

पुरस्कृत पत्र

संवेदनहीन फैसला
जब दुनिया में तेल के दामों में बड़ी गिरावट आई है और आम आदमी कोरोना संकट की वजह से आर्थिक रूप से भी त्रस्त है तो ऐसे में डीजल व पेट्रोल के दामों में वृद्धि एक संवेदनहीन फैसला है। इस समय दुनिया में लॉकडाउन के चलते पेट्रोल की खपत थम-सी गई है। कच्चे तेल की कीमत रसातल में है। फिर देश में तेल की कीमतों में वृद्धि का कोई औचित्य नहीं है। माना लॉकडाउन के चलते देश की अर्थव्यवस्था चरमरा गई, लेकिन केंद्र व राज्य सरकारों ने मनमाने शुल्क लगाकर राजस्व बढ़ाया है। यह आम जनता पर कुठाराघात है। सरकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि अर्थव्यवस्था तो देर-सवेर सुधर ही जाएगी।
पूनम कश्यप, बहादुरगढ़

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