शमीम शर्मा

जब कभी कोरोना काल का इतिहास लिखा जायेगा तो इसके भुक्तभोगियों को सूचीबद्ध करने पर यह तथ्य उभर कर आयेगा कि इस काल में एक गाज विवाहिताओं पर भी गिरी है। जो बेचारी पूरा साल बाट जोहा करती कि छुट्टियों में पीहर जायेंगी, नहीं जा पा रही हैं। पति, बच्चों व सास-ससुर के साथ वही ढाक के तीन पात। और इसी कारण एक बेचैनी और कुलबुलाहट उनके भीतर निराशा पैदा कर रही है। मांएं भी उदास हैं कि मुद्दत हो गयी है बेटी से मिले और अब कोई मिलने का चांस नहीं लग रहा है। दरअसल, संबंधों की दुनिया में यह किसी त्रासदी से कम नहीं है। पर शादीशुदा मर्द इसे एक अलग ही त्रासदी मान रहे हैं और सोच रहे हैं कि इस बार 11 की जगह पूरे 12 महीने उनकी छाती पर मूंग दली जायेंगी।
सावन का महीना आने वाला है और मुझे ‘बंदिनी’ फिल्म के एक गीत की पंक्तियां याद आ रही हैं :-
‘अब के बरस भेजो भैया को बाबुल, सावन में लीजो बुलाय।’
पर लगता है कि इस बार के झूले, बरसात और काली घटायें बेटियों के नसीब में नहीं हैं क्योंकि बाबुल ने भी गांठ मार ली है कि इस बार बेटियों को बुलाकर कोई रिस्क मोल नहीं लेंगे। डर उनका यही है कि बेटी किसी कारण से कोरोना को न ले आये। अगर किसी घर में बाबुल ने बेटियों को बुलाने के लिए करड़ी छाती कर भी ली है तो कुछ दामाद राजा इनकार कर रहे हैं कि इस बार नहीं भेजेंगे। दामाद और ससुर का डर एक समान है। दूसरी तरफ ऐसे भी हैं जो अपनी पत्नियों को उलाहना दे रहे हैं कि साल में गर्मी की छुिट्टयों का एक महीना चैन से गुजरता था पर अब उसमें भी चिकचिक और पूरी नोंकझोंक। सोलह आने की बात यह है कि पति महोदय आगे पीछे की खरी-खोटी सुनाने का कोई अवसर चूक नहीं रहे हैं।
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एक बर की बात है अक नत्थू मरखनी झोट्टी लियाया। वा घणे माणसां आग्गै धार कोनीं काढण दिया करती। अर नत्थू का घेर था शमशान घाट धोरै। एक दिन धार के टैम सांझ नैं कई माणस एक अर्थी लेकै आगे तो भैंस नैं लात मारकै सारा दूध खिंडा दिया। आगले दिन कुछ इसा सूत बैठ्या अक धार के टैम फेर अरथी लेकै आगे। अर म्हैंस फेर कूदगी। ईब नत्थू तै डंट्या नीं गया तो उन धोरै जाकै बोल्या—हां रै! एक बात बताओ थम मेरी म्हैंस कुदाण खात्तर यो ताजा मारकै ल्याये हो अक काल आले नैं ठाये हांडो हो।

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