अपने बूते कोरोना से लंबी लड़ाई
आलोक यात्री
कोरोना के कहर से जहां हर कोई खौफजदा है, वहां बहुत से लोग ऐसे हैं जिनका जज्बा पूरी मानव जाति के लिए मिसाल कायम कर रहा है। सैयद उज्मा परवीन हों या विजय अय्यर, इनके जज्बे को आज दुनिया सलाम कर रही है। लखनऊ की उन तंग गलियों में जहां नगर निगम की टीम भी घुसते हुए कतराती है, वहां बुर्कानशीं उज्मा पीठ पर भारी-भरकम मशीन लादे हर रोज सेनेटाइजेशन का काम कर रही हैै। कुछ कर गुजरने के जज्बे से लबरेज़ उज्मा का कहना है कि सेनेटाइजेशन के काम में उसने जब निगम कर्मियों की लापरवाही और हील-हुज्जत देखी तो इस काम का बीड़ा खुद ही उठा लिया। भोपाल के विजय अय्यर की भी कोरोना योद्धा के रूप में पेश की गई साहस की मिसाल किसी पहचान की मोहताज नहीं है। जिन्होंने साल भर की अपनी कुल कमाई पिछले ढाई महीने से शहर के निषिद्ध क्षेत्रों में सोडियम हाइपोक्लोराइड के छिड़काव में खर्च कर दी।
चेहरे पर मास्क, शरीर पर बुर्का और पीठ पर सेनेटाइजर की भारी-भरकम मशीन लादे गली-दर-गली सेनेटाइजेशन करती इस महिला को देखकर लोग कौतूहल में पड़ जाते हैं। बीते 26 अप्रैल से उज्मा सआदतगंज, ठाकुरगंज, चौक, अमीनाबाद और बालागंज जैसे लखनऊ के कई मोहल्लों में अपने बल-बूते सेनेटाइजेशन का काम कर रही है। महज 29 साल की उज्मा सआदतगंज स्थित घर से निकलने से पहले अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को अंजाम देती हैं। उनके लिए हिंदू-मुस्लिम या मंदिर-मस्जिद का कोई भेद नहीं है। दो बच्चों की मां उज्मा का कहना है कि लाॅकडाउन के दौरान उन्हें लोगों की तक़लीफों की ज़मीनी हकीकत से रूबरू होने का मौका मिला। भोजन और राशन के तमाम सरकारी और गैर-सरकारी दावों और व्यवस्था के बावजूद बड़ी संख्या में लोग भोजन व राशन के लिए त्रस्त थे। सेनेटाइजेशन के काम के साथ-साथ उज्मा ने लोगों को भोजन और राशन भी मुहैया करवाना शुरू किया। भोजन वितरण और सेनेटाइजेशन के काम में उज्मा अब तक पांच लाख रुपए की धनराशि खर्च कर चुकी हैं।
भोपाल शहर के टीला जमालपुरा इलाके के रहने वाले विजय अपने ही घर में पंक्चर की छोटी-सी दुकान चलाते हैं। विजय का सपना अपने बाप-दादा की तरह सेना में जाकर देश सेवा करने का था। लेकिन इकलौती संतान होने की वजह से उनकी मां इस निर्णय के खिलाफ थीं। तैंतीस वर्षीय विजय का कहना है कि लाॅकडाउन के चलते 24 मार्च को उनकी पंक्चर की दुकान बंद हो गई। बेहतर इलेक्ट्रिशियन होने के बावजूद विजय को काम मिलना बंद हो गया। नई मोटरसाइकिल के लिए विजय ने 70 हजार रुपए बचा कर रखे थे। लेकिन शहर के कुछ निषिद्ध क्षेत्रों को सेनेटाइजेशन में निगम कर्मियों द्वारा बरती जा रही लापरवाही व भेदभाव ने विजय के भीतर सोये सेवा के जज्बे को जाग्रत कर दिया। मोटरसाइकिल के लिए पाई-पाई कर जोड़ी गई रकम विजय ने स्प्रे मशीन, पीपीई किट, सेनेटाइजेशन का सामान खरीदने में खर्च कर दी। बीते करीब तीन माह से विजय पीठ पर कैमिकल से भरी मशीन लाद कर हर सुबह अपने मिशन पर निकल जाते हैं। शहर के संक्रमण प्रभावित इलाकों में घर-घर जाकर नि:शुल्क छिड़काव करने में विजय का पूरा दिन व्यतीत हो जाता है।
लॉकडाउन खुलने के बावजूद उज्मा की दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आया है। बल्कि अब उसे लोगों की छोटी-छोटी जरूरतों की पूर्ति का ख्याल भी रखना पड़ रहा है। किसी को चप्पल चाहिए तो किसी को दवाई, काॅपी या किताब। उज्मा के अनुसार बेटे की पढ़ाई के लिए उन्होंने दो लाख रुपए संभाल कर रखे थे। इस काम के लिए वह राशि तो निकाली ही बल्कि अलग से बचाए हुए तीन लाख रुपए भी इस नेक काम में खर्च कर दिए। उनके इस काम में उज्मा के व्यावसायिक पति भी अब मददगार हैं। काम के प्रति उज्मा का समर्पण देखकर कुछ रिश्तेदार भी मदद को आ जुटे हैं।
सेनेटाइजेशन के लिए उज्मा ने स्प्रिंग मशीनें खरीदी थीं। बाद में लोगों ने उन्हें दो मशीनें दान में और दीं। लोग पहले उन्हें हैरानी से देखते थे। कुछ लोग मज़ाक उड़ा कर हतोत्साहित करने की कोशिश भी करते रहते थे। लेकिन धीरे-धीरे लोगों की उनके और उनके काम के प्रति धारणा बदली। लोग अब उनके काम की प्रशंसा करते हैं। अब तो समस्या निवारण के लिए उनके पास विभिन्न इलाकों से फोन भी आते हैं। हैरान लोग अक्सर उनसे सवाल करते हैं। लोगों से बस वह इतना ही कहती हैं कि इस संक्रमण काल में हमें महिला-पुरुष नहीं, एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से काम करना ज्यादा जरूरी है।
लॉकडाउन खुलने के बाद विजय ने पंक्चर की दुकान पुनः खोली है, लेकिन इक्का-दुक्का ग्राहक आने की वजह से उनकी दिनचर्या जारी है। पैसे की कमी के सवाल पर विजय का कहना है कि विदेश में रह रहे उसके कुछ समर्थ रिश्तेदारों ने उससे लोगों की यह सेवा जारी रखने के लिए कहा है और आर्थिक सहायता का आश्वासन भी दिया है। लोग अब फोन पर ही उन्हें अपने इलाके की बदहाली बताते हैं, जिसे दूर करने विजय संकटमोचक के रूप में निकल जाते हैं। अपने इस काम से मिले अनुभव को साझा करते हुए विजय कहते हैं कि लोगों को कोरोना वायरस से साहस और आत्मविश्वास के साथ लड़ना चाहिए। भय हमें मारता है।
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