सहीराम

बड़े-बड़े ज्ञानी, चिंतक और बुद्धिजीवी बस सोचते ही रह जाते हैं अपनी जड़ों की ओर लौटने के बारे में और देखो मजदूरों ने उठाए झोले और निकल गए अपनी जड़ों की ओर। उनसे शहर की सुविधाएं छूटती नहीं और इनके पास कोई सुविधा थी नहीं। उनके इस तरह झोला उठाकर निकल जाने से बेचारे वे फकीर तक हतप्रभ हैं, जो कहते थे कि हमारा क्या है, झोला उठाएंगे और चल देंगे। पर ये चले गए, उखड़कर। भई ये मजदूर हैं कोई जफर जैसे बादशाह तो हैं नहीं कि यह रुदन ही करते रह जाएं कि है कितना बद-नसीब ‘ज़फ़र’ दफ़्न के लिए दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में। वे अपने कू-ए-यार में अपनी दो गज जमीन के लिए निकल पड़े। अलबत्ता दफ़्न होने के लिए उन्होंने अपने कू-ए-यार वाली उस दो गज जमीन का बहुत लालच नहीं किया। कई तो उनमें रास्ते में भी दफ़्न हो गए। कभी मालगाड़ी ने उन्हें दफ़्न होने का मौका दिया तो कभी किसी ट्रक ने, तो कभी ट्रैक्टर ने तो कभी किसी बस ने। दफ़्न में सहयोग करने में किसी ने कोई कोताही नहीं की। जिसे मौका मिला, उसी ने दफ़्न कर दिया। बोले—छोड़ो न यार कू-ए-यार! जहां हम तुम्हें कुचल रहे हैं उसे ही कूए-यार मान लो। हम कोई तुम्हारे दुश्मन थोड़े ही हैं। दुश्मन तो उन्होंने उन मकान मालिकों को भी नहीं माना, जिसने उनसे घर खाली करा लिया था। दुश्मन तो वह सरकार को भी नहीं मान रहे, जिसने लॉकडाउन लगाया।
बेचारे मजदूर जब बादशाह जफर नहीं हो सकते तो वह बादशाह जफर के उस्ताद जौक भी कैसे हो सकते हैं, जो कहते थे कि कौन जाए जौक ये दिल्ली की गलियां छोड़कर। मजदूर तो क्या दिल्ली और क्या मुंबई, वे तो हर शहर की गलियां छोड़कर जा रहे हैं। उस्ताद जौक की तरह उनकी दरबार में रसाई नहीं है न। होती तो वे कह देते कि कौन जाए अब यह शहरों की गलियां छोड़कर। इस मामले में वे चचा गालिब के ज्यादा करीब हैं, जो कहते थे कि है अब इस मामूरे में कहते गमे उल्फत असद, हमने यह माना कि दिल्ली में रहें, पर खाएंगे क्या? वे भी फकीर थे, यह भी फकीर हैं। उन्हें भी हमेशा प्यार का अकाल सताता रहा। इन्हें भी प्यार नहीं मिला। उनकी भी दरबार में रसाई नहीं थी, इनकी भी दरबार में रसाई नहीं है। फिर भी चचा गालिब तो दिल्ली छोड़कर नहीं गए। पर ये चले गए। कोई फिल्मी गाना है कि अपना गांव संभालो, मैं तो शहर की ओर चला। लेकिन ये गाते हुए जा रहे हैं कि अपना शहर संभालो, हम तो गांव की ओर चले। जब वह शहर की ओर चला था तो उसके चेहरे पर खुशी थी, जब ये गांव की ओर चले तो इनकी आंखों में आंसू थे।

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