योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’

भारतीय जीवनदर्शन में जरूरतमंद की मदद को बड़ा महत्व दिया गया है। देश में एक संस्कृति रही है कि हम वंचित समाज को दान-दक्षिणा देकर जीवन की जरूरतों में सहयोग करने पर विचार करते हैं। यहां एक विचारणीय प्रश्न यह भी उभरता है कि परिस्थितिवश मुश्किल में पड़े व्यक्ति की तो मदद की जानी चाहिए। इसमें किसी आपदा या दुर्घटना में शामिल व्यक्ति भी शामिल है। लेकिन यदि किसी ने स्वस्थ रहते हुए मांगकर या दी हुई सहायता को ही जीवनयापन का जरिया बना लिया तो क्या इसे तार्किक माना जाये? क्या उसे इस तरह मुफ्त की सहायता लेने का हक है? कहीं हम उसे अकर्मण्य तो नहीं बना रहे हैं? यदि हम किसी की मदद करते हैं तो उसमें यह भाव जरूर आना चाहिए कि इस परिस्थिति से उबर कर मैं शीघ्र स्वावलंबी बनूं। कुछ रचनात्मक सोचकर आय का जरिया तलाशूं। कुल मिलाकर मदद प्रेरक होनी चाहिए, जो उसे स्वाभिमान से जीना सिखाये।
इसी विचार की कड़ी में एक बेहद प्रेरक प्रसंग पढ़ने को मिला, जो व्यथित अन्तर्मन को बहुत शांति प्रदान करता है। जो पाने के हक के गहरे निहितार्थों को सहजता से बताता है। नि:संदेह प्रेरणादायी प्रसंग जीवन को नई दृष्टि देता है।
‘एक रेलवे स्टेशन पर एक भिखारी रोज़ भीख मांगा करता था। एक दिन सूटेड-बूटेड व्यक्ति से उसने भीख मांगी, तो उसने कहा कि मैं तुम्हें भीख क्यों दूं? क्या तुम मुझे बदले में कुछ दोगे? भिखारी बोला—’साहब, मैं तो खुद मांगता हूं, भला मैं क्या दे सकता हूं।’
उस सेठ ने भीख नहीं दी और चला गया। उधर भिखारी के मन में उसके शब्द गूंजने लगे कि तुम क्या दोगे जो मैं तुम्हें कुछ दूं। उसने देखा कि स्टेशन के बाहर काफी फूल लगे हुए हैं, जो दूसरे दिन मुरझा जाते हैं। उसने कुछ अच्छे फूल तोड़े और भीख देने वाले को फूल भेंट कर दिया। लोगों को अच्छा लगा और उसे भीख ज्यादा मिलने लगी।
कुछ दिन बाद वही सेठ स्टेशन पर भिखारी को मिला और फूल देकर बोला कि आपने मुझे लोगों को कुछ देने को कहा था, सो अब मैं ये फूल देता हूं। सेठ ने उसे बताया कि ये फूल तुम अपने परिश्रम से नहीं उगाते, इसलिए ये तुम्हारे तो नहीं हैं न? और सेठ ने भीख नहीं दी तो भिखारी ने उसकी बात पर फिर सोचा तो उसने अपनी झोपड़ी के पास खाली जमीन पर फूल उगाने शुरू कर दिए।
कुछ दिन बाद दो सूटेड-बूटेड व्यक्ति स्टेशन पर आमने-सामने थे। एक ने कहा—’आपने मुझे पहचाना?’ दूसरा बोला कि हम तो पहली बार मिले हैं, तो पहले ने कहा कि श्रीमान हम तीसरी बार मिल रहे हैं।
मैं वही भिखारी हूं, जिसे आपने भीख नहीं दी थी, तो मैं लोगों को स्टेशन से फूल तोड़कर भेंट करने लगा। आपने फिर कहा था कि ये मेरे परिश्रम से उगाए हुए तो नहीं हैं तो मैंने झोपड़ी के पास जमीन पर फूल उगाए और आज मैं फूलों का व्यापारी बन गया हूं। अब भीख नहीं मांगता, बल्कि लोगों को जीविका देता हूं। आपका ऋणी हूं कि आपने मुझे जीवन का सबसे बड़ा मंत्र दिया कि ‘लेना ही सब कुछ नहीं होता, हमें देना आना चाहिए।’
सेठ बोला—’मित्र, आज आप मेरी तरह सच्चे व्यापारी बन गए हैं और अब आपसे हाथ मिलाना मेरे लिए गर्व की बात है।’ हाथ मिलाकर दोनों अपनी-अपनी मंज़िल की ओर चले गए।
इस प्रसंग के बाद मुझे अपना ही एक मुक्तक याद आ गया, जो इसी भाव को विस्तार देता है :-
‘कुछ देकर ही कुछ मिलता है।
दुख सहकर ही सुख मिलता है।
है अटल नियम इस सृष्टि का,
बीज गलकर ही पुष्प खिलता है।’
निःसंदेह, जब तक हम ‘देना’ नहीं सीखते, हमें ‘लेने’ का अधिकार भी नहीं मिल सकता। अंग्रेजों ने तो बहुत साफ-साफ नियम बनाया है ‘गिव एंड टेक’ अर्थात‍् पहले दो, फिर लो।
विश्वकृति ‘कामायनी’ में प्रलय के बाद चिंताग्रस्त मनु को श्रद्धा ने यही तो समझाया था :-
‘अपने में भर सब कुछ कैसे,
व्यक्ति विकास करेगा?
यह एकांत स्वार्थ है भीषण,
अपना नाश करेगा।’
और शायद, इसी जीवन-मंत्र को सार्थक मानते हुए मस्तमौला, फक्कड़ कबीर ने भी तो यही कहा था :-
‘मांगन मरण समान है,
मत कोई मांगो भीख।
कहे कबीर सुन रे मना,
करके खाना सीख।’
जीवन में आत्मनिर्भरता सबसे बड़ा गुण माना गया है और मांगना सबसे बड़ा अपमान होता है।
इस विश्वव्यापी संकट की घड़ी में एक संकल्प तो हम सब ले ही लें कि हम आपदा की घड़ी में ‘सहायक’ तो अवश्य बनें, लेकिन किसी को ‘भीख’ देकर उसे अकर्मण्य बनाने का पाप न करें। किसी को भी याचक न बनाएं बल्कि खुद के पैरों पर खड़ा होने का साहस उसमें भरने का सद्प्रयास करें।

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