महेश तिवारी

प्रधानमंत्री ‘आत्मनिर्भर भारत’ की बात करते हैं। यहां यक्ष प्रश्न क्या कोई भी राष्ट्र, समाज या फ़िर व्यक्ति बिना शोध के आत्मनिर्भर हो सकता है? किसी भी राष्ट्र या समाज के विकास के लिए उस समाज या राष्ट्र में शोध को बढ़ावा देना जरूरी होता है। विकास तभी संभव है जब उस राष्ट्र के लोगों का जीवन मूल्य उच्चकोटि का होगा। सांस्कृतिक रूप से समाज मजबूत होगा। नई-नई तकनीक को विकसित किया जाएगा। अनुसंधान और नवाचार संस्कृति को जीवन का हिस्सा बनाया जाएगा। ऐसे में शोध किसी भी क्षेत्र की प्राथमिकता में रहता है; यह तो निश्चित है और राष्ट्र के विकास की पहली सीढ़ी कहीं न कहीं शोध है।
अनुसंधान किसी भी राष्ट्र की प्रगति का मूलाधार है। यह ज्ञान के विकास में, उद्देश्य प्राप्ति हेतु, समाज और राष्ट्र को नई गति प्रदान करने में, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय भावना के विकास में, सुधार में, सत्य की खोज में, प्रशासनिक आदि अनेक क्षेत्रों में सहायता प्रदान करता है। तभी तो अनुसंधान को जॉन डीवी ‘प्रगतिशील प्रक्रिया’ मानते हैं। वैसे भी भारत जैसे देश में शिक्षा का महत्व हमेशा से रहा है और उसे सर्वोच्च धन के रूप में स्वीकार किया गया है। ऐसे में देखें तो राष्ट्र के निर्माण के लिए जरूरी कोई भी पक्ष हो। वह नवीकरणीय ऊर्जा का क्षेत्र हो, धर्म और दर्शन का क्षेत्र हो। अंतरिक्ष से जुड़ी बातें हों। शिक्षा या समाज से जुड़ी संकल्पनाएं हों। सभी क्षेत्रों में जब तक शोध के महत्व को अंगीकार नहीं किया जाएगा तब तक एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण नहीं हो सकता।
विश्व के युवा राष्ट्र के रूप में हम सृजनात्मकता, उद्यमिता, नवाचार, शोध एवं अनुसंधान का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकते हैं। इन सब बातों के मद्देनजर देखें तो आज शिक्षण संस्थानों आदि को लेकर देश में राजनीति ख़ूब होती रहती है। आप कहते रहिए कि हम विश्वगुरु थे। वैश्विक रैंकिंग में दुनिया के 300 विश्वविद्यालयों में एक भी विश्वविद्यालय भारत का नहीं आता। वर्ष 2012 के बाद पहली बार टॉप-300 में भारत का कोई विश्वविद्यालय नहीं है। 92 देशों के 1396 संस्थानों में भारत का नंबर 300 के नीचे आता है। केवल आईआईटी रोपड़ को ग्लोबल रैंकिंग में टॉप-350 संस्थानों में जगह दी गई।
कुल 337 प्राइवेट यूनिवर्सिटी, 400 राज्य विश्वविद्यालय, 126 डीम्ड यूनिवर्सिटी, 48 सेंट्रल यूनिवर्सिटी, 31 एनआईटी, 28 आईआईटी और 19 आईआईएम यानी कुल संस्थान 984 और कुल छात्र 3.66 करोड़। लेकिन पढ़ाई- लिखाई के संसार में न तो हमारी कोई साख है और न कोई महत्व। जरूरत है राष्ट्र की समृद्धि और विकास के लिए शिक्षा में बदलाव और शोध को बढ़ावा देने की। ऐसे में आत्मनिर्भर भारत बनाना है तो अनुसंधान एवं विकास पर ख़र्चा बढ़ाने की दिशा में सोचना होगा। हम आर एंड डी पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज 0.6 प्रतिशत खर्च करके न वैश्विक व्यवस्था के खेवनहार बन सकते और न ही आत्मनिर्भर, यह हमारी सियासी परिपाटी को समझना होगा।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में सरकार के स्तर पर अनुसंधान और विकास पर कुल जीडीपी का 2.8 प्रतिशत, चीन में 2.1 फ़ीसदी, इस्राइल में 4.3 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया में 4.2 फीसदी ख़र्च होता है। इतना ही नहीं, रिपोर्ट यह भी कहती कि वैज्ञानिक रिसर्च और विकास में महिलाओं की आबादी तो बहुत ही कम है। वैसे भारत में सार्वजनिक निवेश की तुलना में निजी निवेश अनुसंधान एवं विकास क्षेत्र में काफ़ी अल्पमत में है। अधिकांश देशों में अधिकतर कार्य निजी क्षेत्र द्वारा किया जाता है। हालांकि, भारत में प्राथमिक स्रोत के साथ ही साथ अनुसंधान एवं विकास निधि की उपयोगकर्ता सरकार ही है। फ़ोर्ब्स की 2017 की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की शीर्ष 2500 कंपनियों द्वारा अनुसंधान और विकास पर ख़र्च करने वाली सूची में चीन की 301 कम्पनियां शामिल हैं, जबकि भारत की सिर्फ़ 26 ही। ऐसे में जब बात अब विशेषज्ञों द्वारा मेड इन इंडिया और मेक इन इंडिया से आगे निकलकर ‘मेड बाय इंडिया’ की हो रही। ऐसे में अनुसंधान को बढ़ावा देना बेहद लाज़िमी बनता जा रहा। कोरोना काल ने हमारी व्यवस्था को इस दिशा में सोचने को विवश किया है, लेकिन यह देखने वाली बात होगी कि इसका परिणाम क्या होगा? दरअसल, हमने प्रायः गुणात्मक कार्यक्रमों को भी संख्यात्मक कार्यक्रमों में बदल दिया है। लेकिन सिर्फ़ संख्याबल से ही सब कुछ हासिल नहीं होता, यह भी एक हकीकत है। फ़िर गुणवत्ता की दिशा में कब बढ़ेगा भारत, सवाल अपने आप में एक यह भी है।

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